मकसद से विमुख भारतीय सत्ता के सुल्तान

आतंकी हमले की आशंकाओं के बीच खामोशी से एक और स्वतंत्रता दिवस गुजर गया। वक्त आ गया है हम बीते समय का फिर से मूल्यांकन करें और कुछ असहज सवालों से रूबरू होने की कोशिश करें। यह ज्ञात तत्थ्य है कि दुनिया जिन परेशानियों में फंसी है, उसके पीछे जिम्मेवार बस एक देश है। बात चाहे आर्थिक मंदी की हो या आतंकवाद के आविर्भाव की या फिर असंतोष की बारहमासी चूहादौड़, इसके पीछे कोई और नहीं, बल्कि अमेरिका है, साथ ही यह भी सच है कि अगर कोई देश इस द्वंद की स्थिति से दुनिया को उबारने की हैसियत रखता है तो वह देश भी अमेरिका ही है।

तब ऐसी क्या वजह है कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति शपथ ग्रहण समारोह के बाद राष्ट्र को पहली बार संबोधित कर रहे थे, तो पूरी दुनिया उन्हें सांस थामे सुन रही थी…। और ऐसा क्या है कि जब ज्यादातर शिक्षित भारतीय, जिनकी राजनीति में जरा भी दिलचस्पी है, बराक ओबामा के प्रति इतनी दिलचस्पी रखते हैं और यू-ट्यूब पर जाकर उनके भाषण को बार-बार सुनना पसंद करते हैं। जबकि भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को संबोधित कर रहे होते हैं तो वह बस आई गई बात होकर रह जाती है। कोई भी उसे सुनने की जहमत नहीं उठाना चाहता। उसे इससे कुछ प्रेरणा हासिल हो, इस बात की वह जरा भी परवाह नहीं करता। बहरहाल भले ही इसका कोई सीधा-सादा जवाब मुमकिन नहीं हो, लेकिन यह दावा किया जा सकता है कि अमेरिका के राष्ट्रपति प्रोटोकाल से निर्देशित नहीं होते और इस तरह जब वह भाषण देते हैं तो सिर्फ वह उस कागज को नहीं पढ रहे होते हैं जो उनके मातहत के द्वारा तैयार किया गया होता है, बल्कि भाषण उनके दिल से निकली आवाज होती है और उनमें से प्रत्येक में ज्ञान और समय की परिणति देखने को मिलती है। जब ये बातें पूरे भाव के साथ कही जाती हैं तो उससे न केवल राष्ट्र प्रभावित होता है, जिसके वोट के बूते वह राष्ट्रपति पद की गरिमा बढा रहे होते हैं, बल्कि पूरी दुनिया पर इसका असर देखने को मिलता है

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के लिए यह महज उनका काम भर नहीं है, बल्कि उनके दिमाग में अमेरिका की बेहतरी और बेहतर विश्व के लिए जो कुछ भी चल रहा होता है, उस खास मकसद की एक झलक है। यह सिर्फ ओबामा या उनके भारतीय समकक्ष की बात नहीं है। यह उस विरासत की बात है, जिसका अमेरिका अनुशरण करता है और यह नए विचारों को सही दिशा में पोषण करने के प्रयोग के बारे में है, तभी कोई माइक्रोसॉफ्ट जन्म लेता है। आरेकल या इंटेल जैसी कंपनियां जन्म लेती हैं। भारत में जब भी कोई नया विचार सामने आया, जो कि परंपरा से थोडा भी हटकर था, तो सामाजिक संस्थाओं ने उसे इस हद तक लताडा कि पिछले छह दशक के दौरान असंख्य प्रतिभाशाली लोग, जिनके पास कुछ अलग करने और बेहतर भारत बनाने की योजना थी, उन्हें पूरी तरह से खारिज कर दिया गया। उनमें से कई लोगों ने अमेरिका और यूरोप की राह पकडी और वहां के दो करोड के ज्यादा के संख्या वाले मजबूत आप्रवासी भारतीय समुदाय का हिस्सा बन गए। यह गौर करने वाली बात है कि विदेशों में बसे आप्रवासी भारतीय समुदाय के लोगों की परिसंपत्ति एक खरब डॉलर, जो कि तकरीबन भारत के पूरे सकल घरेलू उत्पाद के बराबर है। अगर भारत उनकी सही सहायता करता और उन्हें दरकिनार या अनदेखी नहीं करता तो आज जो देश की दो सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी दर है, वह इससे तकरीबन दोगुनी ज्यादा होती और आज भारत जितना बेहतरीन देश है, उससे कहीं ज्यादा बेहतरीन देश होता। ले-देकर बात हमारे राजनीतिक नेतृत्व को दिल से कुछ कहने और राष्ट्र को प्रेरित करने की अक्षमता पर आकर रुक जाती है। जिन दिन भारत को यह इल्म हो जाएगा कि समस्या अजूबा नहीं है। प्रोटोकाल को अलग-थलग करने व लिखे नियम कायदों के साथ प्रयोग करने में कुछ नुकसान नहीं है और प्रधानमंत्री काम को मकसद के तौर पर करना शुरू कर देंगे और ओबामा की तरह बोलना शुरू कर देंगे—उस दिन भारत को बदलाव के बारे में सोचने की जरूरत नहीं पडेगी। इसलिए कि तब तक भारत राष्ट्र के रूप में बदल चुका होगा और लोग ऐसा मानने भी लगेंगे।

लेखक अतुल कुशवाह नई दुनिया मीडिया, ग्वालियर से जुड़े हुए हैं.

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