मन्ना डे, राजेन्द्र यादव, बिज्जी, ओम प्रकाश वाल्मीकि और परमानन्द श्रीवास्तव को श्रद्धांजलि

कोलकाता : पश्चिम बंग हिन्दीभाषी समाज के तत्वावधान में कोलकाता के राजस्थान सूचना केंद्र में शनिवार को प्रसिद्ध गायक मन्ना डे, साहित्यकार और हंस पत्रिका के संपादक राजेन्द्र यादव, हिंदी दलित साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान के लिए प्रसिद्ध ओमप्रकाश वाल्मीकि, हिंदी और राजस्थानी लेखक विजयदान देथा और कवि एवं आलोचक परमानंद श्रीवास्तव के निधन पर संगीत समीक्षक मीना बनर्जी की अध्यक्षता में श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गयी. 
 
मीना बनर्जी सहित राजस्थानी-हिंदी के कवि चम्पालाल मोहता ‘अनोखा’, युवा आलोचक डॉ. मनोज कुमार शुक्ल, रानी बिड़ला गर्ल्स कॉलेज के हिंदी विभाग की अध्यक्ष डॉ. पुष्पा तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार राजीव हर्ष, पत्रकार संजय बिनानी, पश्चिम बंग हिन्दीभाषी समाज के महासचिव डॉ.अशोक सिंह, संयोजक केशव भट्टड़, सहित सभी ने पुष्पांजलि देकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की. 
 
अध्यक्षता करते हुए मीना बनर्जी ने अपने श्रद्धांजलि वक्तव्य में कहा कि मन्ना डे एक सहृदय रचनाकार थे. उनकी गायकी में एक स्वाद था. कविता कृष्णमूर्ति के साथ मन्ना डे के घर पर उनसे बातचीत हुई. उन्होंने बताया कि सचिनदेव बर्मन रिहर्सल में कहते थे- ‘गाने में प्रेम घुसाओ’. मन्ना डे ने इस बात की गांठ बांध ली- वे पूरा प्रेम उड़ेल देते थे. बंगला में उनका अवदान हिंदी से ज्यादा है. बंगला में उच्चारण पद्धति को उन्होंने आन्दोलनकारी रूप दिया. उन्होंने कहा कि संगीत की नथनी से जो मोती टूट कर गिरा उसकी भरपाई नहीं हो सकती. केशव भट्टड़ ने शोक प्रस्ताव का पाठ किया और मौन पालन कर सभी को श्रद्धांजलि  दी गयी. शोक प्रस्ताव में कहा गया कि मन्ना डे हिंदी सिनेमा में मो. रफ़ी, हेमंत कुमार, तलत महमूद, मुकेश और किशोर कुमार की पीढ़ी के एकमात्र गायक थे जो अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन विभिन्न भाषाओँ में गाये गीतों के माध्यम से वे अमर रहेंगे. 
 
राजेन्द्र यादव समूचे व्यक्तित्व और लेखन में परंपरा भंजक तथा विद्रोही थे. जब देश में साम्प्रदायिकता राष्ट्रीय एकता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गयी थी तब राजेन्द्र यादव के संपादन में ‘हंस’ ने साम्प्रदायिक शक्तियों के खिलाफ जो अविस्मरणीय लड़ाई लड़ी उसके लिए देश की धर्म निरपेक्ष ताकतें हमेशा उनको ऋणी रहेगी. बिज्जी के नाम से विख्यात विजयदान देथा की प्रतिष्ठा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो गयी थी. उन्होंने राजस्थानी और हिंदी साहित्य के बीच एक मज़बूत पुल बनाया. कबीर के बाद बिज्जी हैं जिन्होनें अपने गांव की भाषा में लिखा. हिंदी में दलित साहित्य के विकास में ओमप्रकाश वाल्मीकि की महत्वपूर्ण भूमिका रही. उनकी आत्मकथा ‘जूठन’ साहित्य जगत में दलित चेतना के निर्माण का दहकता हुआ दस्तावेज़ है. इसके माध्यम से उन्होंने पूरे दलित समाज की व्यथा और पीड़ा को उजागर किया है. उनका मकसद गैरबराबरियों का खात्मा करके एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहाँ सभी को समानता का अधिकार मिल सके. परमानन्द श्रीवास्तव  हिंदी के सर्वाधिक महत्वपूर्ण आलोचकों में से एक थे. एक आलोचक के रूप में उन्होंने पचास वर्ष की कविताओं का मूल्यांकन किया था. ‘आलोचना’ पत्रिका का उन्होंने कुशल संपादन किया. साम्प्रदायिकता विरोधी मुहिम में सक्रिय हिस्सेदारी रखने वाले श्रीवास्तव के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश की आलोचना का एक अध्याय ख़त्म हो गया. 
 
डॉ. मनोज शुक्ल ने कहा कि राजेन्द्र यादव एक गहरे लोकतांत्रिक मूल्यों वालें व्यक्ति थे. वे संवाद में विश्वास करते थे. आज अकादमिक स्तर पर स्त्री विमर्श और दलित विमर्श की हो रही चर्चा को स्थापित करने में उनका योगदान महत्वपूर्ण है. वरिष्ठ पत्रकार राजीव हर्ष ने कहा कि विजयदान देथा राजस्थानी और आधुनिक साहित्य के पुल थे. उन्होंने राजस्थान की लोक कथाओं को घूम घूम कर संकलित किया. राजस्थान की हज़ारों साल पुरानी संस्कृति को उन्होंने संरक्षित किया. उन्होंने अपना गांव अपनी भाषा नहीं छोड़ी. डॉ. पुष्पा तिवारी ने कहा कि राजेन्द्र यादव ने स्त्री को विमर्श में खड़ा कर उसे एक नया फलक दिया. लोककथाओं को संकलित करने के गुरुत्तर कार्य ने देथा जी को अमर कर दिया. पत्रकार संजय बिनानी ने कहा कि देवकी नन्दन खत्री को पढ़ने के लिए लोगों ने हिंदी सीखी थी. देथाजी को पढने के लिए लोग राजस्थानी सीखेंगे. डॉ. अशोक सिंह ने संचालन किया.
 
केशव भट्टड़ 
 
मीडिया प्रभारी 
 
09330919201
 

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