भारत रत्न को लेकर राजनीति नहीं होनी चाहिए

भारत रत्न, भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। जिसे कुछ विरलों को उनकी राष्ट्रीय सेवा के लिए दिया जाता रहा है। इन सेवाओं में कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा और खेल शामिल है। आज तक यह सम्मान लगभग 43 प्रतिष्ठित व्यक्तियों को दिया जा चुका है। उनकी राष्ट्रीय सेवा और देश के प्रति उनके समर्पण के लिए। 1954 में इसके स्थापना दिवस के बाद से यह निरंतर दिया जाया जा रहा है। परन्तु आज तक कभी इस सम्मान को लेकर इतनी उठा पटक नहीं हुई है जितनी इस वर्ष हो रही है। 
 
सचिन तेंदुलकर को उनकी खेल भावना और खेल के माध्यम से राष्ट्रीय सेवा के लिए उन्हें यह सम्मान मिलना चाहिए था इसमें कोई दो राय नहीं है। परन्तु अगर एक दूसरे तबके की माने तो यह सम्मान क्या मेजर ध्यानचंद को उनकी खेल सेवाओं के लिए नहीं मिलना चाहिए था? आज ये बड़ा सवाल बन चुका है। मामला कोर्ट तक जा पहुंचा है। नई ताज़ा खबरों को देखें तो हॉकी महासंघ भी ध्यानचंद के पक्ष में आ खड़ा हुआ है, उनका कहना है कि आज़ादी से पहले ही भारत को मेजर ध्यानचंद ने अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई थी। तो वह अब तक इस सर्वोच्च सम्मान के हक़दार क्यों नहीं बने? सवाल ठीक भी है, और अपने स्थान पर बड़ा महत्त्वपूर्ण भी है। आखिर क्या कारण है कि आज तक उनका नाम इस सम्मान के लिए पेश नहीं किया गया, जबकि हॉकी तो हमारा राष्ट्रीय खेल है फिर भी क्यों? 
 
फिर जेहन में सवाल खड़ा हो जाता है कि शायद सरकार की मंशा नहीं है मेजर ध्यानचंद को ये प्रतिष्ठित सम्मान देने की। क्योंकि सरकार भी जानती है कि हॉकी के खिलाड़ियों को तो जनता ठीक से जानती भी नहीं है, और हॉकी तो नाम के लिए है, हमारा राष्ट्रीय खेल तो क्रिकेट बन चुका है, और भारत का हर वर्ग फिर चाहे वह बच्चा हो, युवा हो या प्रौढ़ वर्ग हो क्रिकेट को ही महत्त्व देते हैं। आज मानसिकता भी यही बन गयी है कि सब अपने बच्चे को क्रिकेटर बनाना चाहते हैं, हॉकी से जुड़े तो रूल भी नहीं जानती हमारे देश की ज्यादातर जनता, बस कुछेक को छोड़कर, वो भी जो इससे जुड़े हैं बस, अगर हम अपने आप से जवाब मांगे तो पता चल जायेगा कि आखिर हम कितना कुछ जानते हैं हॉकी के बारे में, जो थोडा बहुत पता चला वो भी केवल एक फ़िल्म के माध्यम से, फ़िल्म थी 'चक दे इंडिया' क्या इसे पहले हमने कभी हॉकी का मैच देखने की जहमत उठाई? जब हम ही नहीं चाहते तो सरकार तो हमसे चार कदम आगे है।
 
वैसे भी विधानसभा चुनाव सर पर हैं और लोकसभा चुनाव आने वाले हैं, सचिन को देश का बच्चा-बच्चा जानता है, उससे प्यार करता है तो उनके वोट तो गए न सरकार की झोली में, तो हुई न राजनीति। पर हम ठहरे देश के गरीब लोग हमें क्या किसी को भारत रत्न मिले या इंडिया रत्न हमें तो बस देखते रहना है, कुछ करना नहीं है। पर अगर इसका दूसरा पहलू देखें तो क्या हॉकी और इस खेल से जुड़े खिलाडियों के प्रति सरकार भेदभाव नहीं करती? एक देश में एक खिलाड़ी जो चारों ओर से शोहरत से घिरा है उसी देश में एक खिलाड़ी जिसके पास पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं, साधन नहीं हैं. कुछ समय पहले एक हॉकी खिलाड़ी का दर्द सुना था तब पता चला आखिर क्या दशा है हमारे राष्ट्रीय खेल की। एक खेल को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार और उद्योगपति संपत्ति लुटा रहे हैं वहीं दूसरे सभी खेलों और खिलाड़ियों के पास न तो शोहरत है और न ही पर्याप्त साधन। राज्य सरकारों से मिलने वाली मदद भी नाममात्र ही है। मेरीकॉम ने अपना विरोध और दर्द कुछ समय पहले ही जाहिर किया था। 
 
ये बात समझ से परे है कि पूरा देश और सरकार केवल क्रिकेट के पीछे क्यों पड़े हैं, क्रिकेट को ही इतना प्रोत्साहन क्यों दिया जाता है, और अगर क्रिकेट इतना पसंद है हमारे देश को तो ब्रिटेन से बात कर इसे ही अपना राष्ट्रीय खेल बना दिया जाये तो क्या बुराई है। नित नए-नए नियम क़ानून लाकर क्रिकेट को परवान पर चढ़ाया जा रहा है। शायद इसीलिए हमारे देश में खेलों कि स्थिति दयनीय है। विभिन्न नियम बनाने के बाद भी हम खेलों के स्तर में सुधार नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि हर दूसरे खेल और खिलाड़ी पर क्रिकेट भारी है। सचिन को भारत रत्न मिला इसकी पूरे देश को ख़ुशी है और होनी भी चाहिए, सचिन एक उम्दा खिलाड़ी है उन्हें यह सम्मान मिलना भी चाहिए था। मगर सरकार को इसे लेकर अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षायें तो पूरी नहीं करनी चाहिए। सरकार को डर था और वह यह भलीभांति जानती भी थी कि अगर यह सम्मान चुनाव के बाद दिया जाता तो चुनाव बड़े पैमाने पर प्रभावित होता। तो इस प्रभाव से बचने के लिए चुनाव से पहले ही जनता को लुभाने के लिए सचिन को सम्मान दे दिया गया। 
 
सरकार को समझना चाहिए कि राजनीति तो और कई जगहों पर हो सकती हैं, ये पैंतरे किसी और जगह भी अपनाएं जा सकते हैं। यहाँ एक सवाल खड़ा हो जाता है कि सचिन से पहले जो पहला खिलाड़ी था जिसने दुनियाभर में भारत को एक पहचान दिलाई है उसे हमारी सरकार कैसे भूल गई? क्या खेल जगत से इस सम्मान का प्रबल हक़दार ध्यानचंद नहीं हैं, अगर 13 लोगों को उनके मरणोपरांत यह सम्मान दिया जा सकता है तो इस महान विभूति को क्यों नहीं मिला देश का पहला भारत रत्न पाने का गौरव? इसी सवाल के साथ आपको छोड़े जा रहा हूं।
 
लेखक अश्वनी कुमार से akp.ashwani@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

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