भाजपा के ‘दलित कार्ड’ ने बढ़ा दी राजनीतिक हलचल

भाजपा नेतृत्व ने लोकसभा के लिए 272 प्लस का अपना अंक गणित पूरा करने के लिए राजनीतिक जोड़-तोड़ की उस्तादी भी तेज कर दी है। कई राज्यों में जातीय और सामाजिक समीकरण अपने पक्ष में करने के लिए क्षत्रपों पर ‘दोस्ती’ के डोरे डाले जा रहे हैं। भाजपा नेतृत्व की इस रणनीति में मीडिया सर्वेक्षण खासे मददगार साबित हो रहे हैं। क्योंकि, लगातार सर्वेक्षणों में यही कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी की चुनावी मुहिम तेजी से निर्णायक दौर में पहुंच रही है।

इन सर्वेक्षणों में ये भी संकेत मिल रहे हैं कि इस बार कांग्रेस नेतृत्व वाला यूपीए गठबंधन काफी फिसड्डी रहने वाला है। यहां तक कि यूपीए का आंकड़ा 100 के अंदर सिमट सकता है। कांग्रेस के बारे में तो यह अनुमान है कि पार्टी को अब तक की सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ सकता है। इस तरह के आकलन से तमाम छोटे दलों ने सत्ता में भागीदारी के लिहाज से भाजपा से गठबंधन के लिए बातचीत शुरू की है। इस संदर्भ में जाने-माने दलित नेता राम विलास पासवान का बदला हुआ राजनीतिक पैंतरा इन दिनों खास चर्चा में आ गया है।

पासवान, लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के प्रमुख हैं। अपने गृह प्रदेश बिहार की चुनावी राजनीति में पासवान की दशकों से खास भूमिका रहती आई है। 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्हें जरूर बड़ा झटका लगा था। उनकी पार्टी इस चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। यहां तक कि हाजीपुर संसदीय सीट से पासवान खुद बुरी तरह पराजित हो गए थे। बाद में, वे राजद प्रमुख लालू यादव की मदद से किसी तरह राज्यसभा में पहुंचे। पासवान ने 2000 में लोजपा बनाई थी। दलितों और वंचित वर्गों के बीच पासवान की पार्टी का एक मजबूत वोट बैंक रहा है। पासवान, तमाम खूबियों के बावजूद राजनीतिक अवसरवाद के लिए भी बदनाम रहे हैं। इसी के चलते वे केंद्र में 1989 से लेकर 2009 तक लगातार सत्ता में रहे। चाहे, सरकारें किसी भी दल की रही हों।

वे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में भी केंद्रीय मंत्री थे। 2002 में उन्होंने गुजरात के दंगों को मुद्दा बनाते हुए सरकार से इस्तीफा दे दिया था। उस दौर में धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत की दुहाई देते हुए उन्होंने कहा था कि उनके कहने के बावजूद नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार को बर्खास्त नहीं किया गया। ऐसे में, वे एनडीए की राजनीति से अलग हो रहे हैं। 2004 में वे यूपीए के गठबंधन में भाजपा की रीति-नीति को कोसते हुए आ गए थे। सो, मनमोहन सरकार में मलाईदार विभाग के मंत्री रहे। 2009 में चुनाव हारे, तो मंत्री बनने का मौका नहीं मिल पाया। लेकिन, इस बार बिहार में वे कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के लिए उतावले घूमते रहे हैं।

इस सिलसिले में कई बार सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मुलाकात भी कर चुके हैं। बीच में, वे कोशिश कर रहे थे कि कांग्रेस, लालू यादव की जगह जदयू के नेता एवं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से चुनावी हाथ मिला ले। लेकिन, पासवान की ये कोशिशें कामयाब नहीं हुईं। ऐसे में, यही तय हुआ कि कांग्रेस का गठबंधन लोक जनशक्ति पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के साथ होगा। इस गठबंधन का कोई औपचारिक ऐलान हो पाता, इसके पहले ही तीनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर किचकिच शुरू हुई। सूत्रों के अनुसार, बिहार की 40 संसदीय सीटों में से पासवान ने अपनी पार्टी के लिए 10 सीटें मांगी थीं। जबकि, राजद और कांग्रेस का नेतृत्व उन्हें 5 सीटों से ज्यादा देने को तैयार नहीं हो रहा था। इसी को लेकर पासवान नाराज थे। पासवान कई दिनों से तुनके चल रहे थे।

इस बीच पासवान पर भाजपा नेतृत्व ने मेल-मिलाप के डोरे डाले। पासवान के करीबी सूत्रों के अनुसार, मोदी की चुनावी मुहिम का व्यापक असर बिहार में भी देखा गया है। इस जमीनी सच्चाई का आकलन करके लोजपा ने भाजपा से   गठबंधन करने की कोशिशें तेज कीं। पिछले दिनों पासवान के बेटे एवं लोजपा संसदीय बोर्ड के प्रमुख चिराग पासवान ने भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद ही लोजपा और भाजपा में चुनावी गठबंधन की बातचीत आगे बढ़ी। बताया जा रहा है कि पासवान ने भाजपा से अपनी पार्टी के लिए 8 सीटें मांगी हैं। इन्हीं सीटों को लेकर बातचीत निर्णायक दौर में हैं। पासवान, जमुई संसदीय क्षेत्र से अपने बेटे चिराग को लड़ाना चाहते हैं। जबकि, अपने भाई पूर्व सांसद रामचंद्र पासवान को समस्तीपुर से खड़ा करना चाहते हैं। इन्हीं सीटों को लेकर बातचीत फंसी हुई है।

लोजपा के वरिष्ठ नेता सूरजभान ने मीडिया में खुलकर दावा कर दिया है कि दोनों दलों के बीच गठबंधन की बात निर्णायक दौर में पहुंच गई है। एक-दो दिन के अंदर ही इसका औपचारिक ऐलान हो जाएगा। लेकिन, पासवान के बेटे चिराग ने यही कहा है कि अभी गठबंधन के बारे में अंतिम फैसले की स्थिति नहीं आई। जब चिराग से नरेंद्र मोदी की राजनीति के संदर्भ में सवाल किए गए, तो उन्होंने यही कहा कि अब इतने वर्षों बाद मोदी के संदर्भ में गुजरात के दंगों को याद करने का कोई औचित्य नहीं रहा। वैसे भी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में गठित विशेष जांच दल (एलआईटी) ने मोदी को ‘क्लीनचिट’ दे दी है। ऐसे में, मोदी की आलोचना का कोई औचित्य नहीं है। पासवान के बेटे ने यह भी कह दिया है कि लोजपा के लिए कोई पार्टी अछूत नहीं है। राजनीति में हमेशा सभी संभावनाएं बनी ही रहती हैं। इस तरह की टिप्पणियों से चिराग पासवान ने एक तरह से गठबंधन की बातचीत की पुष्टि कर ही दी है।

यह अलग बात है कि राम विलास पासवान मीडिया को टिप्पणी के लिए उपलब्ध नहीं हुए। राजद प्रमुख लालू यादव ने पासवान के नए राजनीतिक खेल की संभावनाओं पर यही कहा है कि जब तक लोजपा आधिकारिक रूप से कोई ऐलान नहीं करती, तब तक वे भला इस पर टिप्पणी क्या करें? इसी के साथ लालू अपने को रोक नहीं पाए। उन्होंने कह ही दिया कि यदि पासवान सांप्रदायिक ताकतों से हाथ मिलाते हैं, तो अपनी बची राजनीतिक साख को भी खो देंगे। वे सवाल करते हैं कि नरेंद्र मोदी को दंगाई नेता कह कर पासवान वाजपेयी सरकार से अलग हुए थे। अब क्या 12 सालों में मोदी के सारे पाप धुल गए हैं? केंद्रीय राज्यमंत्री एवं एनसीपी के नेता तारिक अनवर ने इस मामले में यही कहा है कि यदि पासवान अपना पैंतरा बदलकर भाजपा से गठबंधन करते हैं, तो यह देश की राजनीति के लिए बड़ा दुखद होगा। क्योंकि, संघ परिवार की राजनीति कभी भी वंचित वर्गों और अल्पसंख्यक वर्गों के हित की नहीं हो सकती। ऐसे में, क्या गठबंधन महज सत्ता में हिस्सेदारी के लिए किया जा रहा है? ऐसे सवाल पासवान से जरूर पूछे जाएंगे।

पिछले दिनों ही महाराष्ट्र की राजनीति में दलित कार्ड की रणनीति के तहत भाजपा ने भारतीय रिपब्लिकन पार्टी (अठावले) के नेता रामदास अठावले से हाथ मिला लिया है। महाराष्ट्र की दलित राजनीति में अठावले की खास भूमिका रहती है। भाजपा ने समर्थन देकर अठावले को राज्यसभा का सदस्य बनवा दिया है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश व बिहार की राजनीति में दलित वोट बैंक की खास अहमियत मानी जाती है। संघ नेतृत्व की दिलचस्पी रही है कि इस चुनावी दौर में इन प्रदेशों के मजबूत दलित नेताओं के साथ भाजपा की दोस्ती हो जाए। इसी के तहत पहले अठावले को जोड़ा गया। अब कद्दावार नेता पासवान पर डोरे डाले जा रहे हैं। सोमवार को चर्चित दलित नेता उदित राज तो सीधे भाजपा में ही शामिल हो गए। वे भारतीय राजस्व सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं। 2003 में उन्होंने सरकारी सेवा से इस्तीफा देकर इंडियन जस्टिस पार्टी का गठन किया था।

उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में उदित राज दलित राजनीति का मंथन करते रहे हैं। तमाम दलित सवालों पर वे राष्ट्रव्यापी आंदोलन भी करते रहे हैं। वे भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के सामने भाजपाई बने हैं। उदित राज का कहना है कि मोदी ने गुजरात में सफल विकास मॉडल देकर यह उम्मीद जगाई है कि उनके नेतृत्व में देश प्रगति के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ेगा। उन्होंने उम्मीद जाहिर की है कि भाजपा के राज में दलितों और वंचित वर्गों का सबसे ज्यादा उत्थान होगा। जबकि, कांग्रेस ने इन वर्गों को केवल वोट बैंक के रूप में ही भुनाया है। इसीलिए उन्होंने भाजपा के साथ आने का फैसला किया है। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि उदित राज के जरिए पार्टी उत्तर प्रदेश में बसपा के वोट बैंक में सेंध लगा सकती है। क्योंकि, प्रदेश के कई जिलों में उदित राज की पार्टी का काफी मजबूत तानाबाना रहा है।

उदित राज बड़े जोशीले नेता हैं। लेकिन, वे भाजपा और पूरे संघ परिवार को हाल तक सांप्रदायिक कुनबा करार करते रहे हैं। यही कहते रहे हैं कि संघ परिवार की राजनीति वंचित वर्गों और अल्पसंख्यक वर्गों के हित की कभी नहीं हो सकती। मीडिया साक्षात्कारों में उदित राज, नरेंद्र मोदी को सांप्रदायिक जहर फैलाने वाला खतरनाक नेता कहते रहे हैं। वे कई बार यह भी कह चुके हैं कि मोदी के अंदर तानाशाही वाली प्रवृत्ति है। यदि ऐसे नेता कभी देश की राजनीति में आगे आए, तो लोकतंत्र के लिए खतरा बढ़ेगा। लेकिन, भाजपाई बनने के बाद अब उदित राज के तेवर बदल गए हैं। वे कांग्रेस की वंशवादी राजनीति को ‘कैंसर’ करार कर   रहे हैं। कह रहे हैं कि देश इस पार्टी से मुक्त होगा, तो ही कल्याण संभव है। राजनीतिक हल्कों में पासवान के संभावित पैंतरे के बारे में भी कई तरह की बातें की जा रही हैं। क्योंकि, वे भी भाजपा को घोर सांप्रदायिक पार्टी करार करते आए हैं। मोदी की राजनीति को तो वे पानी पी-पीकर कोसते रहे हैं। यहां तक कि मीडिया साक्षात्कारों में वे भाजपा को ‘भारत जलाओ पार्टी’ तक कहते रहे हैं। इंतजार कीजिए की पासवान अगले कुछ दिनों में ही किन लफ्जों में भाजपा और मोदी का ‘कीर्तन’ करते नजर आते हैं!

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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