मर्डर के एक मामले में इंदु शेखर पंचोली पर बड़ा अहसान किया था वकील भगवान सिंह चौहान ने

अजमेर अदालत लिपिक भर्ती भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे वकील भगवान सिंह चौहान का लखनउ अमर उजाला के संपादक इंदु शेखर पंचोली पर बहुत भारी अहसान है। चौहान की मदद से ही पंचोली हत्या के आरोप से बरी हो पाए थे। नब्बे के दशक की शुरुआत की बात है। पंचोली उन दिनों दैनिक नवज्योति, अजमेर में रिपोर्टर थे। कुछ ठेकेदार दोस्तों के साथ बजरी की ठेकेदारी में पार्टनर बन गए थे। सभी की मौजूदगी में एक दिन काम और हिसाब को लेकर विवाद हुआ और एक मजदूर की जान चली गई।

पंचोली ने अपने रसूखात का इस्तेमाल किया। आदर्श नगर थाना पुलिस ने ना तो एफआईआर में नाम दर्ज किया और ना ही चार्जशीट मे नाम आने दिया। अदालत में मुकदमा चलता रहा। हत्या के इस मुकदमे का फैसला लिखाते समय सेशन जज कन्हैया लाल व्यास ने पाया कि गवाह घटनास्थल पर पंचोली के होने, मृतक को धमकाने, उसे धक्का देने की बात कहते हैं परंतु पंचोली मुकदमे में ना अभियुक्त है और ना ही गवाह? आखिर यह पंचोली है कौन? और उन्होंने फैसला सुनाने की जगह अदालत के सामने आई साक्ष्य के आधार पर पंचोली को हत्या का संदिग्ध अभियुक्त मानते हुए उनके गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए।

उन दिनों अजमेर नगर परिषद के सभापति थे वीर कुमार। युवा थे। पेशे से वकील थे और बहुत व्यवहारकुशल थे। पत्रकारों से स्वाभाविक रूप से काफी प्रेम रखते थे। इतना कि कई पत्रकारों के बच्चों की स्कूल फीस, घर का राशन, मकान निर्माण तक में जी खोलकर मदद किया करते थे। पंचोली ने सारा मामला उन्हें बताया। वीर कुमार ने सबसे पहले जिला जज से मुलाकात की। वीर कुमार के व्यवहार के चलते अदालत ने पंचोली को गिरफ्तार करने की जगह अदालत में समर्पण करने पर जमानत मंजूर कर ली। पंचोली के खिलाफ अदालत ने हत्या का प्रसंज्ञान लिया और मुकदमे की दुबारा सुनवाई शुरू की।

इस मुकदमे में भगवान सिंह चौहान एक अभियुक्त के वकील थे। वीर कुमार ने भगवान सिंह चौहान से मदद मांगी। मृतक के परिवारजनों से भी बात की गई। कुल मिलाकर तय हुआ कि पंचोली रूपए दे तो परिवादी और बाकी अभियुक्त अपने बयान बदल देंगे। वीर कुमार का साफ कहना था कि मामला पत्रकार का है इसलिए जो भी रूपए दिए जाएंगे वे पंचोली नहीं बल्कि वीर कुमार को ही भुगतने होंगे। लिहाजा कम से कम रूपयों में सौदेबाजी हुई। रूपए दिए गए। तय हुआ उस हिसाब से वकील चौहान ने ऐसे बयान कराए जिससे पंचोली को मदद मिल गई और अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। इसके बाद भी वीर कुमार और भगवान सिंह चौहान ने पंचोली की मदद की और फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील नहीं होने दी। इस फैसले के एक-आध साल बाद ही हार्ट अटैक से वीर कुमार का निधन हो गया। 

उपरोक्त पत्र भड़ास के पास किसी सज्जन ने मेल के जरिए भेजा है. इससे संबंधित आर्टिकल ये है–

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