महेश भट्ट ने दी पत्रकार कुलदीप मिश्र को धमकी

 

दैनिक भास्‍कर, चंडीगढ़ के सीनियर जर्नलिस्‍ट कुलदीप मिश्र से फिल्‍मकार महेश भट्ट ने बदतमीजी की, धमकी दी. महेश अपनी फिल्‍म जिस्‍म 2 को लेकर मीडिया से मुखातिब थे. घटना शुक्रवार की है. कुलदीप ने उनसे कुछ सवाल पूछे तो महेश भट्ट उखड़ गए. तू तड़ाक तो किया ही कुलदीप को धमकी भी दी कि तू बाहर मिल तो तेरी नेट सर्फिंग करता हूं सारी. कुलदीप ने इस घटना का विरोध करते हुए अपने ब्‍लॉग पर भी लिखा है. जिसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है.
 
महेश भट्ट ने मुझे कहा, बाहर मिल तेरी नेट सर्फिंग चेक करता हूं
 
मुझे अंदाजा नहीं था कि महेश भट्ट ऐसे घटिया तर्क देंगे और इतनी जल्दी सवालों से असहज हो जाएंगे। मेरे कुछ सवालों पर वह तू-तड़ाक पर उतर आए। धमकी भी दी कि 'बाहर मिल'। हाहाहा। मैं उपलब्धि समझता हूं इस बातचीत को। कि मेरे सवाल उन्हें उनके कम्फर्ट ज़ोन से बाहर लेकर आए। माफ़ कीजिएगा मैं गुडी गुडी जर्नलिस्ट नहीं हो पाऊंगा जो चाशनी में भिगोकर सवाल पूछता रहे।
 
 'पब्लिक टेस्ट और सेक्सुएलिटी का गेटकीपर कौन है? ऑडियंस कामुक चीजें देखना पसंद करती है। उन्हें यही चाहिए, जितना ज्यादा हो सके उतना चाहिए। इंडिया में सांस्कृतिक दोगलापन है।' 
 
 ऐसे कितने फिल्ममेकर होंगे, जो रिपोर्टर के सवालों का जवाब तू-तड़ाक की भाषा में दें। पर महेश भट्ट उनमें से एक हैं। शुक्रवार को जब थिएटर में जिस्म-2 रिलीज हो रही थी, वह अपनी पूरी टीम के साथ चंडीगढ़ के एक क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने पहुंचे। साथ में पूजा भट्ट, सनी लियोनी, रणदीप हुड्डा और अरुणोदय सिंह भी थे। समाज और सिनेमा के रिश्ते से बात शुरू हुई थी, फिर यलो जर्नलिज्म तक गई और अभद्रता पर ख़त्म हुई। महेश ने मुझसे कहा, 'बाहर मिल, देखता हूं तुझे। तेरी नेट सर्फिंग चेक करता हूं सारी।'
 
महेश भट्ट से पूरी बातचीत इस तरह थी
 
– आप जब न्यूज चैनलों पर बोलते हैं तो समझदारी भरी सोशल-पॉलिटिकल बातें करते हैं। वहां आपका अलग रूप दिखता है, पर आपकी फिल्मों में वो बात नहीं आ पाती। खास तौर से जैसी फिल्में आप पिछले कुछ सालों से बना रहे हैं। जिस्म-2 जिस समाज के बारे में है, क्या आप उसी समाज की बात करते हैं और वैसा ही समाज बनाना चाहते हैं?
 
— आप तोते की तरह रटकर तो सवाल पूछ रहे हैं। 40 साल से ये पूछा जा रहा है। मैं फिल्मों से रोजी कमाता हूं। जब 'अर्थ' और 'सारांश' बनाता हूं तो आप तारीफ करते हैं, देखते नहीं हैं। देखते आप सिर्फ 'मर्डर' और 'जिस्म' हैं। हॉल बुक हो जाते हैं जब जिस्म-2 बनाता हूं। मतलब साफ है कि ऑडियंस ऐसी ही फिल्में चाहती है। पॉर्न इंडस्ट्री 100 बिलियन डॉलर की है, यानी कोई तो उसके लिए जेब ढीली कर रहा है। मैं फिल्में बनाता हूं, भारतीय कानून के दायरे में रहकर। क्या कोई फिल्म देखकर आपका जेहन खराब हुआ। सेंसर बोर्ड ने ए, यू, यूए जैसे सर्टिफिकेट किस लिए बनाए हैं। संविधान मुझे ऐसी फिल्में बनाने की इजाजत देता है। और अगर आपका कल्चर इतना कमजोर है कि एक फिल्म से टूट जाए तो मुझे आप पर तरस आता है।
 
– सवाल कल्चर नहीं, सोसाइटी का था। ये तो चीजें बेचने की बौद्धिकता हुई। लोग जो चाहते हैं, हम वही परोसते हैं, इसी तर्क से लोग यलो जर्नलिज्म को भी जायज ठहराते हैं। आप उनसे सहमत हैं?
 
— आप और कर क्या रहे हैं। आप वैसा ही जर्नलिज्म कर रहे हैं। आप समझते हैं कि भरी भीड़ में मुझे नीचा दिखा देंगे?
 
– मेरा बिल्कुल ऐसा मकसद नहीं है। मेरी बात ख़त्म हो जाएगी, आप बस इतना बता दीजिए कि इसी तर्क से दुनिया की बहुत सारी सनसनीखेज चीजें जायज ठहरा दी जाती हैं। आप उन सबसे सहमत हैं?
 
— भैया हम बहुत बुरे लोग हैं। हम ऐसी ही समाज खराब करने वाली फिल्में बनाएंगे। मैंने शैतान को पूजने की कसम खाई है, तुम ईश्वर को पूजते रहो। बरसों पहले एक बूढ़ा रिपोर्टर मिला था। वो भी ऐसा ही कह रहा था। तेरे जैसे बहुत देखे हैं। तू मिल मेरे को बाहर जरा। मैं देखता हूं। तेरी नेट सर्फिंग चेक करता हूं सारी।

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