भावनाओं का धंधा करने वाले राजनेता, मीडिया और बाजार अक्सर शोक के समय समाज से तर्क गायब कर देता है

Rajen Todariya : इस मौत ने भी मुझे उतना ही दुखी किया जितना छत्तीसगढ़ या झारखंड में माओवादी करार देकर मारे गए किसी अनाम युवा या युवती क मौत किया करती है, उतना ही दुखी हूं मैं जितना मणिपुर में मारे गए किसी पत्रकार के गम में होता हूं, उतना ही स्तब्ध हूं मैं जितना भूख और बेरोजगारी से हारकर आत्महत्या करते जवान लड़के या कर्ज में डूबे किसान की आत्महत्या पर होता हूं। इस तरह की मौतें समाज में गुस्सा पैदा करती हैं।

भावनाओं का धंधा करने वाले राजनेता, मीडिया और बाजार अक्सर शोक के समय समाज से तर्क गायब कर देता है। वह गुस्से में उन्माद भरता है। एक अच्छे खासे समझदार आदमी को उन्मादी भीड़ में बदल देता है। इसलिए गुस्सा और उन्माद से भरी भीड़ देश और समाज को कहीं नहीं ले जाती। एक दिन उन्माद और गुस्से का ज्वार उतर जाता है और हालत जस के तस हो जाते हैं। इसलिए यह समय उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनने का नहीं बल्कि हर उस व्यक्ति के साथ खड़े होने का है जो राजनीतिक और सामाजिक निरंकुश तंत्र के बहुविध बलात्कारों के बीच अकेला है। आईए उस अकेले आदमी के साथ खड़े हों और हर तरह के अन्याय का प्रतिकार करें।

वरिष्ठ पत्रकार राजेन टोडरिया के फेसबुक वॉल से.

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