मध्यप्रदेश की जनता के भाग्य में शायद विपक्षहीन सरकार लिखी है

मध्यप्रदेश की १४वीं विधानसभा का परिदृश्य लगभग साफ़ हो गया है. प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है. यह स्पष्ट हो चला है कि भाजपा ने मध्यप्रदेश को अपना अभेद्य गढ़ बना लिया है. तमाम विधानसभा उपचुनावों के बाद नगरीय निकायों में हुई भारी पराजय और अब विधानसभा चुनाव में मिल करारी शिकस्त मध्यप्रदेश में कांग्रेस की क्षमताओं का आकलन करवाने हेतु पर्याप्त है. 
 
क्षत्रपों की गुटबाजी, निचले स्तर पर कार्यकर्ताओं में सिर फुटव्वल, केंद्रीय नेतृत्व की प्रदेश से अनदेखी, संगठनात्मक क्षमताओं का ह्रास; कांग्रेस की प्रदेश में दुर्दशा के कारणों पर अच्छा-ख़ासा ग्रन्थ तैयार किया जा सकता है. कई पुराने कांग्रेसी प्रदेश में पार्टी संगठन को बंधवा बनाने की शिकायत १० जनपथ से लेकर ७ रेसकोर्स रोड तक कर चुके थे लेकिन हर बार उन्हें झूठे आश्वासनों से इतर कुछ नहीं मिला. ऐसा प्रतीत हुआ मानो केंद्रीय नेतृत्व भी मध्यप्रदेश में गर्त को प्राप्त कांग्रेसी गति से समझौता कर चुका है. कभी अल्पसंख्यक दांव तो कभी ठाकुरों की सल्तनत, कभी ब्राम्हण वोट पाने की लालसा तो कभी आदिवासियों के प्रति समर्पण का दिखावा, कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में कमोबेश हर वर्ग को छला. यही कारण है कि सर्वहारा वर्ग का कांग्रेस से मोहभंग हो गया. 
कहा जा सकता है कि अल्पकालीन लाभ हेतु दीर्घकालीन नुकसान उठाना शायद कांग्रेस की नियति बन चुका है. हालिया विधानसभा चुनाव के परिणामों को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो मध्यप्रदेश में कांग्रेस नाम की पार्टी का अस्तित्व ही नहीं बचा. जरा सोचिए, जिस राज्य में विपक्ष ही अल्पमत में हो वहां वह सरकार पर कैसे हावी हो सकता है? लगभग ९ वर्षों से राज्य की सत्ता से बेदखल कांग्रेस को अब तक तो अपनी गलतियां ढूंढकर उनका इलाज कर लेना चाहिए था, किन्तु नासूर बन चुकी गुटबाजी प्रदेश में कांग्रेस को खुली हवा में सांस तक नहीं लेने दे रही. कभी दिग्विजय सिंह की प्रदेश की सक्रिय राजनीति में वापसी तो कभी सिंधिया के प्रदेश आगमन का हल्ला, कांग्रेस का निचले स्तर का कार्यकर्ता भ्रमित था और इसी उधेड़बुन में वह किसी एक का नहीं हो पाया. न तो उसकी ताकत संगठन के काम आई और न ही नेताओं द्वारा उसका सही दोहन हुआ. शिवराज सरकार पर आरोपों की झड़ी लगाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री करने वाले कांग्रेसी वर्ष २०१३ के विधानसभा चुनाव को लेकर भी इतने आत्म-मुग्ध थे कि जीत के भावी दावे को लेकर उनका आत्म-विश्वास सारी हदें पार कर जाता था. 
 
अब जबकि कांग्रेस एक बार फिर कमजोर विपक्ष के रूप में दिखलाई दे रही है; कांग्रेस नेताओं को जनता को यह बताना चाहिए कि जिस भारी जीत का वे चुनाव पूर्व ही उद्घोष करते थे, वह उन्हें किस तरह और क्यों प्राप्त होती? पार्टी की आक्रामकता की धार को कुंद करने में इसी खोखले आत्मविश्वास ने पलीता लगाया है. बड़े नेताओं के समक्ष अपने समर्थकों की भीड़ को इकठ्ठा कर कांग्रेसी यदि यह समझते रहे कि उनकी ताकत बढ़ गई है तो यह उनकी झूठी दिलासा निकली स्वयं के लिए. एक ओर भाजपा का समर्पित कार्यकर्ता आत्मविश्वास से लबरेज प्रदेश में जीत की हैट-ट्रिक के लिए पार्टी की संगठनात्मक क्षमताओं को आगे बढ़ाने में लगा रहा वहीं कांग्रेस कार्यकर्ता अतिरेक आत्मविश्वास का शिकार हो खुद की भद पिटवा रहा. ऊलूल-जुलूल बयानबाजी से किसी की छवि पर कुठाराघात तो किया जा सकता है किन्तु चुनाव नहीं जीते जा सकते. कांग्रेसी इस तथ्य को जितना जल्दी समझ लेते, उतना अच्छा होता पार्टी के लिए. मगर अफ़सोस कि वरिष्ठ नेताओं के अहम ने पार्टी को फिर वहीं ला खड़ा किया है जहां दिग्विजय सिंह ने उसे छोड़ा था. 
 
फिर ऐसा नहीं है कि मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार के खिलाफ आक्रोश नहीं था या यहां कथित मोदी फैक्टर चला हो. प्रदेश भाजपा में गुटबाजी भी थी और एंटीइन्कम्बेंसी फैक्टर भी काम कर रहा था. फिर शिवराज-मोदी की तुलना ने भी प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक सियासी पारा गरमा दिया था. किन्तु सभी कठिनाइयों को परे करते हुए शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश में पार्टी को जो ताकत दी, उससे खुद राजनीतिक विश्लेषक भी चकित हैं. दरअसल मध्यप्रदेश में खुद में एक ब्रांड के रूप में स्थापित हो चुके शिवराज सिंह चौहान की छवि ने भाजपा की तमाम कमजोरियों को ढांक लिया. यहां तक कि स्थानीय स्तर पर विधायकों और मंत्रियों की निष्क्रियता को भी शिवराज का सौम्य व्यवहार तथा जनता से उनकी निकटता ने विस्फोटक नहीं होने दिया. भाजपा राज में  मध्यप्रदेश ने दिन दूनी-रात चौगुनी प्रगति की जिसे गाहे-बगाहे केंद्र सरकार ने भी दबे स्वर में स्वीकार किया. शिवराज सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को देश के अन्य कई राज्यों ने भी अपनाया जिससे मध्यप्रदेश की छवि बनी. कांग्रेस के पारम्परिक क्षेत्रों में भी सेंध लगाकर भाजपा और शिवराज ने यह साबित कर दिया है कि जनता का सेवक बनकर ही जनता का बना जा सकता है. यहां तक कि कांग्रेस के कई ऐसे उम्मीदवार जो अपने क्षेत्रों में मजबूत स्तम्भ माने जाते थे, वे भी हार कर घर बैठ गए. सभी ने शिव के राज को नतमस्तक होकर स्वीकार कर लिया. 
 
२००८ में मिले जनादेश से अधिक जनादेश यदि भाजपा और शिवराज को मिला है तो यह स्वीकार करने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि मध्यप्रदेश में विकास और सुशासन का गठजोड़ कांग्रेस पर भारी पड़ा है. देश की वर्तमान विकास दर ६.४८ प्रतिशत से आगे बढ़ते हुए मध्यप्रदेश ने ११.८७ प्रतिशत की जिस विकास दर को छुआ है, वह निश्चित रूप से जनहितैषी सरकार व उसके मुखिया के अथक प्रयासों का सुफल ही है. यहां तक की लोकप्रियता के पैमाने पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी भी शिव के राज की तारीफ करने से खुद को नहीं रोक सके. १० वर्षों के भाजपा शासनकाल में प्रदेश की प्रगति और विकास के मॉडल को पार्टी सुशासन के रूप में कांग्रेस शासित राज्यों में पेश करने की योजना पर कार्य कर रही है. आर्थिक व औद्योगिक निवेश के मामले में भी शिवराज ने देशी-विदेशी निवेशकों को प्रदेश में आने के लिए मजबूर किया. कुल मिलाकर शिवराज की उपलब्धियों और प्रदेश में विपक्षहीनता ने भाजपा की सत्ता वापसी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. हालांकि लोकतंत्र में विपक्ष का न होना सत्ताधारी दल की निरंकुशता को बढ़ाता है किन्तु मध्यप्रदेश की जनता के भाग्य में शायद विपक्षहीन सरकार ही लिखी है. मध्यप्रदेश के चुनाव परिणाम निश्चित रूप से कांग्रेस नेतृत्व के लिए सदमा हैं और शिवराज के राजनीतिक भविष्य के लिए संजीवनी. 
 
सिद्धार्थ शंकर गौतम
 
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