महाराणा प्रताप को भारत के बारे में पता भी था या नहीं?

Shambhunath Shukla : आज से सोनी टीवी पर एक सीरियल भारत का वीर पुत्र महाराणा प्रताप का प्रसारण शुरू होगा। मुझे समझ नहीं आ रहा कि महाराणा प्रताप को भारत के बारे में पता भी था या नहीं? अगर पता होता तो वे अकबर के प्रस्ताव का विरोध न करते। असली भारत की अवधारणा इस देश में पहली दफे अकबर ने ही पेश की थी। उसके पहले के दिल्ली सुल्तान बस दिल्ली के ही सुल्तान थे जिसके तहत दिल्ली और इलाहाबाद तक का दोआबे का हिस्सा आता था। अगर किसी को भारतपुत्र कहलाने का हक है तो सिर्फ अकबर को।

अगर राणा प्रताप जीत जाते तो क्या होता? राणा प्रताप के वंशजों ने तो अपनी रियासत बचाने के लिए पाकिस्तान जाने का प्रस्ताव रखा था। वो तो सरदार पटेल ने उनकी चलने नहीं दी। और उनके पूर्वजों ने दिल्ली की गद्दी के पतन के लिए बाबर को बुलाया था। अकबर यह बात समझता था इसीलिए उसने राजपूताने की सारी रियासतों को दिल्ली के बादशाह के अधीन रहकर काम करने की रणनीति बनाई थी। अगर बाद के मुगल बादशाह अकबर जितने ही दूरदर्शी और रणनीतिक होते तो न तो शिवाजी अपनी स्वतंत्र रियासत बना पाते और न ही मराठों के जुल्मों से तंग जनता राजनीति निरपेक्ष हो जाती। इसी का नतीजा था ईस्ट इंडिया कंपनी का देश पर कब्जा। अकबर के बाद कोई और इस बात को समझ पाया था तो वे थे जवाहर लाल नेहरू। पर वे भी लास्ट मुगल ही साबित हुए।

    Pankaj Srivastava वैसे राणा प्रताप के बेटे अमर सिंह को बात समझ में आ गई थी। वो अकबर के दरबार में पांच हजारी मनसबदार बना। ….खैर, अपने क्षेत्र की स्वतंत्रता या आजादी के लिए संघर्ष करना (जब देश का मौजूदा स्वरूप नहीं था) भी एक मूल्य है जिसके लिए राणा प्रताप को सलाम किया जाना चाहिए। खतरा ये है कि ये सीरियल कहीं हिंदू-मुस्लिम संघर्ष का भाव ना भरे….ये याद दिलाना जरूरी है कि राणा के सेनापति का नाम हकीम खां सूर था और अकबर की सेना की कमान राजपूत राजा मान सिंह के हाथ थी….

Harishankar Shahi उस समय भारत था भी क्या? अपनी सामंती ठसक को बचाने के लिए सारी बहादुरी थी…

Pankaj Srivastava वो सोलहवीं शताब्दी थी भाई। सामंतवाद उस दौर की हकीकत थी। किसी भी देश को इतिहास के ऐसे चरणों से गुजरना पड़ता है। भारत भी अपवाद नहीं है। लेकिन इक्कीसवीं सदी के मूल्यों और विचारों की कसौटी से 16वीं सदी को कसना जायज नहीं है।

Shambhunath Shukla श्री पंकज श्रीवास्तव, उस समय तक सांप्रदायिकता का भी जन्म नहीं हुआ था इसलिए कौन किसका सेनापति था इससे आप कोई सद्भाव की कल्पना नहीं कर सकते। इब्राहीम लोदी के पतन के लिए राणा सांगा ने बाबर को आमंत्रित किया था। उनका मकसद कोई हिंदू राज कायम करने का नहीं था वरन् वे तो सोच रहे थे कि बाबर को पैसा चाहिए जिसे अदा कर वे दिल्ली पर राज करेंगे। लेकिन बाबर को दिल्ली भा गया और वो यहीं का हो के रह गया। वैसे बाबरनामा में बाबर ने सारे हिंदुस्तानियों को बेवकूफ और जाहिल बताया है उसमें हिंदू भी है और मुसलमान भी।

Harishankar Shahi भाई जी हाँ सही है कि बात सोलहवीम शताब्दी की है लेकिन उनका नायकत्व जो थोपा जा रहा है. उसमें उनके आज के भारत के नायक कैसे माना जायेगा. उस शताब्दी के आधार पर अगर नायक बनेंगे तो आज और तब का मूल्यांकन तो होगा ही…

Ajay Singh हमें तो विश्वास नही होता कि आप ऐसा लिख सकते हैं ।अगर आप उस समय होते तो दरबारी बनना पसन्द करते क्या ? परानधीनतापूर्ण यह लेख हटा लीजिये शुक्ल जी ।

Pankaj Srivastava सर, विनम्रता से कहना चाहूंगा कि भारत में सांप्रदायिकता अपने शास्त्रीय अर्थों में बहुत पहले से थी। शैवों और वैष्णवों का खूनी संघर्ष भी सांप्रदायकिता ही थी और बौद्धों के साथ हुआ संघर्ष भी।…..बहरहाल, मेरा अंदेशा सिर्फ इतना है कि इतिहास के किस्सों का इस्तेमाल वर्तमान को सांप्रदायिक बनाने के लिए ना हो…इसीलिए हकीम खां सूर की बात बतानी जरूरी है। जैसे शिवाजी के बारे में ये बताना चाहिए कि उनकी शक्ति का एक स्रोत बीजापुरी मुस्लिम सैनिक भी थे।….

Khalid Aslam Very true …hats of to u sir !!!

Pankaj Srivastava हरिशंकर साही…आजादी 16वीं सदी का ही नहीं, इस सदी का भी मूल्य है…बल्कि जब तक मनुष्य रहेगा इस भाव को छोड़ेगा नहीं…इसलिए आजादी के लिए संघर्ष करने वाले प्रेरणा देंगे…फिर चाहे राणा प्रताप हों या टीपू सुल्तान…इतिहास जैसा है, वैसा है…यूं होता तो क्या होता रटने से कोई फायदा नहीं…

Astrologer Sushil Kumaar Singh Nehruji is baat ko sambhavtah isliye samajh sake kyoki unke dadaji ka naam GIYASUDDIN GHAZI th.aisa mai nahi kahta aisa ek charchit blog -"Nehru died of tertiary siphlis" joki bahut hi popular hai me likha hai.Akbar ko mahan Nehru ke itihaskaro ne banaya.mai maharana ko mahan nahi par Akbar se unche chasitra ka manta hu jo mele me burka pahan kar mahilao ko chhedta tha.yah bat unhi madhyakalin itihaskaro ne likhi hai.

Harishankar Shahi भाई साहब उस दौर के इन नायकों की आजादी का भाव अपनी सत्ता बचाने के लिए होता था या नही… इनकी लडाई यदि आजादी का संघर्ष थी तो यह आजादी उनकी प्रजा के लिए क्या महत्व रखती होगी….

Shashi Bhooshan Dwivedi अकबर से भी पहले भारत की परिकल्पना चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक कर चुके थे…

Amrita Dasgupta Shambhunath Shukla Ji….. pehli baar FB par kisi ko itni kaduwi sacchayi seena thok kar kehtey suna. Badhaayi meri taraf se. Bahot Badhayi.

Pankaj Srivastava जब हम सामंती शासन कहते हैं तो फिर प्रजातंत्र के ना होने की शिकायत कैसे कर सकते हैं..भाई…

Yashwant Singh Jai ho shri shambhu baba ki

Ajay Singh मैं तो तुम्हे बन्द कर रहा हूँ ।पर अपना डी एन ए टेस्ट करवा लेना ?

Harishankar Shahi बस भाई साहब इस सामंती सत्ता को अपने शासन के लिए बचाए जाने की लडाई को कैसे आजादी का संघर्ष माना जा सकता है.

Shambhunath Shukla शैव वैष्णव और ब्राह्मण व बौद्ध संघर्ष को सांप्रदायिकता नहीं कहा जा सकता। वह मतभेद था और परस्पर विरोध था लेकिन कोई भी शासक चाहे वह बौद्ध हो या ब्राह्मण धर्मावलंबी, शैव रहा हो अथवा वैष्णव आम तौर पर धर्म को लेकर कोई वितृष्णा नहीं रखता था। यहां तक कि मध्य काल में भी यही रवैया रहा। खिलजी सुल्तान और मुगल बादशाहों ने कभी भी ब्राह्मण धर्म की निंदा नहीं की न ही अकारण उन्हें मारा या सताया। इसलिए आपका यह तर्क गले नहीं उतरता पंकज जी कि राणा प्रताप का सेनापति सूर था और अकबर का मानसिंह।

Mahesh Sharma यह तो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधा‌रित है ‌मित्र शुक्ल जी की योग्यता पर सवाल नहीं उठता है। वह एक का‌बिल संपादक रहे हैं। ‌इब्राहिम लोदी अ‌िततिम ‌हिंदू बादशाह था। बाबर को कौन लाया, क्या उद्देश्य था। यहां पर बात अकबर की हो रही थी। तो वह भले ही मुगल रहा हो पर उसका ‌किरदार ‌हिंदुस्तान के ‌लिए ठीक ही कहा जाएगा।राणा प्रताप का अपना ‌किरदार था। सल्तनत के ‌लिए मुगलों से ‌भिड़ना बड़ी बहादुरी का काम था उन ‌दिनों।

Kumar Ranjeet खाली एक सवाल ….. इस तथाकथित "इतिहास" के प्रमाणिक होने की गारंटी कौन देगा …..??

Ravindra M Ranjan अरे भाइयों ये धारावाहिक मनोरंजन के लिए है, इसमें कई प्रकरण और दृश्य देखकर आप अपनी हंसी नहीं रोक पाएंगे. हो स‌कता है कुछ वर्षों बाद अंबानी पर भी स‌ीरियल बने और उन्हें वीर योद्धा दिखाया जाए, उन्होंने भी तो अपना 'राज' कायम रखने के लिए स‌ंघर्ष किया है.

Raj Krishna sir Orangjeb bhi mugal hi tha.. Uski shan me bhi kuchh likhiye…

Shambhunath Shukla औरंगजेब अगर बुद्धिमान होता या अपने पुरखों जैसा रणनीतिक कौशल उसके पास होता तो न तो मुगलिया शासन का अंत होता और न विदेशी हमारी जमीन पर आकर हमें लूट पाते।

Hiralal Ram no comment

Harishankar Shahi Ravindra M Ranjan जी "गुरु" बन चुकी है….

Pankaj Srivastava सर, मतभेद का खूनी संघर्ष में तब्दील हो जाना सांप्रदायिकता ही कहलाएगी। पुष्यमित्र शुंग जब बौद्धों के सर के बदले स्वर्णमुद्राएं दे रहा था तो वो सांप्रदायिकता ही थी। और ब्राह्मणवादी आचार्यों ने बौद्धों के बारे में कैसी खतरनाक बातें कहीं हैं, ये सब शास्त्रों में उपलब्ध है। बहरहाल, इतिहास लेखन एक पेशेवर काम है जो तथ्यों का मोहताज है। ये सही है कि मुगल शासकों ने ब्राह्मणवाद को चुनौती नहीं दी, लेकिन वे ये जानते थे कि जब वे राज्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो ये धार्मिक लड़ाई नहीं है। इसलिए हकीम खां सूर का अकबर की ओर होना आश्चर्य की बात नहीं है। इस पर आपकी राय जुदा हो सकती है, लेकिन मैंने ये तथ्य इसलिए रखे ताकि राणा प्रताप सीरियल का सांप्रदायिक इस्तेमाल होने पर जवाब दिया जा सके।

Mahesh Sharma सही कहा है ‌कि शुक्ला जी आपने, मुगल हमारे आका होते, ईस्ट इं‌डडिया कंपनी न आती, गांधी नेहरू, ‌जिन्ना और पटेल का कोई नाम लेवा न होता। मुगलों की कृपा पर सांस ले रहे होते

Pankaj Srivastava मतवैभिन्य कैसे सांप्रदायिक संघर्ष था, इसकी एक मिसाल रामायाण में है…खुद राम के वचन हैं..—
यथा हि चोरः स तथा हि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि, तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानां स नास्तिकेनाभिमुखो बुधः स्यातं.
अर्थात्‌ जिस तरह चोर को समझो, उसी तरह बौद्ध मतानुयायी को मानो और तथागत नामक नास्तिक, इसे भी वैसा ही समझो. बौद्धों के लिए संसार में जो भी अतिशय कठोर सजा हो, वह इन नास्तिकों को दो. …. सजा देने का अधिकार न हो तो, समझदार पुरुष नास्तिकों के पास से हट जाएं अर्थात् उनका बहिष्कार कर दें.

-रामायण
अयोध्या कांड
सर्ग 110, श्लोक 34

Shashank Bhardawaj mugal kaal ek videshi shahak ka shasan tha….rajya sabhi rastro mai hote the …maratha atyachar kar rahe the aur mugal pyar..kaha ka itihas padha rahe ho pandit jee,……fir jinko diwaro mai china ja raha tha..katle aam kiya ja raha tha mugl dwara eo kya tha…vikrit itihas mat batiye pandit jee

Shambhunath Shukla Pankaj Srivastava: वैसे पुष्यमित्र शुंग का कोई प्रामाणिक इतिहास उपलब्ध नहंी है लेकिन अगर आप रांगेय राघव का महायात्रा पढ़ें तो कुछ अलग जानकारी मिलेगी।

Shashank Bhardawaj pankaj babu ..ramayan mai boudh kaha aa gaye….बुद्धस्तथागतं ka arth yahan boudh se nahi hai na tathagat ka…had hai….

Pankaj Srivastava सर, शैव-वैष्णव और ब्राह्मण-बौद्ध संघर्ष के तमाम और संदर्भ हैं प्राचीन ग्रंथों में….वे सब खुद को संप्रदाय ही कहते थे।

Ajai Kumar Mishra Maine bhi suna hai ki aaj se Rana Pratap ka prasaran honewala hai.Lekin Shukla Ji abtak jitane aitihasik dharawahikon ka prasaran hua hai usamein se kuchh ko chhod kar sabamein itihas se chhed chhad ki gayi hai.

Pankaj Srivastava शशांक जी, आपका ये हद बेहद है…पता नहीं आप चार्वाकों या दूसरे लोकायतों को पढ़ेंगे तो क्या कहेंगे…या फिर आजीवकों को..

Shashank Bhardawaj wo bhi ek vichardhara hai,,charwak ne do granth likhe ..ek dusre ke bilkul viprit….aur charwak ki bato ko kata bhi gaya….aap ye bataye ramayan mai aapne boudh dharam kaha se dhubh liya

Mahesh Sharma पंकज जी यह ‌किताब मानस संगम यानी ‌‌शिवाले वाले डा.बद्रीनारायाण ‌तिवारी के यहां उपलब्ध है। ‌निःशुल्क। थोड़ा हंस ली‌िजजिए ‌िफफिर शुरू हो जाएं। मेरी पोस्ट का बुरा मत मानना।

Shashank Bhardawaj aap ki had ka to patah hi nahi chal raha

Madan Bhurle Yeh galti to producer ki hai jo tattho n ko jane bina apna ullu sadhane ke liye logonki bhavnaonka istemal karte hai..

Mahesh Sharma पहले सी‌रियल देखो तो ‌फिर बहस होनी चा‌हिए। अभी तो ‌रिलीज होने दो।

Pankaj Srivastava कौन सी किताब महेश भाई….रामायण, गीता प्रेस वाली तो मेरे पास है। मानस संगम में कहीं रामचरित मानस तो नहीं है…उसमें ये सब नहीं मिलेगा। ये रामाणय है वाल्मीकी वाली..

Shashank Bhardawaj sangharsh kis samuho mai nahi hua…aap communisto mia nahi hua..nahi ho raha….

Shashank Bhardawaj पुष्यमित्र शुंग ka ye vyaktigat aachran tha,,ise hindu shahtra ki swikriti nahi thi

Shashank Bhardawaj aaj aap kuch galat karoge to uske liye communism jimmedar ho jayega kya pankaj jee

Mahesh Sharma रांगेय राघव की महायात्रा, ‌जिसका ‌जिक्र् शुक्ला जी ‌ने ‌किया है। माई ‌डियर पंकज जी

Pankaj Srivastava संघर्ष हुआ है तो वे इतिहास का हिस्सा है….हिंदू धर्म शास्त्र पढ़िए, संघर्ष और दमन का खुला ऐलान है…

Shashank Bhardawaj sangharsh sabhi ka satya hai,,sabhi dharmo ka..aap communisto ka bhi..daman ka khula alan to aap ka communism hai

Shashank Bhardawaj hameare yahan to vasudhev kutumbkam..sarve bahyantu sukhin srvoccha mane gaye hai

Pankaj Srivastava वो साहित्यिक कृति है महेश भाई…मैं प्राचीन ग्रंथों की बात कर रहा हूं…

Shashank Bhardawaj aap ke dharik vyakhya se dharam paribhashit nahi hoga

Shashank Bhardawaj COMMUNIST BANDHU

Mahesh Sharma हां ‌तिवारी जी के यहां रांगेय राघव की ‌किताबें पायी जाती हैं क‌हिए तो ‌भिजवाएं, पता दे दी‌जिए।

Shashank Bhardawaj kuch bhi likha ho uska ek sandharbh hota hai…..usko bina samkhe thothi budhhi ki vyakhya na karen

Haider Rizvi वैसे अशोक , मौर्य या गुप्त काल में भी शायद भारत की अवधारणा बनायी गयी थी. शायद दक्छिन नहीं था उसमे सर

Shashank Bhardawaj aap ne to ramayam mai baudho ke ullekh ki baat kah di..hahahaha

Pankaj Srivastava शशांक जी, आततायी और घृणित वर्णव्यवस्था के समर्थन में खड़े धर्मग्रंथों में आप ही वसुधैव कुटुंबकम खोज सकते हैं… साधु..साधु….आपने मुझे जाने बिना कम्युनिस्ट कह दिया, लेकिन मैं आपको संघी क्यों कहूं…ये तरीका तर्क खत्म हो जाने की निशानी है..

Shambhunath Shukla पंकज जी, बात यह हो रही थी कि राणा प्रताप को भारत का वीर पुत्र कहा जा सकता है या नहीं? अब यह तो साफ ही है कि उस समय तक भारत नहीं था। बाबरनामा में जिन सात सुल्तानों का नाम मिलता है वे हैं- दिल्ली, गुजरात, बंगाल, मालवा, बीजापुर, मांडू और राजपूताना। यानी भारत नाम का देश नहंी था। दिल्ली को ही तुर्क हिंदुस्तान बोलते थे। फिर भारत कहां से आ गया? अकबर ने पूरे देश को एक सूत्र में समेटने का प्रयास किया था। प्राचीन भारतीय इतिहास में न जाएं वहां गल्प ज्यादा है हकीकत कम। चाहे वह ब्राह्मण धर्म का समय रहा हो अथवा शैव, वैष्णवों और जैनियों, बौद्धों व लोकायतों का।

Shashank Bhardawaj shuru mai rajya hi the sabhi jagah par ek vishehs bhugalik seema wale ckketro ko rastra mana jata tha jisme kai rajya hote the

Shashank Bhardawaj aur sabhi apne apne tarike se ithihas likh rahe the

Sumit Kr Jha यह सच है कि महाराणा प्रताप की कूटनीति अकबर की तरह प्रखर नहीं थी और न हीं उन्होंने एक भारत राष्ट्र का सपना देखा फिर भी अपनी जन्मभूमि मेवाड़ की आजादी के लिए उनका संघर्ष यह बताता है कि भारत में ऐसे ऐसे वीर पुत्रों ने जन्म लिया जो अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए इस हद तक जा सकते हैं…..उस समय एक राजा के लिए अपना राज्य हीं उसकी मातृभूमि थी ………अकबर उनके लिए एक विदेशी शासक हीं था……….

Shashank Bhardawaj rastra rajya ka hi vistar tha shukla jee

Pankaj Srivastava शंभुनाथ शुक्ल…सर, आज के जैसी भारत की अवधारणा नहीं थी…लेकिन भारत एक भौगोलिक इकाई के रूप में स्वीकार्य था…जो तमाम राज्यों, क्षेत्रों में बँटा है…

Shashank Bhardawaj shastro mai bhi aarawart,,,jambu dwip jaise rastriya avdharnayen milti hain

Sumit Kr Jha सर मैंने तत्कालीन स्थिति का जिक्र किया है ………आज स्थिति भिन्न है……..आज ऐसा करना महज एक बेवकुफी मानी जाएगी……

Shambhunath Shukla बहुत खूब। मेरी जन्म भूमि एनएच-२ के जमीन अधिग्रहण में आ गई अब मैं अगर वीर योद्धा बनकर इस अधिग्रहण के लिए मर मिट जाऊँ तो मेरा भी गुणगान ऐसा ही होगा!

Pankaj Srivastava आपकी चुनी सरकार अधिग्रहण करे और कोई शासक किसी दूसरे राज्य पर कब्जा कर ले. ये एक ही बात कैसे हो सकती है सर। ….मैं मानता हूं कि राणा प्रताप की तुलना में अकबर ज्यादा दूरदर्शी शासक था। कई अर्थों में महान भी था। लेकिन राणा प्रताप होने का कोई अर्थ नहीं, ये तो अकबर ने भी नहीं माना होगा सर। राणा के बेटे अमर सिंह को दरबार में शांमिल करना इसी का प्रतीक है।

Shambhunath Shukla इस पोस्ट को डालने का मेरा मकसद कोई हंगामा खड़ा करना नहीं है। लेकिन मध्य काल का इतिहास भी काफी कन्फ्यूजन पैदा करने वाला है इसलिए इस पर विचार होना ही चाहिए लेकिन सरकार को ऐसे किसी भी सीरियल को प्रसारित करने पर रोक भी लगानी चाहिए क्योंकि इससे दो संप्रदायों में तनाव हो सकता है।

अवनीश सिंह हर काम रोक दिया जाये| किसी न किसी को तो हर काम से तकलीफ होती है|
इतिहास की महत्ता है| इससे आँखें मूँद कर आप तनाव रोक लेंगे, ये ग़लतफ़हमी है

Suresh Misra जिसको न निज गवरव तथा निज देश का अभिमान है
वह नर नहीं नर पशु निरा और म्रतक समान है

अवनीश सिंह आपकी इस पोस्ट से भी कुछ लोगों में तनाव फ़ैल गया है तो क्या अब आप आगे से पोस्ट करना बंद कर देंगे?

Shambhunath Shukla Pankaj Srivastava:उस समय तक चुनी हुई सरकारों का चलन नहीं था। उस समय तक राजशाही की ही परंपरा थी इसलिए उस समय के शासक का कदम दूरदर्शी नहीं होगा, ऐसा नहीं माना जा सकता। अकबर का कदम एक पूरा हिंदुस्तान बनाना था। यह सच्चाई हमें स्वीकार करना ही चाहिए।

अवनीश सिंह हिन्दुस्तान अकबर के पहले ही बन चुका था| ये अश्वमेध और राजसूय के जरिये पूरे राष्ट्र का एक शासक निर्धारित होता था और फिर प्रान्तों (राज्यों) में उसकी अधीनता स्वीकार किये हुए राजा अपना राज्य चलाते थे|
चन्द्रगुप्त, अशोक आदि का नाम भूल गये आप|

Shashank Bhardawaj bhai akbar chahta tha ki wo ranapratap uski ashinta swaikar kar ke..rana pratap ko ye swikar nahi tha,,,isme durdarshita kah se aa jaye bhai

हितेन्द्र अनंत भारत को एक राजनैतिक इकाई बनाने का स्वप्न सबसे पहले चाणक्य ने देखा था और चन्द्रगुप्त ने उस स्वप्न को पूरा भी किया। अकबर बाद में आता है। उसका स्वप्न भारत को एक करना नहीं था, भारत में एकक्षत्र राज्य की स्थापना करना था। वैसे मैं अकबर का सम्मान करता हूँ। पर राणा प्रताप के वंशजों ने कब पाकिस्तान जाने की इच्छा जाहीर की मालूम नहीं। फिर भी, उनके वंशजों के आधार पर राणा पर टिप्पणी समझ से परे है। एक प्रकार की प्लांटेड टिप्पणी है। कि देखो, उनके वंशज भी ऐसे थे, तो वे कैसे होंगे। फिर उसी बहती धारा में मराठाओं के रास्ते शिवाजी के महान कृत्य को भी नीचा दिखा दो। ऐसे फ्यूजन फूड और फ्यूजन संगीत का जमाना है, पर तथ्यों-तर्कों का यह बेमेल बेसुवाद फ्यूजन! हद है!

अवनीश सिंह कल को दो चार पीढ़ी के बाद आपके वंशज चोरी करते पकडे जाएँ तो क्या उस समय के बुद्धिजीवी ये साबित कर दें कि आप बहुत बड़े चोर थे (क्यूंकि आपके वंशजों ने चोरी की)
// जिस तरह की Assertion Reason methodology आप ने इस्तेमाल की है उससे तो यही निष्कर्ष निकलेगा|

Kaushal Kishor Sharma maharana pratap ka aapne ak dam galat aaklan kiya hay. may aap par koi aarop to nahi lagauga par nivedan hay ki dusaro ki bhavnavo ka bhi samman kare.maharana pratap par ham bharatvasiyo ko garv hay.akbar mahan hoga aap jaise itihaskaro ke liye. ham bharatvasiyo ke liye maharana pratap prarana shrot hay aur rahege.

हितेन्द्र अनंत Assertion Reason methodology !!! ये तो केवल असम्बद्ध विचारों के घालमेल से निकला Disorder लगता है।

सिद्धार्थ मिश्र स्वतंत्र भारतीय इतिहास को विकृत करना बंद करें । ये हो सकता है मातृभूमि,शौर्य,स्‍वाभिमान जैसे शब्‍द आपके कोष में न हों लेकिन इससे आपको दूसरे की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का अधिकार नहीं मिल जाता ।

अवनीश सिंह सिद्धार्थ मिश्र स्वतंत्र आपके विचार से तनाव फ़ैल सकता है| आप पर रोक लगानी होगी

सिद्धार्थ मिश्र स्वतंत्र मैं समझ नहीं पा रहा किस प्रकृति का तनाव…आपको जो बेहतर लगे कीजीए

Sumant Mishra Simply Mental Masterbation…shit

अवनीश सिंह अजी, आप जरा ऊपर पढ़ें शुक्ल जी की बात तब समझ पायेंगे कि आप कैसा तनाव फैला रहे हैं| रुकिए मैं ही पढवा देता हूँ::
Shambhunath Shukla इस पोस्ट को डालने का मेरा मकसद कोई हंगामा खड़ा करना नहीं है। लेकिन मध्य काल का इतिहास भी काफी कन्फ्यूजन पैदा करने वाला है इसलिए इस पर विचार होना ही चाहिए लेकिन सरकार को ऐसे किसी भी सीरियल को प्रसारित करने पर रोक भी लगानी चाहिए क्योंकि इससे दो संप्रदायों में तनाव हो सकता है। सिद्धार्थ मिश्र स्वतंत्र

Ashutosh Tiwari raana saanga ne hi aamantrit kiya tha baabar ko…taki delhi kamjor ho jae or vh us pr raaj kr sake pr sara paasa ulta ho gya..

Gulshan Uwer महाराणा प्रताप को 'वीरपुत्र' आधुनिक काल के राष्ट्रवादी लेखकों ने बनाया था. यह उनके समय की एक जरुरत मात्र थी. उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद से लड़ने के लिए लोगों में राष्ट्रीय चेतना को सशक्त करने और जोश जगाने के लिए इस तरह के उदाहरणों की जरूरत थी.
आधुनिक राष्ट्रीयता की अवधारणा को अकबर और राणा प्रताप में से कोई भी नहीं समझता था और उनका समझ पाना सामयिक भी नहीं था . उनके लिए 'राज्य' की अवधारणा महत्वपूर्ण थी 'राष्ट्र' कि नहीं.
आधुनिक राष्ट्रीयता युरोजन्मा है जो नेपोलियन के समय उसके आक्रमणों और अन्य प्रतिक्रियावादी ताकतों के विरोध में और भी मजबूत होती रही . इटली और जर्मनी का एकीकरण इस कड़ी के जोरदार उदाहरण रहे. इसके बाद सुरु हुआ उग्र राष्ट्रीयता का दौर जो विश्वयुद्ध में तब्दील हुआ. उग्र राष्ट्रीयता के सहारे ही हिटलर ने भी नाम कमाया.
दुनिया में चहुँओर राष्ट्रीयता के उफान को भारत में गांधी ने बखूबी समझा था.यह तमगा नेहरु को दे देना बिलकुल गलत होगा. गाँधी को यह बात पता हो चली थी कि उपनिवेशवाद/साम्राज्यवाद से लड़ने के लिए राष्ट्रवाद ही सबसे कारगर हथियार है.इसलिए 'राष्ट्र-निर्माण' के एजेंडे पर उन्होंने लगातार काम किया. देश की हर कड़ी को वह पिरोने और जोड़ने में लगे रहे ; प्रतिक्रियावादी ताकते उसे तोड़ने में लगी रहीं.
देशी रियासते भी प्रतिक्रियावादी ही रहीं. 'भारत-राष्ट्र' की अवधारना रियासतों के हित के खिलाफ जाती थी इसलिए उनका देशभक्ति जैसी चीज से कभी कोई लेना देना नहीं था.
भारत में गांधी ही वह व्यक्ति है जो इस सन्दर्भ मे नमन के योग्य है.

हितेन्द्र अनंत "क्योंकि इससे दो संप्रदायों में तनाव हो सकता है।"???? हा हा हा! फिर तो सोमनाथ से लेकर न जाने किन-किन बातों से दो संप्रदायों में तनाव हो सकता है। आप क्या चाहते हैं? इतिहास की चर्चा ही न हो? सब इतिहास पर अपना-अपना मत दें, आपको आपत्ति है? आप अपने मत में शिवाजी और मराठा साम्राज्य को कुछ कह दें तनाव नहीं फैलेगा, लेकिन कोई और कुछ कह दे तो तनाव फैलेगा? यह कैसी विचार प्रक्रिया है?

Brijendra Shukla apke vichar jankar dukh hua,kya aap sachmuch shukla ho,mujhe sandeh hai,jaane kitne hinduo ka khoon bahakar mugalon ne is desh par raaj kiya tha,desh ke dushmano ki prashasa matlab desh se gaddari hai,your thoughts are shameful.

अवनीश सिंह इनके बोलने से तनाव नहीं फैलेगा| इन्होने तनावरोधी लगा रखा है| आपने देखा नहीं नेहरु जी का नाम हितेन्द्र अनंत

Acharya Shilak Ram फिर वही गुलामी वाली प्रवृति तथा पुर्वाग्रह से ग्रस्त।

हितेन्द्र अनंत मिक्स वेज बनाने का प्रयास किया गया है। सीरियल का नाम लो, लोगों को आकर्षित करो। राणा को गरियाओ, मराठओं को गरियाओं, राणा के वंशजों को गरियाओ। लेकिन इससे तो हिंदूवादी नाराज हो जाएंगे!! ठीक है!! औरंगजेब को गाली का तड़का लगाओ। अकबर और नेहरू को महान घोषित करो। हो सकता है कि तर्क न टिकें, तो ऐसा करो, कि लिखो कि सीरियल से सांप्रदायिक तनाव बढ़ेगा। बन गया मिक्स वेज।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ला के एफबी वॉल से साभार.

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