मंचों पर क्रांतिकारी दिखने वाले हिंदी के संपादकों का ये है चयन बोध!

Umesh Chaturvedi : हिंदी के संपादक आम मंचों पर बड़े क्रांतिकारी दिखने की कोशिश करते हैं..लेकिन उनके यहां प्रकाशन के लिए जिन सामग्रियों का चयन होता है वे हैं- चीन में माओ से परहेज, उद्योग और अनपढ़ लोगों की वजह से बढ़ता धुआं, नारायण सामी के बयान पर विवाद का पटाक्षेप, सरकार के कदमों से आएंगी खुशियां..सखेद नामंजूर करने वाले विषय हैं- दिग्विजय और यशवंत के विवादित बयान, कैग के खिलाफ सरकार..महंगाई बढ़ी, लेकिन सरकार की भौहों पर बल नहीं…कहने का मतलब यह कि आंखें खोलने वाली सच्चाइयों से हिंदी पत्रकारिता का वैचारिक पक्ष लगातार दूर…पता नहीं गणेश शंकर विद्यार्थी, माधव राव सप्रे और पराड़कर जी की आत्माएं उपर क्या सोच रही होंगी…लगता है हिंदी पत्रकारिता को के उद्धार के लिए फिर किसी प्रभाष जोशी जैसे पत्रकार और राम नाथ गोयनका जैसे प्रोमोटर की जरूरत है।

    Umesh Pathak saty vachan chaturvedi ji! ham sabhi koshne me lage rahte hain kuchh karne ki bajay aur agar kiya bhi jaye to dhang ke kam ko akhbar me jagah bhi kam hi mila karti hai.
 
    Baliram Singh bilkul sahi sir….
 
    Saurabh Mahajan sir kya aaj yeh possible hai … when market has overtaken or runs media it is a noble thought only

वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से साभार.

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