भयभीत अमेरिकियों के जटिल कानून से अबकी ओम थानवी की हुई दुर्दशा

अमेरिका वाले बेहद डरे हुए रहते हैं. इसी कारण उन्होंने ऐसे ऐसे जटिल नियम कानून बना रखे हैं कि दूसरे देशों के लोगों का वहां पहुंचने पर कई बार कचूमर निकल जाता है. कलाम, शाहरुख आदि की बेइज्जती की खबरें हम लोग पढ़ते रहते हैं. जनसत्ता के संपादक व वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के साथ जो ताजा मामला पेश आया है, उससे वे खुद भी स्तब्ध हैं और अमेरिका की इस बेचारगी पर चर्चा के मूड में हैं. तभी उन्होंने अपनी पूरी बात फेसबुक पर डाल दी है, टिकट की तस्वीर के समेत. वहीं से उनकी बात उन्हीं के शब्दों में यहां पेश कर रहे हैं. -एडिटर, भड़ास4मीडिया


Om Thanvi : सऊ पाउलो से न्यूयोर्क के लिए रवाना होने पर दिलचस्प हादसा हुआ. सुरक्षा जांच आदि के बाद अमेरिकन एयरलाइंस के विमान में चढ़ते वक़्त मेरा बोर्डिंग पास देखकर वहां तैनात महिला चौंकी. मुझे देखा, फिर दुबारा बोर्डिंग पास. बोली, आपकी विशेष सुरक्षा जांच होगी. बोर्डिंग पास पर लिखा था: SSSS. यानी गहन सिक्योरिटी का पात्र. इस इबारत पर मैंने तब तक ध्यान ही नहीं दिया था. बहरहाल, मुझसे ज़्यादा वह इस कार्रवाई पर हैरान दीखती थी. विमान सेवा भले अमेरिकी हो, महिला ब्राज़ील की थी और ब्राज़ीली बेहद भले होते हैं. पर ड्यूटी ड्यूटी थी. सरेआम लाइन से अलग कर मुझे पास के एक छोटे से कक्ष में ले गए. ओढ़ी हुई विनम्रता और प्रशिक्षित शिष्टाचार वाले संवादों (हाउ वाज़ द डे, सर! …) के साथ एक कुरसी पर बिठा कर जूते खुलवाए. उनकी जांच की. फिर सावधान की मुद्रा में एक मशीन के आगे खड़ा कर शरीर के आर-पार देखा. फिर पतलून की दोनों जेबों के अस्तर बाहर उलटवाए; उन पर झीने कागज़ के टुकड़ों को मसला और उन्हें पास में रखी एक मशीन में डालकर जांचा. ऐसे ही मेरी कमरपेटी के बक़ल को कागज़ के टुकड़े से रगड़ कर परखा. आदि. बीच में वही दीक्षित सौजन्य: सर, आपको असुविधा हो रही होगी पर यह प्रक्रिया बस पूरी होने ही वाली है! और प्रक्रिया पूरी हो गयी. शौक़ से अपनी सीट पर तशरीफ़ ले जाइए! बोले, आपको हुई दिक्कत के लिए हम क्षमा चाहते हैं. दिखावे के लिए सही, उन्होंने क्षमा मांगी जो मैंने दे दी. चारा भी क्या था? बीच रास्ते आप क्या कह/कर सकते हैं? उनकी दशा पर तरस ही खा सकते हैं. पहले पता हो कि हमसे परेशानी है तो अमेरिका क्यों, यूरोप या अफ्रीका होकर ही ब्राज़ील पहुंचा जा सकता है! खैर, यह ज़रूर सोचा कि मैं इन्हें डरावना कहाँ से लगा? अमेरिका कई बार आना-जाना हुआ है, पर यह सौभाग्य पहली बार ही मिला! औरों की बात जाने दीजिए, घड़ी भर के लिए सही, उन्होंने मुझ नाचीज़ को भी महान डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की श्रेणी में ला रखा!! जो हो, यक़ीन मानिए, अमेरिकी सभ्यता अपने में बड़ी भयभीत सभ्यता है.

        Rajshekhar Vyas main na kahta tha??????????
 
        Nilay Upadhyay अमेरिकी सभ्यता भयभीत सभ्यता है.
 
        Anand Kumar Shukla waah…badnaam honge to kya naam na hoga…lekin aapse kisi ko kya khatra ho sakta hai! pata nahi kis namuraad ne ye SSSS likh dala tha..
   
        Vijaya Sati ‎!!
    
        गंगा सहाय मीणा अंतिम पंक्ति सबसे दिलचस्‍प है- जो हो, यक़ीन मानिए, अमेरिकी सभ्यता अपने में बड़ी भयभीत सभ्यता है.
     
        Rajshekhar Vyas halanki omji hamare pas to "white pasport ''hota hain par jfk newyork ya new ork""ganv hi kyon na ho ye aam bat hain….ha…anun ne talashi nahi lene di to nahi hi leni di
      
        Om Thanvi न लिखा जाता तो उनकी (शाश्वत) बेचारगी और अपनी (तात्कालिक) लाचारी का यह अनुभव कहाँ हासिल होता!
       
        Shastri Kosalendradas Sir ye kya?
        
        Anirudh Umat Bhayabheet bhi….shabhyata bhi…!
         
        Rajshekhar Vyas ek dara hua rashtra hi sabko darata hain maine apni pustak "toot raha hain amerika"main is dare /bhaybhi rastra par vistar se likha hain
         
        Om Thanvi Safar ke maze!
         
        गंगा सहाय मीणा क्‍या बाद में आपको इस SSSS लिखने का मतलब और कारण पता चला… ?
         
        Sharad Kokas seedhe saade sabhya shahari इतना परेशान किया गया ….
         
        Shishir Woike वे अपने ही लोगों से कम भयभीत नहीं हैं सर…अफ्रीकन अमेरिकन, नेटिव अमेरिकन्स, मेक्सिकन्स को चलते फिरते गोली मार देते हैं… एक दौर था जब लोगों को कम्युनिस्ट बताकर जेल में डाला करते थे…एक ये दौर है जब हर नॉन-व्हाईट उन्हें टेररिस्ट लगता है..
         
        Om Thanvi इसीलिए कहा भयभीत लोग हैं!
 
        Om Thanvi कारण पर अब ज़्यादा क्या सोचना! जब (उनके लिए) मैं शरीफ़ ही निकला!
 
        Mutha Rakesh kya ye marka SSSS sabhi bharityo ke liye hai ya aur kaun kaun desh ke liye hai ye
   
        गंगा सहाय मीणा लेकिन बेवजह यात्रियों को परेशान करना गैर-कानूनी है. अगर इसका कारण नस्‍लीय है तो और भी ज्‍यादा गलत है.
    
        Virendra Jain आपने यह जानने की कोशिश नहींकी कि ऐसा कोड क्यों लगाया गया, आखिर गलतफहमी कहाँ हुयी
     
        Om Thanvi फ़्लाइट पकड़ें या अमेरकी कंपनी के भले मगर हुक्म के पाबन्द ब्राज़ीली मुलाज़िमों से उलझें या पीछे दो फ़रलांग दूर लौटकर उस अमेरिकी से पूछें कि बता चार एस कैसे जड़े! इतनी ऊर्जा इस पर खपाने से अच्छा है तरस खाइए और आगे का सफ़र जारी रखिए. यह भी एक अनुभव हुआ. सबको कहाँ नसीब होता है!
      
        Avadhesh Yadav : Americi sabhya hai ya nahi , apne anubhav se nahi jaanta , lekin aapka kathan sahi hai ki wo dare hue hai . . .
       
        Munna Kumar Jha : gambhir mamla hai sarkaar aagey aakar aise mudde par vichaar kare.
         
        Vikas Kumar मुझे इस पूरे मामले में यह बड़ी बात लगी कि उन्होंने आपसे बार-बार क्षमा मागीं. जैसा आपने कहा दिखावे के लिए. हां…मान ही लेते हैं कि दिखावे के लिए. अपने यहां तो दिखावे के लिए भी सुरक्षा वाले सौरी नहीं कहेंगे. और जांच के दौरान ही आपसे ऐसा व्यवहार करेंगे कि आपको कई बार लगेगा वाकई मैं अपराधी ही तो नहीं हूं.
         
        Durgaprasad Agrawal बधाई ओम जी, और वैसे यह तो आपकी सहज विनम्रता है वरना हमारे लिए तो वैसे भी आप किसी भी महान से कम नहीं हैं.
         
        Om Thanvi यह आपकी ज़र्रानवाज़ी!
         
        Om Thanvi पर आगे भी सुनिए. न्यू योर्क पहुँच कर कोई मोमा (म्यूज़ियम ऑफ़ मॉडर्न आर्ट) और मेट (मेट्रोपोलिटन म्यूज़ियम) में वरमीर, रेनुआ, मातीस, माने, मोने, वैन गौग, पॉल गोगां, पिकासो, पॉल क्ली, गुस्ताव क्लिम्ट, फ्रीदा कालो, जेकसन पौलेक की अमर कृतियाँ देखने लगे तो अमेरिका की बोर्डर सिक्योरिटी, इमिग्रेशन या कस्टम आदि का झमेला टुच्ची चीज़ लगता है. जिसे इनकी मज़बूरी, नासमझी, बेवकूफ़ी या बदमज़गी कुछ भी समझिये, उस पर दोस्तों के बीच बैठकर हँसना चाहिए और भुला देना चाहिए — जैसा कि मैंने क्या है!
 
        गंगा सहाय मीणा : मेरी नजर में ये बातें हंसने की नहीं है. अगर किसी अमेरिकी नागरिक के साथ कहीं ऐसा होता है तब भी क्‍या यह मामला इतना 'सहज' लगेगा? दरअसल यह अपनी संप्रभु‍ता अमेरिका के यहां गिरवी रख चुकी हमारी सरकारों की 'मेहरबानी' का नतीजा है. सवाल डिग्‍निटी का है और संसार के हर व्‍यक्ति की डिग्‍निटी का बराबर महत्‍व है- चाहे वह बराक ओबामा हो, आप हों, या अफ्रीका का कोई आदिवासी.
   
        Jugnu Trivedi ‎:( 🙁 🙁
    
        Yogendra Kumar Purohit Ek darshan sashtri kah kar gaye hai jivan bhay or bhukh ke karan par hi tika hai..anubhaw ki kadiyaa har din judti hi jaati hai or jivan ki janjir/jaal ban jaati hai..jai ho..
     
        Nadim S. Akhter थानवी साब, आपने जिस तरह का चित्रण अपनी लेखनी से किया है, ऐसा लगा लाइव टेलिकास्ट देख लिया…लेकिन आपने ये नहीं बताया कि आपके टिकट पर 'SSSS' क्यों छापा गया…???
      
        Kavita Vachaknavee ऐसी घटनाओं के लिए किसी देश की सुरक्षा पद्धति को धिक्कारने की अपेक्षा उन्हें धिक्कारना चाहिए जिनके कारण भारतीय और एशियाई संदिग्ध हो गए हैं। अपने देश की सुरक्षा, व्यवस्था और नियम के प्रति प्रतिबद्धता कोई बुरी चीज थोड़े ही है। क्या भारत जैसी लचर व्यवस्था की प्रशंसा की जानी चाहिए जहाँ दिन रात किस किस कोने और किस किस देश से कोई भी घुसा आ रहा है और किसी को अंतर नहीं पड़ता ? ग्लासगो एयरपोर्ट हमले से जुड़े दक्षिण भारत के दो लोगों की गिरफ्तारी पर प्रधानमन्त्री (मनमोहन सिंह) का यह बयान कि वे रात भर उनके परिवार की चिंता में सो नहीं सके, भारत द्वारा आतंकवाद के खुलेआम आधिकारिक समर्थन जैसा था। उसके बाद से दुनिया में अब प्रत्येक भारतीय संदिग्ध हो गया है। अतः दोष जाँच के लिए रोकने वालों का नहीं अपितु प्रत्येक भारतीय को संदिग्ध व अविश्वसनीय बना देने वाले हमारे अपनों के उस व्यवहार का है जो अनुत्तरदायी ही नहीं बेहद धूर्त और खतरनाक भी रहते आए हैं।
 
        Deep Sankhla ‎:)
 
        Akhlaq Usmani Maaf Kar Do Sir, Darpok Qaumen Apne Saaye Se Bhi Darti Hain.
   
        Archana Lizu Liza Kavita:Vry true kavita g..bat sirf yahi h, jise howa bna dia gya h.
  

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