मजीठिया वेतन बोर्ड को लेकर श्रम विभाग का नरम रवैया

लंबे समय से कलम के माध्यम से समाज को इंसाफ दिलाने वाले पत्रकार कब तक अपने इंसाफ के लिए तरसेगे। भारत सरकार ने एक सराहनीय कदम उठाते हुए मजीठिया वेतन बोर्ड का राजपत्र तो प्रकाषित करा दिया और इसे हर जिले के श्रम विभाग में पहुंचा दिया लेकिन इसे मानने वाला कौन है।  अब श्रम विभाग बोलता है कि अपने ऊपर होने वाले अत्याचार खुद साबित करों। जब प्रेस मालिक कैश पेमेन्ट देते है कर्मचारियों के पास कोई ऐसा दस्तावेज ही नहीं होता जिससे वह सिद्ध कर सके कि वह अमुक प्रेस का कर्मचारी है तो उसे इंसाफ कौन दिला सकता है। सरकार ने एक कानून बनाकर अपने कर्तव्य से इतिश्री कर ली। क्या कानून बनने से सब कुछ ठीक-ठाक हो सकता है।

कौन समझेगा पीड़ा
पत्रकारों की पीड़ा समाज के सामने कौन ला सकता है क्योंकि व्यापारी नुमा पत्रकार समाज के ठेकेदार बन गए है। उन्हें धर्म से नहीं धंधे से मतलब है। दरअसल मीडिया संस्थान के मालिक उसे कहावत जैसे है कि सौ-सौ चूहों को मारकर बिल्ली चली हज को। जी हां संस्थान के मालिक बाहर ऐसे भाषण देते है जैसे इनसे बड़ा धर्मात्मा कोई नहीं है और अंदर इतने हैवान हो जाते है कि पत्रकारों से ही शराब पीकर गाली गलौच करते है। तीन चार माह बाद वेतन देते है। और सरकार की तारीफ में दो चार कसीदें पढ़ देते है और एक कंपनी खुलने की एनओसी मिल जाती है।  

3 सालों से सिर्फ आस
मजीठिया वेतन बोर्ड का लाभ पत्रकारों को 2010 से देने का फरमान है लेकिन पत्रकार 3 साल से सिर्फ आस की घूट पीकर जी रहे है। न्यायालय भी है तो ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर लंबा समय ले रहा है। जब न्याय ही इतना महंगा और देर होगा तो मरीज का क्या होगा। मीडिया जगत मे युवाओं को यह प्रलोभन देकर जोड़ा जाता है कि इसमें इतना ग्लैमर है, उक्त संपादक को देखों कितना नाम है कितना पैसा है। लेकिन कोई ये नहीं बताता कि कर्मचारियों के साथ कितना शोषण है। श्रम आयोग के दिषा-निर्देषों की कैसे खिल्लियां उड़ायी जाती है। कई प्रेस मालिक ऐसे है जिनके पास कल तक कुछ नहीं था और आज उनके पास अरबों की संपत्ति है कंपनियां खड़ी हो रही है। सिर्फ पत्रकारों का खून चूसकर और जब वेतन देने की बात आती है तो उनके साथ अन्याय हो रहा है।

कैसे करें दावा
यदि किसी संस्थान के कर्मचारी मजीठिया वेतनमान पाना चाहते है तो सामूहिक में एक पत्र सहायक श्रम आयुक्त को लिखकर मजीठिया वेतनमान की मांग कर सकते है। सहायक श्रमायुक्त का कार्यालय कलेक्टोरेट में होता है। इस पर सहायक श्रमायुक्त उक्त संस्था के मलिक को वेतन देने के लिए निर्देश देता है। इस दौरान कार्यवाही नहीं की जाती अपितु समझाइस दी जाती है। लेकिन यदि मालिक फिर भी बात नहीं मानता तो सहायक श्रमायुक्त मामले को लेबर कोर्ट में पेश कर देता है। जिसके बाद जज मनमानी जुर्माना कर सकता है। वहीं यदि एक व्यक्ति को उक्त वेतनमान चहिए तो वह उपस्थिति पंजियन वीडियो फुटेज या कुछ ऐसा दस्तावेज प्रस्तुत कर एक साधारण कागज में आवेदन दे सकता है। आवेदन के समय किसी प्रूफ या दस्तावेज की भी जरूरत नहीं क्योंकि शुरूआत में मान मनौवल वाली बात चलती है, फिर भी बात नहीं बनी तो मामला कोर्ट जाता है जहां कर्मचारी को सिद्ध करना पड़ता है कि वह उक्त संस्था का कर्मचारी है। हां खास बात यह है कि मजदूरी भुगतान संबंधि मांग विधिक सेवा के अंतर्गत आती है जिससे तहत कोर्ट तहसील न्यायालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कर्मचारी के पक्ष निःशुल्क लड़ाई लड़ती है। अर्थात् पूरी लड़ाई निःशुल्क होती है।   

क्या करना चाहिए
पत्रकारों को मजीठिया वेतनमान दिलाने के लिए श्रम विभाग को सख्त होना चाहिए। मीडिया संस्थानों के सामने जी हजूरी नहीं अपितु अपना इमानदारी से काम करना चाहिए। क्योंकि वे रेगुलर कर्मचारी है जबकि एक पत्रकार ऐसा कर्मचारी है जिसकी नौकरी का कोई ठिकाना नहीं है। और जब कही न्याय की गुहार लगाने जाता है तो कोई सुनवाई नहीं होती।

महेश्वरी प्रसाद मिश्र

पत्रकार

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