भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ एक लड़ाई और!

सरकार जनता को मूर्ख समझती है या जनता वास्तव में भोली है जो इन राजनेताओं की बातों में आ जाती है। अन्ना के आंदोलन और सरकार के नाटक से तो यही बात सामने आ रही है कि राजनेता नहीं चाहते कि इस देश में कोई ऐसा कानून बने जो आम आदमी को भ्रष्टाचार के विरुद्घ लडऩे की ताकत दे। मगर सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्थायें ऐसी ही चलती रहेंगी या इसमें परिवर्तन होगा। क्या इस देश का आम आदमी अपना शोषण होते यूं ही देखता रहेगा या व्यवस्था के विरुद्घ उठ खड़े होने का संकल्प लेगा। इस बार रामदेव और अन्ना दोनों मिलकर आंदोलन की शुरुआत कर रहे हैं। अगर यह आंदोलन सफल हो गया तो इस देश में परिवर्तन का एक नया दौर शुरू होगा। जिसमें भ्रष्टाचारियों को इस व्यवस्था में कोई जगह नहीं होगी।

अन्ना आंदोलन ने इस देश में कई नयी बहस को जन्म दिया है। जिस समय अरविंद केजरीवाल ने लोकपाल विधेयक का ड्राफ्ट तैयार किया था, उस समय स्वयं केजरीवाल को अंदाजा नहीं था कि लोकपाल विधेयक पर पूरे देश में इतना जनमत तैयार हो जायेगा। सरकार भी इस विधेयक की मांग को बेहद हल्के ढंग से ले रही थी। सरकार को लग रहा था कि जो विधेयक चालीस वर्ष से लंबित है अब उस पर कोई नया हंगामा भला क्या होगा। मगर राजनेता यह सोचने में नाकाम रहे कि इन चालीस सालों में देश का मिजाज पूरी तरह बदल चुका है।

देश के लोग पिछले कई सालों से शासनतंत्र की अराजकता को झेल रहे थे। गरीबों के हितों को चलायी जाने वाली कल्याणकारी योजनायें दम तोड़ रही थीं। बीते कुछ सालों में भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया। केन्द्र सरकार का मंत्री एक लाख छियत्‍तर हजार करोड़ रुपये का घोटाला करता नजर आया। शहीदों के लिए बन रही आदर्श सोसाइटी का मामला हो या फिर राष्ट्रमंडल देशों के खेल में घोटाले का। हर तरफ घोटाला ही घोटाला। ऐसा लगने लगा कि मानो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भ्रष्टाचारियों के सरदार बन गये हैं।

यह स्थितियां आम आदमी को बेहद दुख दे रही थी। उसे लग रहा था कि उसके साथ लगातार छलावा किया जा रहा है। होना यह चाहिए था कि सरकार को खुद आम आदमी का ध्‍यान रखना चाहिए था। चुनाव से पहले कांग्रेस ने नारा भी दिया था कि आम आदमी का हाथ-कांग्रेस के साथ। मगर कांग्रेस सत्‍ता में आने के बाद इसी आम आदमी को भूल गयी। सरकार के चारों ओर भ्रष्ट अफसरों और नेताओं की पूरी जमात खड़ी हो गयी। परिणाम यह रहा कि इस देश का आम आदमी निराश हो गया। उसे लगा कि उसकी बात सुनने वाला कोई नही है।  हताशा के इस दौर में अन्ना ने अपनी लड़ाई की शुरुआत की। अन्ना ने आम आदमी के दर्द को समझा। उन्हें समझ आ गया कि इस देश का नेतृत्व आम आदमी के दर्द को कभी महसूस नही कर सकता। अन्ना के आंदोलन को शुरुआती दौर में सरकार ने हल्के ढंग में लिया। मगर इसके बाद जिस तरह से पूरे देश में इस आंदोलन के समर्थन में जन सैलाब उमड़ा उसने सरकार की नींदे उड़ा दी। लिहाजा जब अन्ना आमरण अनसन पर बैठे तो सिर्फ बारह दिन में पूरी सरकार हिल गयी।

संसद में सभी लोगों ने एक मत से लोकपाल बनाने की बात मान ली जिसके बाद ही अन्ना ने अपना आंदोलन समाप्त किया। मगर जैसे जैसे इस बिल को लोकसभा में तो पास करा दिया गया मगर राज्य सभा में यह बिल सरकार की शह पर लटक गया। जानबूझकर इसे आखिरी समय रखा गया और संसदीय परम्पराओं तथा लोकतंत्रिक मर्यादाओं को तार तार करते हुए इसकी राज्य सभा में न केवल कॉपियां फाड़ी गयी बल्कि कुछ सदस्यों द्वारा अमर्यादित आचरण भी पेश किया गया। जिसके बाद यह बिल अटक गया। इस बीच सरकार ने अन्ना टीम को बदनाम करने में कोई कसर बाकी नही रखी। चाहे अरविंद केजरीवाल की नौकरी से छुट्टी का मामला रहा हो या फिर किरण बेदी के हवाई टिकटों में छूट का मामला। पूरी सरकार इन मुद्दों पर अन्ना टीम को लगातार बदनाम करती नजर आयी। सरकार की कोशिश थी कि किसी भी तरह अन्ना टीम को बदनाम किया जाये। जिससे लोगों में अन्ना और उनकी टीम के प्रति आस्था कम हो सके और लोंगो का ध्‍यान लोकपाल के मुद्दे से हटाया जा सके। मगर यह कोशिशें ज्यादा परवान नहीं चढ़ सकीं।

इसी बीच बाबा रामदेव ने काला धन वापस लेने के मुद्दे पर दिल्ली में आंदोलन किया और सरकार ने बर्बरतापूर्वक उसका दमन किया। बाद में सुप्रीम कोर्ट की इस आंदोलन को कुचलने की कोशिश पर की गयी टिप्पणी ने सरकार को फिर शर्मसार किया। इसके बाद अन्ना और बाबा रामदेव ने तय किया कि अगर सरकार के खिलाफ लडऩा है तो साझा मंच तैयार करना पड़ेगा। हालांकि रामदेव के साथ खड़े होने में अन्ना टीम के कुछ सदस्यों को ऐतराज था। इसके पीछे मुख्य कारण यह था कि उनका मानना था कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े कुछ लोग रामदेव के साथ मंच साझा करना चाहते थे। मगर अन्ना ने तमाम आशंकाओं को धता बताते हुए बाबा रामदेव के साथ आंदोलन की शुरुआत करने की घोषणा कर दी।

जाहिर है आने वाले कुछ दिन सरकार के लिए बेहद परेशानी भरे होने वाले हैं। सरकार हर मोर्चे पर विफल नजर आ रही है सरकार की आघ्थक नीतियां पूरी तरह विफल हो गयी हैं। बढ़ती हुई महंगाई ने आम आदमी का जीवन दुभर कर रखा है। सरकार के सहयोगी दल भी उससे नाराज हैं। रोज खुल रहे नये-नये घोटालों से लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है। ऐसी स्थितियों में अगर अन्ना और बाबा रामदेव भारत का काला धन देश में वापस लाने और लोकपाल विधेयक को लागू करने की बात करेंगे तो जाहिर है कि देश में बड़ी संख्या में लोग इस बात का जन समर्थन करेंगे।

सरकार को भी यह समझ में आ जाना चाहिए कि जनता को बहुत दिनों तक मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। जिन मुद्दों पर अन्ना और बाबा रामदेव आंदोलन कर रहे हैं वह आम आदमी की जिंदगी और उसके हितों से जुड़े मुद्दे हैं। अगर सरकार इन मुद्दों की उपेक्षा करती है तो उसे आम आदमी के गुस्से का सामना करना पड़ेगा। भले ही अन्ना टीम के कुछ लोग ठीक न हों और रामदेव संघ के चेहरे हो। मगर यह लोग जो मुद्दा उठा रहे हैं वह इस देश के स्वाभिमान से भी जुड़ा है और यह देश अपने स्वाभिमान से कभी समझौता नही कर सकता।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं. यह लेख उनके अखबार में प्रकाशित हो चुका है.

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