मामला हजार करोड़ से ऊपर का है.. जिसमें जेके समूह, जागरण ग्रुप, लोहिया और कोठारी जैसे उद्योग समूह शामिल हैं

: हरे पेड़ काटने पर स्टे से निवेशकों में हड़कंप, बिल्डर कंपनी फिर लगी गोटें बिछाने : कानपुर : शहर की हरियाली पर कंक्रीट का इन्द्रप्रस्थ बसाने वाले इन दिनों सो नहीं पा रहे हैं। शहर के एक आम आदमी ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया है, फलस्वरूप भूमिदेव भागे घूम रहे हैं कि कहीं भस्म न हो जाएं। यह किस्सा है लक्ष्मण बाग, गुटैया योजना-७ के उस गड़बड़़ घोटाले का जिसकी जानकारी प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर कानपुर नगर निगम, केडीए के संतरी तक है लेकिन सब खामोश…।

मामला हजार करोड़ से ऊपर का है.. जिसमें जेके समूह, जागरण ग्रुप, लोहिया और कोठारी जैसे उद्योग समूह शामिल हैं। आजादनगर अम्बेडकर प्रतिमा से लगा हुआ लक्ष्मण बाग (लगभग २५ एकड़ का भू-भाग) एक तरह से कानपुर का आक्सीजन जोन था या यूं कहें कि फेफड़े थे। आज वहां ऊंची-ऊंची बहुमंजिली रिहायशी नवनिर्मित इमारतें खड़ी हैं बिकने को। यह काम किया है मार्निंग ग्लोरी इन्फ्रा लिमिटेड ने जिसमें ऊपर उद्धृत उद्योग समूहों के ही निवेशकों का ही गठजोड़ है। इन लोगों ने मिलकर तीन काम किये।

पहला काम किया जे.के. समूह वालों ने। उन्होंने पट्टेदार के रूप में दर्ज कैलाशपत सिंहानिया को जे.के. काटन स्पिनिंग एण्ड वीविंग मिल्स कम्पनी लि० बना दिया यानी व्यक्ति की पट्टेदारी कम्पनी की हो गई। जे.के. वालों की इस चतुराई में नगर निगम ने भी भरपूर सहयोग दिया। खूब माल इधर से उधर हुआ..। मुख्यमंत्री के सचिवालयों तक मुद्रा बही। फिर बीआईएफआर में मिल को बीमार बताकर उसे बेंचने का जाल रच दिया। इस गड़बड़झाले में कानपुर के एक वीसी निलम्बित भी हुए लेकिन कमाल यह था कि जिस सरकार ने निलम्बित किया उसी सरकार ने फिर जमीन मुक्त भी करा दी।

दूसरा काम किया गया इस सम्पत्ति को 'फ्रीहोल्ड' करके आवासीय बनाने का। इस काम में कानपुर विकास प्राधिकरण, नगर विकास विभाग, मंत्री, सचिवों ने खूब खेल खेला और अंतत: जो जमीन केवल बागवानी के लिए थी उसे आवासीय बना दिया.. सारे नियमों और सुप्रीमकोर्ट के निर्देशों की अवहेलना करके।

तीसरा काम किया बिल्डर कम्पनी ने। इस कम्पनी ने २५ एकड़ के हरे-भरे बाग को काट डाला। बाग के कारण लक्ष्मण बाग की सड़कठण्डी पुलिया के नाम से जानी जाती थी। आज वहां कंक्रीट की मीनारनुमा इमारते हैं। इस बाग परिसर में एक झील जिसे आप तालाब या छोटी नहर भी कह सकते हैं, उसे भी पाट दिया गया। यह काम सुप्रीमकोर्ट के मुंह पर एक तमाचे की तरह है। इस पूरे गड़बड़झाले में करोड़ों की रिश्वत का लेन-देन सम्भावित है। लगभग दो हजार करोड़ की कमाई का अनुमान है। मार्निंग ग्लोरी के डायरेक्टरों ने कमाई के चक्कर में यह भी नहीं सोचा कि पेड़ और पानी की हत्या अब नीचे की अदालत से लेकर ऊपर की अदालत तक में क्षम्य नहीं है। तभी शायद एक जागी संस्था ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की।

इस याचिका में हरे-हरे पेड़ों को बिना अनुमति के काट देने पर समस्त निर्माण को दायर याचिका के अधीन मानकर कहा गया है कि यह न्यायालय के निर्णय तक विचाराधीन है। न्यायालय की नोटिसें डीएम, केडीए, जे.के. और मार्निंग ग्लोरी को भेजी जा चुकी हैं। अब देखें क्या करते हैं ये इन्द्रगण इन्द्रप्रस्थ के निर्माण के लिये।

लेखक प्रमोद तिवारी कानपुर के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं.


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