माया के चहेते पोंटी चड्ढा और जेपी गौड़ पर सपा की ‘मेहरबानियां’

बसपा राज में बेतहाशा दौलत और शोहरत बटोरे के कारण मायावती के दो चहेते व्यवसायिक घरानों की खूब चर्चा हुई थी। दोनों सूबे के सर्वेसर्वा बन बैठे थे। इसमें एक नाम जेपी समूह का था तो दूसरा नाम वाइन किंग पोंटी चड्ढा का था। दोनों को फायदा पहुंचाने के लिए बसपा सरकार ने कई बार मर्यादाएं लांघने से भी परहेज नहीं किया। उम्मीद थी कि इन दो घरानों को कटघरे में खड़ाकर करके नई सरकार बसपा सुप्रीमो मायावती को घेरेगी, लेकिन दोनों घरानों को आजकल माया से पहले मुलायम का वफादार बताए जाने की होड़ लगी है। दोनों ही घराने कहते नहीं थकते कि माया के पास तो वह बाद में गए, पहले तो वह मुलायम के ही हुआ करते थे। इसका प्रभाव भी पड़ा।

वाइन किंग पोंटी चड्ढा ने नई सरकार में भी घुसपैठ कर ली है। समाजवादी पार्टी में शीर्ष पर बैठे उसके कुछ पुराने वफादारों की मेहरबानी से नई सरकार के साथ भी उसकी ‘डीलिंग’ हो गई है। इसके बाद पोंटी के प्रति सरकार का रूख नरम पड़ गया है। कल तक मायावती के ईशारे पर काम करने वाले वाइन किंग की समाजवादियों के बीच ‘हेकड़ी’ दिखने लगी है। पोंटी को अपने पाले में खड़ा करने के बाद सरकार ने आबकारी महकमे में बदलाव का मन बदल लिया है, जो आबकारी अधिकारी बसपा राज में प्रमुख पदों पर बैठकर पोंटी पर मेहरबानियां बरसाते थे, वहीं अखिलेश राज में भी उसके लिए राह आसान करेंगे।

नई सरकार ने आबकारी विभाग के प्रमुख सचिव के एस अटोरिया को तो जरूर उनके पद से हटाया था, लेकिन इसके बाद विभाग में किसी का तबादला नहीं किया गया। आबकारी आयुक्त महेश गुप्ता जिनके ऊपर बसपा राज में पोंटी को संरक्षण देने के लगातार आरोप लगते थे, वह भी अपनी कुर्सी पर मजबूती के साथ डटे हुए हैं। हॉ, इस दौरान इतना भर जरूर हुआ है रेट बेसी (एमआरपी से अधिक रेट वसूला जाना) खत्म हो गई, जिससे दारू के दाम घट गए, लेकिन यह कितने दिनों तक रेट बेसी पर सरकार का नियंत्रण रहेगा, यह कोई नहीं जानता। क्‍योंकि यह बात किसी से छिपी नहीं है कि रेट बेसी से मिले पैसे से ही बसपा मालामाल हुई थी।

हवा का रूख भांपते ही शासन-प्रशासन में बैठे अधिकारियों ने भी वाइन किंग की तरफ से आंखें घुमा ली है। गौरतलब हो, शुरू में बसपा सुप्रीमों मायावती के चहेते ‘वाइन किंग’ पोंटी चड्ढा पर नवगठित समाजवादी सरकार ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। परिणामस्वरूप बसपा राज में जो अधिकारी उसके नाम से डरते थे, उनके तेवर एकदम से उसके खिलाफ सख्त हो गए थे। एक तरफ अखिलेश सरकार पोंटी के खिलाफ सख्त रवैया अपनाए थी तो दूसरी और शराब के फुटकर कारोबारियों से भी उसे चुनौती मिल रही थी। बसपा सरकार पर आबकारी घोटाले का अरोप लगाते हुए लखनऊ शराब एसोसियेशन ने विदेशी और देशी शराब की थोक दुकानें जनपदवार अलग-अलग आवंटित करने को लेकर मोर्चा खोल दिया था, लेकिन बिसात पलटते ही सब टॉय-टॉय फिस्स हो गया।

बहरहाल, बात अतीत की कि जाए तो उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव संम्पन्न होते ही आयकर विभाग ने पोंटी के प्रतिष्ठानों पर छापामारी करके उसकी मुसीबतें बढ़ाने की कोशिश की थी तो वाइन किंग के खिलाफ समाजवादी सरकार में पहली कार्रवाई जिला बुलंदशहर में सामने आई। 27 मार्च को शराब कारोबारी पोंटी पर शिकंजा कसते हुए नगर पालिका और राजस्व विभाग के अधिकारी पुलिस बल के साथ उसकी शूगर मिल पर बकाया गृहकर की वसूली के लिए पहुंचे तो पोंटी की सल्तनत में हड़कम्प मच गया। तत्काल मिल प्रबंधन ने 22 लाख रुपए का चेक काट कर फौरी राहत ली। बताते हैं कि मिल पर चार करोड़ 30 लाख 84 हजार 440 रुपए बकाया है।

ज्ञातव्य है कि बसपा शासन में 2010 में उत्तर प्रदेश राज्य चीनी निगम की स्वामित्व वाली बुलंदशहर शुगर मिल तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के चहेते पोंटी चड्ढा की वेब इंडस्ट्रीज को कौड़ियों के भाव बेच दी गई थी। निजी हाथों में जाने के बाद इस शुगर मिल का नाम वेब शुगर यूनिट रख दिया गया था। तभी से मिल पर उक्त बकाया था। 27 मार्च को बकाया वसूली के लिए नगर पालिका के ईओ एके गुप्ता और तहसीलदार सदर पी झा पुलिस बल के साथ उनकी मिल पर जा धमके। इन अधिकारियों ने मिल के कागजों की जांच के अलावा मिल एरिया सहित चीनी गोदाम व समस्त चल सम्पति को भी कुर्क कर दिया। इसके बाद मिल प्रबंधन के हाथ-पैर ढीले पड़ गए। बाकी बकाया भी जल्द चुकाने का आश्वासन प्रबंधन ने दिया। मिल के खिलाफ एक करोड़ 53 लाख रुपए की आरसी जारी की गई। ये रकम पिछले साल से पोंटी की कम्पनी पर बकाया था, लेकिन कोई अधिकारी वसूली की हिम्मत नहीं जुटा सका था।

मौका देखकर उसके खिलाफ सरकार ही नहीं फुटकर शराब व्यवसायी भी लामबंद होने लगे। लखनऊ शराब एसोसियेशन ने अखिलेश सरकार से मांग की है कि आबकारी में ऐसी नीति लाई जाए जिससे की जो भी व्यससायी शराब का थोक कारोबार करना चाहे, उसे वह लाइसेंस निर्धारित शुल्क लेकर दिया जाए। एसोसियेशन का कहना था कि अगर ऐसा हुआ तो प्रदेश सरकार को लगभग 40 करोड़ रुपए का राजस्व मिलेगा। इतना ही नहीं वाइन किंग का थोक कारोबार साम्राज्य खत्म होने से छोटे दुकानदारों और दारू के शौकीनों को हर ब्रांड की शराब सहज उपलब्ध हो जाएगी। साथ ही नहीं शराब की काला बाजारी और रेट बेसी (प्रिंट रेट से अधिक मूल्य पर शराब बेचना) पर भी लगाम लगेगी।

लखनऊ शराब एसोशियेश के अध्यक्ष एसपी सिंह का कहना था कि जब तक प्रदेश से थोक शराब व्यवसाय पर एक कंपनी का एकाधिकार समाप्त नहीं होगा तब तक छोटा कारोबारी परेशान रहेगा। एसोसियेशन ने स्वास्थ्य की दृष्टि से देशी शराब की बिक्री कांच की बोतल में करने की मांग सहित राजस्व बढ़ाने के लिए कई उपाय भी सरकार को सुझाए। सरकार कोई कदम उठा पाती इससे पहले ही पोंटी ने पासा पलट दिया। अखिलेश सरकार पर पोंटी का एकाधिकारी भारी पड़ा। आज वह माया की तरह मुलायम का प्रिय हो गया है। शायद इसी को कहा जाता है समय-समय का फेर। अब पोंटी जो भी कमाएगा उससे समाजवादी पार्टी और वाइन किंग दोनों की पौबारह रहेगी। वाइन किंग पर सपा सरकार की मेहरबानियां यों ही नहीं हुई है। सरकार और वाइन किंग दोनों के हाथों में ही लड्डू रहेंगे।

बात जेपी ग्रुप की कि जाए तो बसपा राज में उन्हें जो-जो सुविधा मिली थीं, वह बदस्तूर आज भी जारी हैं। ग्रुप द्वारा उलटे-सीधे तरीकों से अधिग्रहित की गई किसानों की जमीनें अभी भी उसके पास है। जेपी ग्रुप ने क्या कमाया, कैसे कमाया इसकी जांच कराने की बात सपा नेता सत्ता में आने से पहले तक कहते रहते थे, लेकिन सत्ता आते ही इन लोगों ने उसके साम्राज्य पर से नजर हटा ली है।

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की रिपोर्ट. अजय ‘माया’ मैग्जीन के ब्यूरो प्रमुख रह चुके हैं. वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

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