भारत सरकार के पास विदेशों में हिंदी प्रचार-प्रसार से संबंधित 36 वर्षों का डाटा है ही नहीं!

लखनऊ : भारत में अधिकांश लोग हिन्दी को राष्ट्र भाषा मानते हैं। अधिकांश हिन्दी बोलते हैं और लिखते भी हैं। लेकिन यह भी एक सत्य है कि हिन्दी इस देश की राष्ट्रभाषा है ही नहीं। लखनऊ की आरटीआई कार्यकत्री उर्वशी शर्मा को सूचना के अधिकार के तहत भारत सरकार के गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग द्वारा दी गयी सूचना के अनुसार भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिन्दी भारत की 'राजभाषा' यानी ऑफिशियल भाषा मात्र है। भारत के संविधान में राष्ट्र भाषा का कोई उल्लेख नहीं है।

वर्ष 1947 से वित्तीय वर्ष 2012-13 तक देश में हिंदी के प्रचार प्रसार की जानकारी देने के लिए उर्वशी शर्मा की सूचना की अर्जी प्रधानमंत्री कार्यालय से गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग, यहां से मानव संसाधन विकास मंत्रालय और अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय से केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा, केंद्रीय हिंदी संस्थान मैसूर और केंद्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली के जन सूचना अधिकारियों के पास लंबित है। उर्वशी के अनुसार यह दुर्भाग्यपूर्ण है क़ि हिंदी के नाम पर बड़ी बड़ी बातें करने बाली भारत सरकार 7 महीनों बाद भी देश में हिंदी के प्रचार प्रसार की जानकारी नहीं दे पाई है। वर्ष 1947 से वित्तीय वर्ष 2012-13 तक विदेशों में हिंदी के प्रचार प्रसार की जानकारी देने के लिए उर्वशी शर्मा की सूचना की अर्जी प्रधानमंत्री कार्यालय से गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग, फिर राजभाषा विभाग से विदेश मंत्रालय और विदेश मंत्रालय से वित्त मंत्रालय को स्थानांतरित की गयी है। विदेश मंत्रालय के निदेशक मनीष प्रभात के पत्र दिनांक 21-02-13 के अनुसार वर्ष 1947 से वित्तीय वर्ष 1983-84 तक विदेशों में हिंदी के प्रचार प्रसार की जानकारी भारत सरकार के पास नहीं है।

उर्वशी के अनुसार यह दुखद है क़ि हिंदी के नाम पर वक्तव्य देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मानने बाली भारत सरकार के पास विदेशों में हिंदी के प्रचार प्रसार की 36 वर्षों की कोई जानकारी नहीं है। भारत सरकार द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार वित्तीय वर्ष 1984-85 से वित्तीय वर्ष  2012-2013 की अवधि में विदेशों में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए भारत सरकार द्वारा सबसे कम 562 हज़ार रूपए वर्ष 84-85 में और सर्वाधिक 68548 हज़ार रूपए वर्ष 2007-08 में खर्च किये गए। वर्ष 2012-13 में इस मद में अगस्त 2012 तक 5000 हज़ार रूपए खर्च किये गए थे। भारत सरकार के इस खुलासे से आहत उर्वशी हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने और विदेशों में इसके प्रचार प्रसार के लिए बजटीय आवंटन की वृद्धि के लिए संघर्ष करेंगी।

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