मजीठिया वेतन बोर्ड : बिना स्टे आर्डर के हो रहा गोलमाल, प्रेस मालिकों ने डकारे दस हजार करोड़

पत्रकार मजीठिया वेतनमान को तरस रहे है। सुप्रीम कोर्ट ने भी उक्त मामले की सुनवाई 12 नवंबर तक बढ़ा दी है। वहीं प्रेस के मालिक सुप्रीम कोर्ट के स्टे का बहाना बनाकर कर्मचारियों के हक पर डाका डाल रहे है। लेकिन सच ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने उक्त मामले में याचिकाकर्ताओं को कोई स्टे नहीं दिया है। गौरतलब है कि पत्रकारों को मजीठिया वेतनमान का लाभ 2010 से देने की घोषणा की गई लेकिन 2011 में उक्त मामले को सुप्रीम कोर्ट में मीडिय मालिकों ने चुनौती दी।

खास बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न याचिकाकार्तओं को कोई राहत नहीं प्रदान की, ना ही उक्त मामले में कोई स्थगन आदेश दिया, फिर भी प्रेस मालिकों ने खुद उक्त मामले पर स्टे का बहाना बनाकर कर्मचारियों के खून पीते रहे। एक अनुमान के मुताबिक मजीठिया वेतन बोर्ड के रूप में विभिन्न मीडिया संस्थानों ने कर्मचारियों के हक का 10 हजार करोड़ डकार गए और कह दिया है कि स्टे है। उल्लेखनीय है कि देश में चल रहे कुछ मीडिया संस्थान विदेशों से ताल्लुकात रखते हैं जबकि कुछ में अप्रत्यक्ष रूप से शेयरधारक हैं और कर्मचारियों के हक का यह पैसा वे विदेशों में खपा रहे हैं जिससे देश की अर्थव्यवस्था चरमराएगी ही।

खुशामदी कब तक
मजीठिया वेतन बोर्ड में सरकार ने अपना नरम रवैया अपना कर दिखा दिया है कि वह प्रेस मालिकों की हितैषी है। यदि सिर्फ कानून बनाने से सब कुछ ठीक ठाक हो जाता तो भारतीय संविधान में अन्य दो अंगों की जरूरत नहीं पड़ती। बस एक फरमान सुना दिया जाता और सब उसे मान लेते। पत्रकारों को मजीठिया वेतन बोर्ड का लाभ ना दिलाकर देश की विभिन्न राज्य सरकारों ने अपनी चापलूसी का प्रमाण दिया है जबकि श्रम विभाग के पास अधिसूचना है। यहां कार्यरत इंस्पेक्टरों को प्रेस मालिकों को नोटिस देने को कहा गया है और यदि कोई जवाब ना दे तो कोर्ट में मामला दर्ज कराने के आदेश दिए गए हैं लेकिन परेशानी ये है कि श्रम विभाग के कर्मचारी ये जानते ही नहीं कि प्रेस या मीडिया क्या होता है। कितने कर्मचारियों से चलता है। इसका मालिक कौन है। इसमें क्या-क्या कानून लगते हैं। तो नोटिस कैसे बनाएं। परिवाद किस आधार पर दायर करें।

प्रेस मिशन नहीं उद्योग है
प्रेस या मीडिया एक उद्योग है ना कि समाजसेवा का अंग। एक प्रेस लगाने के लिए सरकार 33 प्रतिशत का अनुदान देती है। यदि किसी को प्रेस चलाना है तो पहले घरेलू, कृषि या व्यवसायिक भूमि का डायवर्सन (परिवर्तन) औद्योगिक भूमि के रूप में कराना पड़ता है जो कलेक्टोरेट स्थित भू-अभिलेख शाखा से होता है। उसके बाद आवेदन पत्र, सीए द्वारा बना प्रोजेक्ट रिपोर्ट, नक्शा, बैंक की एनओसी आदि लगाना पड़ता है। वहीं यदि कोई ऐसे ही प्रीटिंग प्रेस या मीडिया संस्थान चलाता है तो अवैध है। पदों की बात करें तो प्रिंट मीडिया में संवाददाता, उपसंपादक, समाचार संपादक, संपादक, प्रबंध संपादक की गणना पत्रकार में की जाती है। जबकि विज्ञापन की टीम, कम्प्यूटर आपरेटर, प्रिंटिंग मशीन आपरेटर, पेस्टर आदि गैर पत्रकार की श्रेणी में आते है। वहीं इलेक्ट्रानिक मीडिया में रिपोर्टर, स्क्रीप्ट राइटर, कापी एडिडर, इनपुट हेड, एंकर आदि पत्रकार की श्रेणी में आते है जबकि वीडियो एडिटर कैमरामेन, प्रोडेक्शन टीम आदि गैर पत्रकार की श्रेणी में आते हैं। पत्रकार और गैर पत्रकार की परिभाषा ये हैं जो लिखने-पढ़ने वाले कर्मचारी हैं, वे पत्रकार की श्रेणी में व जो उक्त कार्य में सहयोगी होते हैं वे गैरपत्रकार की श्रेणी में आते हैं। पत्रकारों की प्रशंसा एक आम आदमी से लेकर प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति तक करते हैं लेकिन उसका फायदा मालिक लोग उठा लेते हैं।

क्यों डरते हैं पत्रकार
कलेक्टोरेट स्थित सहायक श्रमायुक्त कार्यालय में मजीठिया वेतन बोर्ड दिलाने की मांग इसलिए नहीं करते क्योंकि उन्हें नौकरी से निकाले जाने का डर रहता है लेकिन सच्चाई ये है कि पत्रकार को निकालने से पहले प्रेस मालिक को 6 माह पूर्व सूचना देनी पड़ती है। अन्यथा 3 महीने का वेतन अतिरिक्त में दिया जाता है। वहीं संपादक को 3 माह पूर्व सूचना देनी पड़ती। इसके लिए श्रमजीवी पत्रकार और अन्य समाचार पत्र कर्मी कानून-1955 लागू होता है। औद्योगिक अधिनियम 1947 की धारा 25 के तहत सामान्यतः किसी कर्मचारी को पूर्व सूचना के नहीं निकाला जा सकता। यदि 240 दिन से ज्यादा की सेवा कर ली है तो उसकी सेवा संतोषजनक मानी जाती है और यदि उसे निकालकर नया कर्मचारी रखा जाता है तो उसे इन्टेसन में की गई कार्यवाही माना जाता है। रही ठेके में पत्रकार रखने की बात तो बोर्ड द्वारा तय मापदंड के नीचे वेतन पर ठेका नहीं दिया जा सकता। ठेकेदार के पास कम से कम 12 कर्मचारी हो। उक्त बातें ठेकेदार श्रमिक (नियमितिकरण और उन्मूलन) अधिनियम 1970 के अंतर्गत आती है। जैसे रोड निर्माण की लागत यदि 20 लाख है तो उससे कम में कैसे ठेका होगा। ठेका श्रमिक रखने से पहले अनुमानित लागत व कार्य का ब्यौरा भी रखना पड़ता है ना कि एक सादे कागज में कुछ लिखाने से कोई गुलाम हो जाता है। उदाहरण के लिए सरकार सारे अनुबंध एक तरफ करती है और अंत में लिखती है कि अंतिम निर्णय उक्त अधिकारी का सर्वमान्य होगा लेकिन कोर्ट में फिर भी जवाब देना पड़ता है अर्थात् कुछ भी लिखा लेने से वह कर्मचारी ठेका या संविदा श्रमिक नहीं हो जाता। प्लेसमेट कर्मचारी को भी बोर्ड के अनुसार वेतन देना पड़ता है। गुमास्ता एक्ट के तहत नियम तो ये भी है कि हफ्ते में एक दिन प्रेस बंद रहेगे लेकिन संस्थान स्पेशल रविवारी पृष्ठ के नाम से पंजीयन कराकर उसी वेतन में कर्मचारियों का शोषण करते हैं और विज्ञापन अलग लेते हैं। रविवारी एक नया संस्करण हो जाता है।

महेश्वरी प्रसाद मिश्र
पत्रकार

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