भूखंड के लिए पीआरओ की चापलूसी पर उतरे पत्रकार

 

श्रीमान, यशवंत सिंह। संपादक, भड़ास4मीडिया। विषय : राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में भूखंडों से वंचित पत्रकारों ने पिछले काफी समय से आंदोलन किया हुआ है, लेकिन कुछ तथाकथित इलेक्ट्रोनिक मीडियाकर्मियों ने अधिकारियों की चापलूसी करनी शुरू कर दी है।
 
मान्यवर, उपरोक्त विषयांतर्गत निवेदन है कि राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के पात्र पत्रकारों ने पिछले पांच सालों से रियायती दरों पर भूखंड की मांग के लिए आंदोलन किया हुआ है। राज्य सरकार ने लगभग तीन माह पहले पत्रकारों की मांग को जायज मानते हुए 62 भूखंड देने का निर्णय लिया और आवेदन जमा करवाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी। हालांकि पूर्व में भी पात्र पत्रकारों के लिए पत्रकार कॉलोनी काटी गई थी, जिनमें नियम कुछ अलग थे, लेकिन वर्तमान में नए नियमों की वजह से पात्र पत्रकार भी भूखंड लेने से वंचित रह सकते हैं। इसके लिए पत्रकारों ने जयपुर में जाकर मुख्‍यमंत्री शोक गहलोत से लेकर मंत्रियों, विधायकों, नगर विकास न्यास अधिकारी तथा वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात कर नियमों में शिथिलता की मांग की। 
 
31 जुलाई तक लगभग 120 फार्म जमा भी हो चुके हैं, लेकिन गंगानगर के सूचना एवं जन संपर्क अधिकारी (जो फाइनेंस का काम भी करते हैं, और उन्होंने लगभग अढ़ाई सौ से अधिक मुकदमें भी करवा चुके हैं) ने पत्रकारों की हितों की न सोचकर लगातार पत्रकारों के बारे में नेगेटिव सोच पाले हुए हैं। कल पीआरओ ने नगर विकास न्यास अध्यक्ष ज्योति कांडा के सामने एक नया सगूफा छोड़ा दिया। पीआरओ का कहना था पत्रकार वही होता है, जिसे राज्य सरकार ने अधिस्वीकृत कर रखा है, लेकिन हैरानी वाली बात है कि जिले में लगभग सवा सौ से अधिक पत्रकार हैं, वे अधिस्वीकृत नहीं हैं। वे सालों से श्रमजीवी पत्रकार की हैसियत से निरंतर काम कर रहे हैं।
 
कल पीआरओ से मिलने गए क्षेत्र के पत्रकार पहुंचे और सौहार्दपूर्ण बात की, लेकिन पीआरओ के शब्दबाण ऐसे थे, कि लग रहा था कि जैसे प्लॉट सरकार नहीं, बल्कि उन्होंने अपने घर से देने हों। हैरानी वाली बात है कि पीआरओ के खासमखास माने जाने वाले तथाकथित इलेक्ट्रोनिक मीडिया के चंद पत्रकार पीआरओ के सामने ही घुटने टेक गये और उनके पक्ष में उतर आए। हालंकि ये इलेक्ट्रोनिक मीडियाकर्मियों पर कई बार वसूली के आरोप भी लग चुके हैं। इन पत्रकारों के बारे में यही कहा जाता है कि वे छोटे-मोटे कार्यक्रमों की कवरेज करते हैं और पार्टी से कुछ सैटिंग कर लेते हैं। वो बात अलग है कि टीवी पर कवरेज किया हुए कार्यक्रम का प्रसारण ही नहीं होता। जब उनसे पार्टी पूछती है, तो उनका जवाब होता है 'क्या आपने रात दो बजे देखा नहीं, आपके कार्यक्रम की विशेष रिपोर्ट टीवी में प्रसारित की गई थी।'
 
इस तरह से ऐसे इलेक्ट्रोनिक मीडिया के तथाकथित रिपोर्टरों ने अपना धंधा चमकाने के लिए यह फंडा काफी समय से चलाया हुआ है। कल पीआरओ से बातचीत करते समय एक-दो इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े रिपोर्टरों ने सीधे तौर पर पीआरओ का पक्ष किया। ऐसा लग रहा था कि वे मीडिया से नहीं, बल्कि सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी से जुड़े हैं। तभी तो बार-बार पीआरओ का ही पक्ष ले रहे थे। पीआरओ भी वो, जिसके खिलाफ पूर्व में मुकदमे हो चुके हैं। जैसे-तैसे वे बहाल हुए। बहाली के बाद उन्होंने फाइनेंस का काम शुरू कर दिया। भोले-भाले लोगों को पांच प्रतिशत ब्याज के हिसाब से कर्जा देते हैं। जो नहीं देते, उन्हें मानसिक, आर्थिक रूप से परेशान करने के अलावा उन्होंने लगभग अढ़ाई सौ से अधिक मुकदमे भी दर्ज करवा चुके हैं। ऐसे में एक जिम्‍मेदार पद पर रहते हुए पीआरओ ने एक ऐसा धंधा चला रखा है, जो नियमों के विरुद्ध है। एक तरह से वे रहते तो पीआरओ ऑफिस में हैं, लेकिन काम फाइनेंस का करते हैं। … और उनका साथ देते इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े चंद तथाकथित पत्रकार।
 
जयप्रकाश मील
 
श्रीगंगानगर
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75978-27692

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