माथुर साहब : वो जब याद आए बहुत याद आए

अपने समय की हिंदी पत्रकारिता के शिखर पर विराजमान स्व. राजेंद्र माथुर मस्त आदमी थे। यारों के यार। मुगलाई खाने के शौकीन और चहुंमुखी प्रतिभा के धनी। मगर स्वभाव इतना सहज कि घमंड उन्हें तनिक भी नहीं था। अपने कक्ष से बाहर आ कर कभी भी हम सबके बीच बैठ जाते और खबरों के संपादन में सहायता करने लगते। लगे हाथों संपादन के कुछ गुर भी बता देते। टाइम्स आफ इंडिया में अगर उन्हें कोई समाचार पसंद आता तो किसी सबएडीटर से उसका अनुवाद न करा कर स्वयं अनुवाद कर देते और उदारता देखिए कि उस पर संवाददाता का नाम भी डाल देते। अखबार में वर्तनी की अशुद्धियां होना आम बात है मगर माथुर साहब किसी अशुद्धि के लिए किसी से पूछताछ न कर अशुद्ध शब्द के साथ शुद्ध शब्द लिख कर नोटिस बोर्ड पर लगा देते। इस प्रकार कुछ ही दिन में अखबार वर्तनी की अशुद्धियों से मुक्त हो गया।

एक दिन मैंने उनसे घर पर खाने का आग्रह किया। मैं सोचता था माथुर साहब ना नुकर करेंगे मगर मेरे प्रस्ताव पर उन्होंने कहा, हां बताओ, कब चलना है। मैंने एक दिन छोड़ कर चलने को कहा तो तुरंत तैयार हो गए। पूछा- और कौन चलेगा तो मैंने बताया कि रब्बी जी, विष्णु नागर और प्रयाग शुक्ल भी होंगे। बोले फिर तो आनंद रहेगा, पिकनिक हो जाएगी। घर रब्बी जी ने देखा था सो नियत समय पर चारों आ गए। आते ही अपने विनोदी अंदाज में बोले- दावत खाने तो ये लोग आए हैं, मैं तो

राजेंद्र माथुर
राजेंद्र माथुर
इनका ड्राइवर हूं। सब हंस पड़े। माथुर साहब ने चारों ओर नजर दौड़ाई और बरामदे से मूढा उठा कर नीम के नीचे डाल कर बैठ गए। बोले यार तुम तो स्वर्ग में रह रहे हो। खाना तैयार था। खाने पर इधर उधर की बातें होती रहीं तो फिर उनका विनोदी स्वभाव जाग गया। बोले- चलिए एक मुसलमान स्टाफ में रखने का यह लाभ तो हुआ कि अब नान वेज खाने को मिल जाया करेगा। बात यह थी कि इन चारों में से किसी की भी पत्नी नान वेज नहीं बनाती थीं। खाना खा कर बोले- चलिए खेतों की ओर चला जाए। अप्रैल का अंतिम सप्ताह था। थोड़ी गरमाहट मौसम में आ गई थी। मैंने इस ओर ध्यान दिलाया तो बोले- अब गांव में आकर भी खेतों पर न घूमा जाए तो गांव आने का लाभ ही क्या। खेतों में इस समय हरियाली समाप्त हो कर गेहूं की बालियां सुनहरी होने लगी थीं। खेत पर आ कर नलकूप की हौदी की मुंडेर पर बैठ कर दूर दूर तक फैली फसल को निहारते रहे। वापसी में बोले- अब आपका गांव भी देख लिया जाए। गांव में उन्हें ऐसे रास्ते पर ले गया जहां से जल्दी ही घर आ गया। कुछ देर आराम के बाद चाय पी और विदा हो गए।

फिर तो यह हुआ कि साल में कम से कम दो बार इन चारों का आगमन होने लगा। एक पांचवां भी बिना निमंत्रण के आने लगा। इसके अतिरिक्त मैं, रब्बी जी और माथुर साहब जब भी कभी मूड होता जामा मस्जिद के करीम होटल चले जाते। एक बार माथुर साहब जिद करने लगे कि भुगतान वह करेंगे। रब्बी जी ने बीच का रास्ता निकाल कर पेमेंट करने को कहा। मगर मैंने कहा इस बार तो पेमेंट मैं ही करूंगा, अगली बार माथुर साहब करेंगे। मगर वह अगली बार कभी नहीं आई। माथुर साहब हमें छोड़ कर चले गए।

अपने घर पर चल कर खाने का आग्रह भी माथुर साहब ने कई बार किया मगर मैं जा न सका। एक बार ऐसे ही करीम होटल से खाना खा कर आ रहे थे। आफिस के गेट पर आ कर रब्बी जी बोले- खाना अधिक खा लिया, अब नींद आ रही है। माथुर साहब ने विनोद करते हुए कहा- रब्बी जी आफिस में सोने के लिए आपको संपादक बनना पड़ेगा।

अबकी बार माथुर साहब गांव आए तो बहुत प्रसन्न मूड में थे। आ कर बैठने के कुछ ही देर बाद चारा काटने की मशीन चलाने लगे और बोले काम तो थोड़ा कठिन लगता है, आप कर लेते हैं इसे? मैंने बताया कि करना पड़ता है। मगर जल्दी ही बिजली की मोटर लगा दी जाएगी तो आसान हो जाएगा। फिर घर के बाहर दरवाजे पर आ गए। सामने खाली प्लाट में बिटौरे रखे थे। उनके पास जा कर बोले- लोग इमारतों और प्राकृतिक दृश्यों के साथ फोटो खिंचाते हैं, हम इन बिटौरों के साथ फोटो खिंचाएंगे।

बिटौरों के साथ माथुर साहब के साथ रब्बी जी, नागर जी और प्रयाग जी के साथ लिया गया यह फोटो माथुर साहब की प्रथम पुण्य तिथि पर मेरे लेख के साथ नवभारत टाइम्स के मुम्बई, जयपुर, लखनउ और पटना संस्करणों में छपा था। इसमें पांचवें बिना बुलाए महमान का भी फोटो था जो पेज बनाने वाले सज्जन ने पेज के मेकअप में स्थानाभाव के कारण हटा दिया था जिस पर बिना बुलाए इस महमान ने बहुत बुरा माना और काफी दिन तक मुझसे बोल चाल ही बंद कर दी मगर बाद में जब वास्तविकता का पता चला तो नार्मल हुए थे। इस दिन माथुर साहब गांव में भी घूमे और कई लोगों से मिले तथा दादरी में रस्सी बंटने का रिकार्ड बना रहे एक अध्यापक से भी मिले जो बहुत दिन तक माथुर साहब को याद करते रहे थे।

माथुर साहब के अलावा एस. पी. सिंह, शैलेश, रमेश गौड़ और धर्मवीर सहाय भी गांव आ कर कोरमा बिरयानी का स्वाद ले चुके थे। पत्नी वास्तव में कोरमा गजब बनाती थीं। गाजियाबाद में तैनाती के दौरान विभूति नारायण राय भी दो बार तथा गाजियाबाद से जाने के बाद एक बार गांव आ कर दावत खा चुके थे। इन्हें एक सहयोगी अरूण वर्धन ले कर आते थे। बकरीद पर तो यूनियन के दस बारह लोग प्रायः आ जाते थे। ये लोग शराब अपने साथ लाते थे। घर के सामने एक शीशम के पेड़ के नीचे बैठ कर मस्त होने के बाद दावत खाते थे। एक बात जो कभी कह न सका, आज कह रहा हूं- घर पर दावत बहुत लोगों ने खाई मगर माथुर साहब, रब्बी जी और यूनियन लीडर प्रमोद कुमार शर्मा के अलावा किसी ने अपने घर खाने पर नहीं बुलाया। माथुर साहब बार-बार आग्रह करते रहे मगर जब मैंने उनके घर जाने का तय किया तो उससे पहले ही माथुर साहब यह संसार छोड़ कर चले गए और बस उनकी यादें ही रह गईं। अब भी जब अखबारों में अशुद्धियां देखता हूं तो माथुर साहब की याद आ जाती है।

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या maheruddin.khan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है:  सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207


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