भीमताल से ताल गायब, सिर्फ तबला से क्या होगा

तालों के जिले नैनीताल की एक और झील भीमताल के वजूद पर खतरे के बादल मड़राने लगे है। नैसर्गिक सौन्दर्य से मालामाल भीमताल झील में पानी का स्तर कम होने से झील का करीब एक चौथाई हिस्सा इन दिनों मिट्टी के सूखे मैदान में तब्दील हो गया है। पानी से लबालब भरी रहने वाली इस झील के मल्लीताल वाले छोर में करीब चार सौ मीटर से ज्यादा लम्बा, करीब दो सौ मीटर से ज्यादा चौड़ा और करीब डेढ़ से दो मीटर ऊँचा मिट्टी-मलवे का बदसूरत टापू उभर आया है।

भीमताल कुमाऊँ मण्डल में मौजूद प्राकृतिक झीलों में सबसे बडी़ और खूबसूरत झील है। झील के बीच में मौजूद प्राकृतिक टापू भीमताल के सौन्दर्य को और बढ़ा देता है। इस त्रिभुजाकार झील की लम्बाई 1701 मीटर चौडा़ई 451 मीटर और गहराई 2 से 18 मीटर है। भीमताल झील 63.25 हेक्टेयर के विशाल क्षेत्रफल में फैली है। झील में 4.61 मिलियन घन मीटर पानी संग्रहित होने की क्षमता है। झील का कैचमेंट 1712 हेक्टेयर के इलाके में फैला है।

भीमताल के तालाब का पौराणिक महत्व है। इसके नाम और भीमकाय आकार के मद्देनजर इसे पाण्डु पुत्र भीम से जोड़ते है। लोक मान्यता है कि महाबली भीम की गदा प्रहार से इस विशाल झील की उत्पत्ति हुई। कुछ लोग इसे कुमाऊँ के चंदवंशी राजाओं में से एक राजा भीष्म चंद से जोड़कर देखते है। माना जाता है कि कुमाऊँ के चंदवंशी शासकों में से एक राजा भीष्म चंद के नाम से इसका नाम भीमताल पड़ा। यहॉ झील के किनारे चंद वंशी राजा बाजबहादुर चंद के शासनकाल के दौरान सत्रहवीं शताब्दी में बना भीमेश्वर महादेव का पौराणिक मंन्दिर भी मौजूद है। भीमताल के आस-पास द्वापर युग के कई प्रतीकात्मक अवशेष मौजूद है। भीमताल के करीब स्थित सातताल से लगी पहाडी़ को महाभारत काल की राक्षसी हिडम्बा का निवास माना जाता है। इस पहाड़ का नाम हिडम्बा पर्वत है। भीमताल के ठीक ऊपर चोटी को कुषाणवंशी राजाओं के समकालीन माने जाने वाले कश्मीर के नागवंशी राजा क्रकोटक पहाड़ के नाम से जाना जाता है।

एककिन्सन के गजिटेयर में कुमाऊँ के इस इलाके में 60 झीलें होने का जिक्र किया गया है। शायद इसी वजह से ब्रिट्रिश कालीन सरकारी दस्तावेजों में यह इलाका पट्टी छह खाता के नाम से दर्ज चला आ रहा है। छह खाता शब्द षष्ठी खाता का बिगडा़ रूप है। छह खाता या षष्ठी खाता यानी 60 तालाब। अंग्रेजी शासन काल के दौरान भीमताल में व्यवस्थित नगरीकरण के कुछ बुनियादी काम हुए थे। ब्रिटिश हुकूमत ने 1880 के दशक में भीमताल के तालाब के एक छोर में डैम बनवाया था। यह डैम ब्रिटिश शासनकाल की इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूने के रूप में करीब 130 सालों बाद भी आज ज्यों का त्यों बना हुआ है। यह डैम गर्मियों के दिनों में हल्द्वानी के भावरी क्षेत्र को पानी मुहैया कराने की मंशा से बना था। हर साल 15 मई से 30 जून तक इस बॉध से रोजाना 50 क्यूसेक पानी गौला नदी में छोड़ा जाता हैं। यह व्यवस्था पिछले करीब एक सौ सालों से बदस्तूर जारी है।

सिंचाई विभाग हर साल बरसात में तालाब में 44 फीट ऊँचाई तक पानी भरता है। इससे अधिक पानी को डैम के द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है। गर्मियों के दिनों में पानी का स्तर 22 फीट आ जाने तक पानी छोड़ते रहने की व्यवस्था है। सिंचाई विभाग के इंजीनियरों के मुताबिक इस साल जाड़ों में बारिश नहीं होने के चलते हल्द्वानी के इलाके में पानी की कमी को दूर करने के लिए जून के तीसरे हफ्ते तक भी बॉध से हर रोज 50 क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है। बावजूद इसके डैम के पास 20 जून तक पानी का स्तर 26 फीट के आसपास है। दूसरी तरफ मल्लीताल की ओर से लीलावती इंटर कालेज के सामने तक तालाब का करीब 400 मीटर से ज्यादा हिस्से से पानी गायब है। तालाब के करीब एक चौथाई हिस्से में मिट्टी मलवे का ढेर जमा हो गया है। सिंचाई विभाग के अफसरों की राय में यह सब भीमताल के कैचमेंट इलाके में उग आये कंक्रीट के विशाल जंगल का नतीजा है।

दरअसल पहाड़ में फ्लैट्स और कॉटेज संस्कृति का सूत्रपात करीब दो दशक पहले भीमताल की इसी हसीन वादी से हुआ। पहाड़ की शुद्ध आवोहवा में एक अद्द फ्लैट्स या कॉटेज खरीदने के फैशन ने जोर पकडा़। जमीन व्यावसायियों और बिल्डरों की बन आई। जमीन के भाव आसमान पहुंच गये। कुछ ही वक्त में भीमताल का प्राकृतिक कैंचमेंट के इस हरे-भरे इलाके में बेतरतीब कंक्रीट का जंगल उग गया। भीमताल के तालाब के सिरहाने से लगे तमाम गॉवों में बेहिसाब फ्लैट्स, कॉटेज और कोठियॉ बन गई। यह सिलसिला फिलहाल बरोकटोक जारी है। इस सब की कीमत चुकानी पड़ रही है – भीमताल के तालाब को।

आकर्षक रंग-रोगन वाले कीमती फ्लैट्स और कॉटेजों ने न केवल भीमताल के तालाब के कैंचमेंट क्षेत्र को प्रभावित किया है, बल्कि इनके निमार्ण में निकला मिट्टी-मलुवा भी भगत्यूडा़ और खूटानी नालों के जरिये भीमताल के तालाब तक पहुंच गया है। उत्‍तराखण्ड सिंचाई विभाग के कुमाऊँ क्षेत्र के मुख्य अभियन्ता वी.सी.सी. खेतवाल के मुताबिक भीमताल के मल्लीताल वाले इलाके में चार सौ मीटर से ज्यादा लंबी, दो सौ मीटर से ज्यादा चौडी़ और डेढ़ से दो मीटर ऊंची करीब बारह हजार घन मीटर मिट्टी मलवे की परत जमा हो गई है। इसने तालाब का करीब एक चौथाई हिस्सा पाट दिया है। इस मिट्टी ने न केवल तालाब की पानी जमा करने की बारह हजार घन मीटर क्षमता कम कर दी है, बल्कि तालाब का भौगोलिक क्षेत्रफल भी कम हो गया है।

बकौल चीफ इंजीनियर खेतवाल भीमताल के तालाब को मौजूद दुर्दशा से उबारने के लिए सिंचाई विभाग ने भारत सरकार के जल संसाधन विकास मंत्रालय के पास 784 लाख रुपये की योजना का प्रस्ताव भेजा है। योजना में तालाब से मिट्टी-मलुवा निकालने के अलावा संरक्षण के और भी कई काम प्रस्तावित है। फिलहाल सिंचाई विभाग को अपनी इस महत्वाकांक्षी योजना के मंजूर होने का इंतजार है और भीमताल के तालाब को बरसात का।

लेखक प्रयाग पाण्डे उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.


इसे भी पढ़ सकते हैं – गड़बड़ सुर लय ताल उर्फ आज का नैनीताल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *