भाजपा पहुंच सकती है सत्‍ता के नजदीक, पर बागियों ने पैदा की बेचैनी

: गोवा चुनाव – भाग अंतिम : विगत पांच वर्षों तक विपक्ष में रहने के बाद भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर से पूरे जोश-खरोश के साथ गोवा में कांग्रेस को मात देने के मंसूबे बना रही है. इसके लिए कई तिकड़म और महत्वपूर्ण बदलाव किये गए हैं. भाजपा को लगता है कि इस बार गोवा की जनता उसे वापस सत्ता में ला खड़ा करेगी. इस दिशा में पार्टी ने सबसे पहले महाराष्ट्र गोमंका पार्टी को अपने खेमे में मिलाया. इस बार भाजपा और एमजीपी गठबंधन कांग्रेस की तुलना में कुछ मजबूत दिखाई दे रहा है. एमजीपी ८ सीटों पर चुनाव लड़ रही है और कहा जा रहा है कि उसे कम से कम ५ सीटों पर जीत हासिल होगी.

गोवा में भाजपा पहली बार सन २००० में सत्ता में आई थी और मनोहर पारिकर पार्टी के पहले मुख्यमंत्री बने. उनका शासन काल कांग्रेस की तुलना में प्रशासनिक दृष्टि से कई मायने में बेहतर माना जाता है. मगर जनवरी २००५ में ४ भाजपा विधायकों से पार्टी का साथ छोड़ दिया था और पारिकर को अपनी कुर्सी से हाथ धोना पड़ा था. इसका मतलब ये नहीं कि भाजपा में आज सक कुछ ठीक है. दरअसल भाजपा में कांग्रेस से कहीं जाया अंतर्कलह है कि विधायक पारिकर के अहंकारी स्वाभाव और राज्य की पार्टी मशीनरी पर प्रभुत्व से खासे नाराज़ हैं और यही वजह है कि पिछले महीने तीन विधायकों ने पार्टी छोड़ दी थी. भाजपा के बिचोलिम से विधायक राजेश पट्नेकर और पर्नेम के विधायक दयानंद सोपते पहले ही कांग्रेस में जा चुके हैं और उसी पार्टी की तरफ से चुनाव मैदान में हैं. कोंकण से भाजपा के विधायक विजय पी खोट ने भी इस्तीफ़ा दे दिया था. मगर बड़ी जद्दोजहद के बाद भाजपा आला कमान उनको मनाकर वापस ले कर आ पाई. मगर उनको टिकट नहीं मिल पाया.

सन २००७ के विधान सभा चुनाव में भाजपा को १४ सीटें ही मिली थी. मगर इस बार नए गठबंधन के चलते शायद उसे कांग्रेस गठबंधन से ज्यादा सीटें मिलने की सम्भावना है. मगर भाजपा को भी बागी उम्मीदवारों की चुनौती का सामना करना पड रहा है. मिसाल के तौर पर शिरोदा में पार्टी के उम्मीदवार महादेव नाइक के खिलाफ विश्वास प्रभुदेसाई मैदान में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर खड़े हैं. इसी तरह सेंगुएम में पार्टी ने दो बार विधायक रहे वासुदेव मेंगगोंकर के बदले सुभाष फलदेसाई को टिकट दे दिया, जिससे स्थानीय कार्यकर्त्ता खासे नाराज़ हैं. वही हाल पार्टी के वरिष्ट नेता प्रकाश शंकरवेलिप का रहा जिनको टिकट नहीं मिला और वो बागी प्रत्‍याशी तौर पर क्वेपेम विधानसभा से उम्मीदवार हैं. इसी जगह से एमजीपी के टिकट पर दिगंबर कामत के पूर्व निजी सहायक प्रकाश अर्जुन वेलिप चुनाव लड़ रहे हैं.

फिर भी कांग्रेस के मुकाबले भाजपा-एमजीपी गठबंधन के उम्मीदवार कहीं ज्यादा मजबूत दिखाई दे रहे हैं और कई पंडितों के अनुसार ये गठबंधन कम से कम १८ से १९ सीटों पर विजय प्राप्त कर सकता है. मगर सबसे हैरानी की बात ये है कि संसद में महिलाओं को ३३ प्रतिशत आरक्षण देने की बात करने वाली पार्टी ने गोवा की ४० सीटों में एक भी महिला को टिकट नहीं दिया. जब इस सवाल पर बवाल मचा तो पारिकर ने साफ़ कह दिया कि कोई महिला उम्मीदवार इस लायक थी ही नहीं. अपने चुनावी घोषणा पत्र में भाजपा ने बढ़ती महंगाई, राज्य में हो रहे अवैध खानन के अलावा कांग्रेस सरकार में कुशासन और भष्टाचार को प्रमुख मुद्दा बनाया है. साथ ही सत्ता में काबिज़ होने के बाद पेट्रोल का दाम ११ रुपया कम करने और १०० दिनों के अन्दर लोकायुक्त बहाल करने की बात की है. पार्टी का घोषणा पत्र जारी करते हुए पार्टी महासचिव रवि शंकर प्रसाद ने ऐलान किया कि अवैध खानन से जुड़े केस लोकायुक्त को सौंप दिए जायेंगे और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली कंपनियों के खिलाफ सख्त कदम उठाये जायेंगे. चुनाव के चाणक्यों को लगता है कि ये सब मुद्दे गोवा की जनता को लुभाने के लिया पर्याप्त हैं और इसका फल ज़रूर मिलेगा.

एक और ख़ास बात ये रही कि इस बार भाजपा ने गोवा की इसाई सम्प्रदाय का समर्थन हासिल करने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ८ ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिया है और इस बार  दक्षिण गोवा के विधान सभा क्षेत्रों में इसका लाभ मिलेगा. अब तक भाजपा उत्तरी गोवा को ही अपना गढ़ मानती रही रही है. इस बार ये समीकरण कही न कहीं ज़रूर बदलेगा. गोवा की क्षेत्रीय पार्टियों में पूर्व राकंपा ने नेता और पर्यटन मंत्री रहे मिक्की पचेको ने गोवा विकास पार्टी नमक नयी पार्टी का गठन किया है और कई जगहों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं. मगर ये राकंपा का ही वोट काटेंगे. मगर कोर्तालिम में गोवा विकास पार्टी की नेल्ली रोड्रिक्स एक दमदार प्रत्याशी हैं और वो वहां से जीत भी सकती हैं. राकपा के करीब २५०० कार्यकर्त्ता विगत माह गोवा विकास पार्टी में शामिल गो गए थे और इसका खामियाजा राकंपा को कई सीटों पर चुकाना पड़ सकता है. वैसे भी मिक्की पचेको के समर्थक, बेनौलिम, नुवेम, नवेलिम और तीन और जगहों पर हैं, जो विपक्षी प्रत्याशियों के लिए सर दर्द बन सकते हैं.

गोवा में पहली बार तृणमूल कांग्रेस अपना भाग्य आजमाने उतरी है और उसने इसकी कमान पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. विल्फ्रेड डिसूजा को सौंपी है. तृणमूल कांग्रेस शुरू से ही कांग्रेस पार्टी पर हल्ला बोलती रही है और दिगंबर कामत से खफा सारे पुराने और वफादार कांग्रेसियों के लिए एक नयी चारागाह बन गयी है. इस पार्टी के उम्मीदवार कई जगहों पर भले ही न जीत पायें मगर अल्दोना विधान सभा में डॉ. डिसूजा जीत सकते हैं और शायद पहली बार गोवा में तृणमूल कांग्रेस अपना खाता खोलने में कामयाब हो सकती है. यूजीडीपी जैसी अन्य स्थानीय पार्टियों का वैसे भी कोई वजूद नहीं है और इसके उमीदवार कुछ एक जगहों पर २००० से ३००० वोट इधर-उधर करने में कामयाब हो सकते हैं. ऐसी सूरते हाल में यही लगता है कि इस चुनाव में सबसे ज्‍यादा नुकसान सत्‍ताधारी कांग्रेस पार्टी गठबंधन को ही हो सकता है, जब कि भाजपा गठबंधन का प्रदर्शन कहीं बेहतर हो सकता है. मगर किसी राष्‍ट्रीय पार्टी को सीधा बहुमत मिलना असंभव है, भले ही कांग्रेस और भाजपा के नेतागण कोई भी दावा कर लें. अब तक की ज़मीनी कहीकत से यही लगता है कि एक दशक के बाद गोवा में फिर से आया राम गया राम वाला माहौल दोबारा न काबिज़ हो जाए. बाकी गोवा की जनता की क्या मंशा है ये तो ६ मार्च की दोपहर तक पता चल ही जायेगा. (समाप्त)

इसका पहला भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें –  गोवा चुनाव : खनन माफिया और परिवारवाद का बोलबाला

लेखक अजय एन झा वरिष्‍ठ पत्रकार और समालोचक हैं. ये हिंदुस्‍तान टाइम्‍स, आजतक, डीडी न्‍यूज, बीबीसी, एनडीटीवी एवं लोकसभा टीवी के साथ वरिष्‍ठ पदों पर काम किया है. अजय से संपर्क ajayjha30@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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