भ्रमित पटकथा वाली फिल्म ”मद्रास कैफे”

: सच्ची दुर्घटना पर आधारित फिल्म मद्रास कैफे की कहानी सच्चाई से कोसों दूर : मार्च 2007 में दिल्ली वापस लौटने के बाद से 24 अगस्त 2013 तक मैंने कुल चार फिल्में ही देखी हैं। मद्रास कैफे चौथी फिल्म थी। पहली फिल्म 'ए वेनेसडे' शाह सर के कहने पर शेखर आनंद त्रिवेदी के साथ, दूसरी फिल्म 'राजनीति' शाह सर के साथ, तीसरी फिल्म का जिक्र नहीं करुंगा। बेहतरीन अभिनय और तमाम तकनीकि खूबियों बावजूद मद्रास कैफे की कहानी, मेरी नजर से मलमल में टाट का पैबंद सरीखी है। ''मद्रास कैफे'' मेरी नजर से…

''तमिल समस्या और श्रीलंका में भारत के सैन्य हस्तक्षेप पर आधारित फिल्म ‘मद्रास कैफे’ की कहानी के तथ्य भ्रमित हैं। फिल्म की कहानी शुरु होती है कि श्रीलंका में जातीय दंगे होते हैं। लाखों तमिल भारत में शरण लेते हैं। तमिलों की हिफाजत के लिए भारत की फौज जाती है, और तमिलों से उलझ जाती है। रॉ के अफसर पर्दे के पीछे रह कर इस लड़ाई को अमली जामा पहनाते हैं और अन्ना को जिंदा या मुर्दा पकड़ने की कोशिश करते हैं। रॉ का एक भारतीय अफसर दोगला निकलता है और रॉ की कोशिशों पर पानी फिर जाता है। अखबार में छपे एक चुनाव पूर्व सर्वे से अन्ना को पता चलता है कि राजीव गांधी फिर से प्रधानमंत्री बन सकते हैं। अन्ना एक षडयंत्र रचता है। भारत की सरकार को इस षडयंत्र की जानकारी भी हो जाती है, लेकिन वो राजीव गांधी को पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराने से इंकार कर देती है। अन्ना राजीव गांधी की हत्या करवा देता है। इस फिल्म को देखकर लगता है कि घटना के वास्तविक तथ्यों को छुपाया गया है या फिल्म की पटकथा लिखने से पहले पर्याप्त शोध नहीं किया गया। फिल्म की शुरुआत में ही ‘हम अपने प्रधानमंत्री को नहीं बचा सके’- जैसा डायलॉग बताता है कि पटकथा लेखक को उपयुक्त शब्द ही नहीं मिले। जिस नेता की हत्या के बारे में यह डायलॉग है वह उस वक्त प्रधानमंत्री नहीं पूर्व प्रधानमंत्री था। यानी राजीव गंधी का जिक्र किए बिना राजीव गांधी हत्याकाण्ड का जिक्र करना भर था। श्री पेरुंबदूर में जनसभा स्थल पर राजीव गांधी की पर कतिपय कारण से पहुंचे थे, बावजूद इसके उनकी हत्या हो गई। जबकि फिल्म में रात के दस बज कर दस बजे एक्सपीएंम को निशाना बनाया जाएगा-ऐसा एक खुफिया संदेश पकड़ने का दृश्य फिल्माया गया है। फिल्म में यह भी बताने की कोशिश नहीं की गई है कि श्रीलंका में रॉ को कॉवर्ट ऑपरेशन क्यों करने पड़े? भारतीय सेना भेजने की जरूरत क्यों पड़ी ? यह तथ्य भी छिपाए गए हैं कि जब भारत ने तमिलों के लिए राहत और बचाव सामग्री हेलिकॉप्टरों के माध्यम से भेजी थी तो फिर श्रीलंकाई तमिल भारतीय शांति सेना के खिलाफ क्यों हो गए। असली कहानी तो यह है कि श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति ने शांति करार की आड़ में भारत को धोखा दिया। पहले तमिलों के खिलाफ पाकिस्तान से मदद लेने की धमकी दी। बल्कि परोक्ष रूप से पाकिस्तान की मदद भी ली और जब भारतीय सेना वहां पहुंची तो भारतीय सेना पर स्थानीय लोगों पर अत्याचार की खबरों का बढ़ा चढा कर ढिढोरा पीटा। श्रीलंकाई राष्ट्रपति ने खुद विदेशी मीडिया के सामने ऐसे तमाम आरोप लगाए। श्रीलंकाई राष्ट्रपति और सरकार ने भारतीय फौज को तमिल और सिंहली दोनों की नजर में दुश्मन साबित कर दिया। फिर श्रीलंका सरकार ने विदेशी मध्यस्थों के जरिए लिट्टे को संदेश भेजा कि भारत की मंशा सिंहली और तमिल दोनों पर ही नहीं बल्कि जाफना पर पूरा नियंत्रण करना है। इस बात के कुछ सच्चे झूठे सुबूत भी भेजे। इतना ही नहीं श्रीलंका सरकार ने लिट्टे से एक गुप्त समझौता भी किया। इस समझौते के तहत श्रीलंका सरकार ने लिट्टे को अरबों डालर और भारी मात्रा में गोला बारूद और मध्यम और भारी हथियार, फाइटर जेट तक मुहैया कराए। श्रीलंका सरकार ने अपनी फौज को ये भी निर्देश दिए कि लिट्टे से युद्ध की स्थिति में भारतीय शांति सेना को लिट्टे के बारे में कोई भी सही सूचना और सहायता न दी जाए। ये वो समय था जब भारत का नाकारा खुफिया तंत्र और रॉ और राजनयिक अधिकारी कान में तेल डालकर बैठे थे। वो समझते थे कि लिट्टे (फिल्म में एलटीएफ) सर्कस का टाइगर और वो रिंग मास्टर हैं। इन सारे तथ्यों को इस फिल्म से गायब ही कर दिया गया है। फिल्म में रॉ और इनटेलिजेंस को ‘हीरो’ बनाकर पेश किया है, और एक अधिकारी को दगाबाज दिखा कर सारी नाकामियों का ठीकरा उसके सिर पर फोड़ दिया गया। जबकि सच्चाई यह है कि जाफना में सैन्य हस्तक्षेप चाटुकार चौकड़ी से घिरे अकुशल प्रधानमंत्री राजीव गांधी की अदूरदर्शिता और भारतीय खुफिया तंत्र की सबसे बड़ी चूक का नतीजा थी। एक सच्ची दुर्घटना पर आधारित फिल्म ‘मद्रास कैफे’ की कहानी के अधिकांश सच्चाई से कोसों दूर हैं। पटकथा के भौंडेपन का एक नमूनाः रॉ के एक पूर्व अफसर (दिबांग) के पास बाला (रॉ का दगाबाज सीनियर) के खिलाफ सुबूत होते हैं। रॉ का यह पूर्व अफसर, दगाबाज के खिलाफ सुबूत भारत सरकार को देने के बजाय एक विदेशी मीडिया की जर्नलिस्ट को मुहैया करवाता है, उसका ‘सोर्स’ बन जाता है।''

लेखक राजीव शर्मा कई अखबारों और चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. संपर्क: 09968329365


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