भूख की चिंता छोड़ लोगों की मदद के लिए जूझ रही है बूंद की टीम

Mayank Saxena : बूंद की 14 लोगों की एक टीम अगस्त्यमुनि इलाके के चंद्रपुरी में कैम्प कर रही है…चंद्रपुरी 12 दिन पहले तक केदारनाथ यात्रा का मुख्य रूट था…हाईवे सरीखा, जहां बड़े मार्केट थे..ठहरने के लिए रेसॉर्ट और होटल थे…खाना खाने के लिए रेस्टोरेंट थे…खूबसूरत नज़ारे थे…भीड़ थी…गाड़ियां थीं…चहल पहल थी…इस इलाके में दो पुल थे…एक पुल बाढ़ में बह गया है.

एक पुल बचा है लेकिन उसके आगे की सड़क नहीं बची है…पीछे की ओर रुद्रप्रयाग से आने वाली सड़क भी बंद है…और मयाली-तिलवाड़ा की ओर से आने वाली सड़क भी…आप अगर यहां आना भी चाहेंगे तो आपको जान जोखिम में डालनी होगी…हम 14 लोग यहां हैं…9 लोगों की एक और टीम यहां पहुंच रही है…

यहां धीरे धीरे इलाके से राशन खत्म होता जा रहा है…और इसीलिए सबसे ज़्यादा ज़रूरत यहां मूलभूत ज़रूरत की चीज़ों की है…बाकी दुनिया से सम्पर्क कट जाने की वजह से यहां पर राशन नहीं पहुंच पा रहा है…संभवतः जिनके पास राशन का स्टॉक होगा भी वो उसे बाद में ब्लैक करने की कोशिश करेंगे… ऐसे में आपसे निवेदन है कि आप एक ऐसा फंड तैयार करें, जिसके ज़रिए हम ऋषिकेश या हरिद्वार से राशन भर कर यहां पर एक जगह स्टॉक कर पाएं और लोगों को राशनिंग सिस्टम की तरह वितरित कर पाएं…

इसके अलावा कई इलाकों में पानी के दूषित हो जाने की वजह से बीमारियां फैल रही हैं…ऐसे में पानी साफ करने की किट्स की बहुत ज़रूरत है…साथ ही डायरिया, कॉलरा, टायफाइड, मलेरिया जैसी महामारियों से बचाव और लड़ने वाली दवाओं…और साथ ही कुछ वालंटियर करने वाले डॉक्टर्स की हमें बड़ी ज़रूरत है…आप इसके लिए सम्पर्क कर सकते हैं…

Deependra Raja Pandey 9871838883
Ila Joshi 9711540494
Mohit Khan 09650455337
Gaurav Gupta 09415522249

हम प्रयास कर रहे हैं कि जल्द से जल्द बूंद को एक संस्था अथवा ट्रस्ट के तौर पर पंजीकृत करवा लें, जिससे न केवल इसका एक अधिकृत बैंक खाता हो, बल्कि विश्वसनीयता और पारदर्शिता भी बढ़े (हालांकि अभी भी है)…और साथ ही दानदाताओं को टैक्स में छूट मिल सके…

ख़ैर अभी मुद्दा ये बिल्कुल नहींम…मुद्दा सिर्फ ये है कि आपकी जिस्मानी गर्मी को राहत पहुंचाने वाला उत्तराखंड अब आपके ज़ेहन को क्यों परेशान नहीं कर रहा है…क्या आप में से किसी को भी रात को नींद में उत्तराखंड की त्रासदी के बुरे सपने नहीं आते…क्या एक पल को आप हंसते हंसते ठिठक कर ये नहीं सोचते कि ये किस तरह की त्रासदी थी, जिसमें हज़ारों इंसान पलक झपकते मौत के आगोश में चले गए…

ज़िंदगी आपको बार बार मौका देती है खुद को साबित करने का…सवाल ये है कि आप अपनी ज़िंदगी को ज़िंदगी साबित होने का कितनी बार मौका दे पाते हैं…मौका है, इसे दस्तूर न बनने दीजिए…वसीम बरेलवी साहब का एक मशहूर शेर फिर मौजूं है…

उसूलों पर जो आंच आए, तो टकराना ज़रूरी है
जो ज़िंदा हो अगर, ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है.

युवा पत्रकार मयंक सक्‍सेना के एफबी वॉल से साभार.

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