भोजपुरी अकादमी का बेहयापन और मनमर्जी की ब्रांड एम्बेसेडर

पटना। भोजपुरी अकादमी के मनमानेपूर्ण रवैये के विरोध में, और भोजपुरी के आत्म-सम्मान को लेकर लडी जा रही इस लडाई में आज एक नया मोड आया, जब पटना में बकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर भोजपुरी अभिनेता मनोज तिवारी ने भोजपुरी अकादमी को उसका सम्मान वापस करने की घोषणा की। उसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में भोजपुरी लोकगायक भरत शर्मा ब्यास ने भी अपने एक प्रतिनिधि द्वारा सम्मान वापस करने की औपचारिकता पूरी की। ज्ञात हो कि बिहार के राज्यपाल डी वाई पाटिल ने 21 जुलाई को अंतराष्ट्रीय भोजपुरी सम्मेलन में तिवारी, शर्मा एवं अन्य को सम्मानित किया था। इस अवसर पर मनोज तिवारी ने कहा कि मालिनी अवस्थी अवधि गायिका हैं और उन्हें भोजपुरी को प्रोत्साहित करने के लिए एम्बेसेडर नियुक्त करना गलत है।

उन्होंने संवाददाताओं से सवाल किया – "भोजपुरी को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण योगदान देने वाली शारदा सिन्हा, भारत शर्मा या अभिनेता रवि किशन को क्यों नजरंदाज किया गया और दूसरी भाषा के कलाकार को क्यों चुना गया?" मनोज तिवारी के अनुसार मालिनी की नियुक्ति उन जैसे कलाकारों का अपमान है जिन्होंने पूरी दुनिया में इस भाषा के प्रसार के लिए बहुमूल्य योगदान दिया है। इसी मुद्दे पर भरत शर्मा ने भोजपुरिया समाज और इसके कलाकारों की हो रही उपेक्षा पर निराशा व्यक्त करते हुए सम्मान को लौटाने की घोषणा की।
 
बहारहाल, बिहार भोजपुरी अकादमी के निवर्तमान अध्यक्ष आर के दूबे ने तिवारी के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए मालिनी के चयन को जायज ठहराया है। दूबे ने आरोप लगाया कि संसदीय चुनाव करीब आने के मद्देनजर तिवारी बक्सर से चुनाव लड़ने के लिए भाजपा के करीब आने का प्रयास कर रहे हैं और इस पर विवाद पैदा कर रहे हैं ताकि नीतीश कुमार सरकार की खराब छवि पेश की जा सके। आर के दुबे ने सारी हदें तोडते हुए मीडिया के सामने बकायदा धमकी देते हुए कहा कि अगर मनोज तिवारी राजनीतिक हरकतों से बाज नहीं आए तो उन्हें काली सूची में डाल दिया जाएगा। कई टीवी चैनलों पर चल रही वार्ता में रवि कांत दुबे इस फैसले पर शारदा सिन्हा जी के स्वीकृति का रोना रोते दिखे, जबकि वास्तव में शारदा जी को इस सम्मेलन के लिये निमंत्रण तक नहीं दिया गया था। देर शाम शारदा सिन्हा जी ने स्वयं टीवी पर इस बात का खंडन किया, और बताया कि अगर उनकी राय ली गई होती, तो वो मालिनी अवस्थी की जगह भरत शर्मा जी का नाम प्रस्तावित करती।
 
दिन भर पूरी मीडिया में छाये रहे इस मुद्दे के बीच मालिनी अवस्थी बीच-बीच में कई चैनलों पर भोजपुरी गीत गाकर यह साबित करने की असफल कोशिश करती दिखाई दीं कि उन्हें भी भोजपुरी आती है, और अकादमी का फैसला सही है। जबकि वास्तविकता यह है कि अध्यक्ष ने इतना बडा फैसला लेने से पहले ना तो भोजपुरी अकादमी की कार्यकारिणी की एक बैठक बुलाई, और नाही बिहार सरकार को इस मामले में विश्वास में लिया गया। इस मामले में शिक्षा विभाग (बिहार सरकार) के प्रवक्ता एवं संयुक्त निदेशक आर एस सिंह ने बताया कि भोजपुरी अकादमी के अध्यक्ष प्रो. आर के दुबे ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर यह काम किया है। सच्चाई यह है कि सरकार की ओर से मालिनी अवस्थी को भोजपुरी भाषा का सांस्कृतिक राजदूत नहीं बनाया गया है।
 
अब सवाल यह उठता है कि बिहार सरकार के साथ-साथ पूरे भोजपुरिया समाज को गुमराह कर इस तरह की घटिया राजनीति करने वाले व्यक्ति के साथ सरकार क्या सलूक करेगी? साथ ही साथ जिस गुरूर से वह भोजपुरी कलाकारों को खुलेआम धमकी दे रहे हैं, उस से उनके चाल और चरित्र का पता चलता है। बिहार सरकार को आगे आकर बताना चाहिये कि क्या एक सरकारी संस्था का प्रमुख किसी को ऐसे खुलेआम धमकी दे सकता है? इसके साथ-साथ इस मामले में जिस तरह बिहार के माननीय राज्यपाल को गुमराह कर, अपनी मर्जी से ऐरे-गैरे लोगों को राज्यपाल के हाथों सम्मानित करवाया गया, उसकी जबाबदेही कौन लेगा? एक सरकारी संस्था की कारगुजारियों पर सुलग रहे भोजपुरिया समाज के लोगों के मन में सवाल तो कई हैं, और उन सबका जबाब बिहार सरकार को ही देना होगा।

प्रवीण सिंह की रिपोर्ट.

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