मरघट भी जाऊंगा तो पैदल ही : आलोक तोमर

पिछले साल आज के ही दिन आलोक तोमर के अचानक चले जाने के बाद बहुतों ने बहुत तरीके से आलोक तोमर को याद किया. मीडिया से लेकर बालीवुड तक और राजनीति से लेकर साहित्य तक के लोगों ने आलोक तोमर के चले जाने को पत्रकारिता के लिए बहुत बड़ा झटका बताया. घरानों वाली पत्रकारिता से अलग, आलोक तोमर खुद के घराना बन गए थे. इस घराने की पहचान थी सिर्फ सच और खुला व कड़वा सच बोलना. आलोक तोमर के पत्रकारीय घराने से दीक्षित बहुत सारे लोग आज पत्रकारिता में अच्छा खासा मुकाम बना चुके हैं. लेकिन कोई दूसरा आलोक तोमर नहीं बन सका.

वजह ये कि आलोक तोमर नाम उस चीज का है जो जहां रहता है वहीं की कमियों, दिक्कतों, बुराइयों, गड़बड़ियों पर पूरी बेबाकी से कलम चला कर सबको सन्न और स्तब्ध कर देता था. सन्न और स्तब्ध इसलिए क्योंकि लोग जिन चीजों को ढंकने छुपाने में अपनी बलिहारी मानते समझते थे, उन दुनियादर व्यवहारिकता की धज्जियां उड़ा देना आलोक तोमर का शगल था. आलोक तोमर ने बहुत कुछ लिखा और उनके लिखे का असर काफी दूर तक गया. उनके लिखे कुछ लेख जो भड़ास पर प्रकाशित हो चुके हैं, दुबारा दिए जा रहे हैं ताकि आप आज उनकी पहली पुण्यतिथि पर, उन्हें पढ़कर याद कर सकें और सोच महसूस कर सकें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

….आलोक तोमर के लिखे कुछ लेख….

मरघट भी जाऊंगा तो पैदल ही : आलोक तोमर

कैंसर से जो जूझे, वो कैंसर के पीछे की गणित बूझे

ईश्वर न करें आपको कैंसर हो

 

 
 

 

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