नैनीताल । लम्बी राजनीतिक चुप्पी के बाद आखिरकार पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के बुजुर्ग नेता नारायण दत्त तिवारी चुनावी समर में कूद पड़े है। उधमसिंहनगर जिले की गदरपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में अपने भतीजे मनीष तिवारी का नामांकन दाखिल कराने के बाद तिवारी पिछले दो दिनों से तराई में डेरा डाले हैं। कई सालों बाद सक्रिय राजनीति में तिवारी की एकाएक दिलचस्पी बढ़ने के बाद जहां पुराने कांग्रेसियों के चहरे खिल उठे हैं, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस का एक खेमा सहमा सा नजर आ रहा है।
नारायण दत्त तिवारी ने 2007 के विधानसभा चुनावों में खास दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। इसका कांग्रेस को भारी खामियाजा भी उठाना पड़ा था। आन्ध्र प्रदेश के राजभवन को अलविदा कहने के बाद तिवारी देहरादून में ही जम गये थे। इस दरम्यान उन्होंने कांग्रेस की सक्रिय राजनीति से यथोचित दूरी बनाए रखी। नतीजन कांग्रेस का धड़ा उन्हें हाशिये में धकेलने की कोशिशों में जुटा रहा। लेकिन चुनाव आते ही तिवारी ने अपना सुर बदला और अपने भतीजे के बहाने चुनावी जंग में कूद पड़े हैं।
उधर, उत्तराखण्ड के पहले मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता नित्यानंद स्वामी पार्टी में अपनी उपेक्षा से बेहद आहत हैं। उन्हें शिकवा है कि भाजपा चुनाव संचालन समिति का सदस्य होने के बावजूद टिकट बटवारे में पार्टी ने उनसे एक मर्तबा भी मशविरा नहीं किया। उनकी गुजारिश के बावजूद उनकी बेटी को पार्टी का उम्मीदवार बनाने की जरूरत तक महसूस नहीं की। उनका कहना है कि पार्टी ने उन्हें दूध से मक्खी की तरह निकाल बाहर निकाल दिया।
नित्यानंद स्वामी टिकट बटवारे में उनकी राय नहीं जानने से शायद उतने नाराज न हों, उन्हें उससे ज्यादा दुःख उनकी बेटी को भाजपा का टिकट नहीं मिलने से है। उम्र के इस पडा़व में भाजपा के इस बुजुर्ग नेता ने देहरादून की कैंट विधानसभा क्षेत्र से अपनी बेटी के वास्ते महज एक अदद टिकट मांगा था। लेकिन भाजपा ने अपने वरिष्ठ नेता की यह अदनी सी मुराद भी पूरी नहीं की। इससे आहत होकर उन्होंने पार्टी में अपनी उपेक्षा को तो जगजाहिर किया ही, पूर्व मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी की बेटी ज्योत्सना शर्मा ने देहरादून के कैंट विधानसभा सीट से बतौर आजाद उम्मीदवार अपना नामांकन पत्र भी दाखिल कर दिया है।
नैनीताल से प्रयाग पाण्डे की रिपोर्ट





