भड़ास की ऐसी लत लग गई है कि बिना पढ़े नींद नहीं आती

भाई यशवंत जी, सबसे पहले तो आपको बहुत-बहुत बधाई ….क्योंकि आपने जिस पौधे को बेटे की तरह पाल-पोसकर बड़ा किया अब वो चार साल का हो गया है….और एक बाप का बेटा जैसे-जैसे जवान होता जाता है…..तो उसका सीना गर्व से चौड़ा होता चला जाता है…और ताकत भी दुगुनी होती चली जाती है….जैसा गीता में कहा गया है…कर्म किए जा बंदे…फल की इच्छा ना कर….आपने भी शायद इसी सिद्धांत पर काम किया….जैसा कि भड़ास की चार साल की जीवनी पढ़ने पर मुझे प्रतीत हुआ..और आज उसी कर्म का फल है कि भड़ास हजारों लोगों की जुबान बनकर उभरा है….जब पत्रकार जगत का कोई साथी बेसहारा हो जाता है….तो भड़ास ही उसे एक आशा की किरण दिखाई पड़ती है.

और मैं क्या कहूं….जैसे लोगों को शराब की लत लगती है….छुडाए भी नही छूटती….ऐसे ही मुझे भड़ास की आदत हो गई है….जब तक इसे पढ़ नहीं लेता…नींद ही नही आती…..ढेरों शुभकामनाओं के साथ भगवान से यही दुआ करता हूं….कि आपका ये पौधा दिन दूनी-रात चौगनी दर से उत्तरोत्तर वृद्धि करे… और जल्दी ही एक बरगद का वृक्ष बने… जिसकी छाया में पत्रकार साथी चैन की सांस ले सकें…और मन की शांति महसूस कर सकें.

आपका अनुज

रामवीर सिंह डागुर

सिंगापुर


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