मिड-डे-मील का बंटाधार

मिड-डे-मील योजना दुनिया का सबसे बड़ा स्कूली पोषण कार्यक्रम है। इसके तहत देशभर के 12.65 लाख स्कूलों के करीब 12 करोड़ बच्चों को दोपहर का भोजन विद्यालयों में वितरित किया जाता है। इस महत्वाकांक्षी योजना का मूल उद्देश्य निर्धन बच्चों को स्कूल से जोड़ने और उनके पोषण का है। 17 सालों से यह योजना देशव्यापी स्तर पर चलाई जा रही है। इसके चलते बीच में स्कूल छोड़ जाने वाले बच्चों में काफी कमी आई है।

लेकिन, कई राज्यों में इस योजना को लेकर इतना कुप्रबंधन हो गया है कि भारी खर्च के बावजूद, न तो बच्चों को पौष्टिक भोजन मिल पाता है और न ही इसकी वजह से ढंग की पढ़ाई हो पा रही है। पिछले दिनों बिहार के छपरा में मिड-डे-मील, दो दर्जन बच्चों के लिए मौत का परवाना ही बन गया। छपरा जिले के धर्मसती गंडमन गांव के सरकारी प्राथमिक विद्यालय में मिड-डे-मील खाने के बाद बच्चों की हालत खराब होनी शुरू हुई। कुछ ही घंटों के अंदर 23 की मौत हो गई। इस हादसे के बाद बिहार में सियासत की आंधी तेज हो गई है।

बिहार की नीतीश सरकार ने यह कहना शुरू कर दिया है कि राज्य सरकार को बदनाम करने के लिए कुछ विरोधी दलों ने एक बड़ी साजिश रची थी। इसी के चलते मिड-डे-मील में जहरीला पदार्थ मिलवा दिया गया था। राज्य के मानव संसाधन मंत्री पी के शाही तो यही दावा कर रहे हैं कि अब सरकार के पास इस बात के सबूत आ गए हैं कि उस दिन बच्चों के भोजन में जहर मिलवाया गया था। दावा किया गया है कि हादसे के शिकार हुए चार बच्चों के खून के नमूनों की रिपोर्ट आई है। इसमें इस बात की पुष्टि हुई है कि छात्रों के शरीर में खास किस्म का जहर पाया गया। इस मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी कह दिया है कि राजनीतिक साजिश के तहत यह हादसा किया गया। ताकि, सरकार को बदनाम किया जा सके।

आरोप लगाया जा रहा है कि संबंधित स्कूल की प्रधानाचार्या मीना देवी और उनके पति, इस साजिश में शामिल रहे हैं। पी के शाही ने कहा है कि प्रधानाचार्या के पति के रिश्ते एक प्रमुख विपक्षी दल से हैं। मिड-डे-मील का राशन प्रधानाचार्या के पति की दुकान से ही आता था। ऐसे में, कई लोगों ने मिलकर साजिश रची थी। बिहार के इस हादसे के बाद मिड-डे-मील की योजना पर पूरे देश में इसके कुप्रबंधन से जुड़े तरह-तरह के किस्से सामने आ रहे हैं। क्योंकि, छपरा की घटना के पहले भी देश के कई हिस्सों में स्कूलों का भोजन खाकर बच्चे बीमार पड़े थे। एक-दो अन्य घटनाओं में बच्चों की जान भी गई। लेकिन, छपरा का हादसा इतनी मौतों के बाद काफी गंभीर हो गया है।

इस घटना को लेकर बिहार की राजनीति में खासा कोहराम मच गया है। इसकी एक वजह यह भी है कि यहां पर सत्तारूढ़ जदयू और भाजपा के बीच कई और कारणों से आपसी टकराव बढ़ गया है। दरअसल, पिछले दिनों ही नरेंद्र मोदी के विवाद को लेकर जदयू और भाजपा का 17 साल पुराना राजनीतिक गठबंधन टूटा है। इसके चलते बिहार सरकार से भाजपा अलग हो गई है। जाहिर है, ऐसे मेें भाजपा और जदयू के बीच राजनीतिक तल्खी भी काफी बढ़ गई है। यह दर्दनाक हादसा हुआ, तो भाजपा नेतृत्व को नीतीश सरकार पर निशाना साधने का एक बेहतर मौका मिल गया। पलटवार करते हुए जदयू के शिवानंद तिवारी जैसे नेताओं ने भाजपा को भी जमकर कोसा है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी कहते हैं कि राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए इस मामले में बगैर पड़ताल के राजनीतिक साजिश की बात प्रचारित कर रही है। ताकि, उसकी कमजोरियों का संदेश लोगों के बीच न जाए। रूडी कहते हैं कि सच्चाई तो यही है कि मासूमों की मौत पर सबसे ज्यादा सियासत जदयू के नेता ही कर रहे हैं।

मिड-डे-मील योजना, देशव्यापी स्तर पर 15 अगस्त 1995 को शुरू की गई थी। शुरुआती दौर में इस योजना को देश के 2408 विकास खंडों में ही लागू किया गया था। 1997-98 में इस योजना को देश के सभी ब्लाकों में लागू किया गया। शुरुआती दौर में तीन साल तक कई राज्यों में पके भोजन के बजाए हर महीने के हिसाब से बच्चों को अनाज दिया जाता था। लेकिन, इससे योजना का उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा था। समीक्षा के बाद सितंबर 2004 में केंद्र   सरकार ने तय किया कि प्राइमरी और अपर प्राइमरी स्कूलों के बच्चों को पका ताजा भोजन ही दिया जाएगा। मापदंड बनाया गया कि हर बच्चे को भोजन में कम से कम 300 कैलोरी की ऊर्जा मिले। इसके साथ ही प्रत्येक बच्चे को 8-12 ग्राम भोजन में प्रोटीन मिलने की भी व्यवस्था रहे।

इतनी बड़ी योजना तो शुरू कर दी गई, लेकिन देश के तमाम हिस्से ऐसे हैं, जहां सरकारी स्कूलों के पास ठीक से भवन तक नहीं है। समस्या यह भी आई कि ज्यादातर स्कूलों में खाना बनाने के लिए किचन और स्टोर की जगह भी नहीं थी। ऐसे में, सरकार ने हर स्कूल में किचन और स्टोर का सेट बनवाने के लिए 60 हजार रुपए तक का फंड दिया है। यह अलग बात है कि कई राज्य सरकारों ने इस फंड को भी दूसरे कामों में झोंक दिया। आंकड़ों के हिसाब से यह योजना दुनिया की महायोजनाओं में शुमार हो गई है। लेकिन, इस योजना की जमीनी हकीकत की तस्वीर बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती।

एक गैर-सरकारी संगठन, ‘एकाउंटबिल्टी इनिशिएटिव’ ने कई राज्यों में मिड-डे-मील योजना के कार्यान्वयन का सर्वेक्षण कराया था। इस सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश और बिहार के हालात काफी खराब पाए गए। उत्तर प्रदेश के हरदोई और जौनपुर में सैम्पल सर्वे के दौरान यह जानकारी आई कि स्कूलों में मिड-डे-मील खाने वाले जितने बच्चों का नामांकन किया जाता है, उसमें वास्तविक तौर पर केवल 60 प्रतिशत बच्चे ही दोपहर का भोजन करते हैं। ऐसे बच्चों को भी भोजन लाभार्थी दिखाया गया, जो कि स्कूल में महीनों से गैर-हाजिर थे। बिहार के पूर्णिया जिले में मिड-डे-मील स्कूलों में साल के 239 कार्य दिवसों में दर्शाया गया। जबकि, जांच के दौरान पाया कि मिड-डे-मील का वितरण इन स्कूलों में महज 169 कार्य दिवसों में ही हुआ था। इतना ही नहीं मिड-डे-मील तय मैन्यू के हिसाब से नहीं पाया गया। यहां गुणवत्ता के साथ तय मापदंडों के अनुसार भोजन के वजन में भी कमी पाई गई। सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया कि समुचित निगरानी न होने की वजह से योजना बहुत लुंज-पुंज ढंग से लागू हो पा रही है।

इस महत्वाकांक्षी योजना का एक पक्ष तो यह है कि कुछ लोगों के लालच और भ्रष्टाचार की वजह से बच्चों को पोषण वाला भोजन नहीं मिल पाता। लेकिन, इसका एक दूसरा व्यवहारिक पक्ष भी है। मिड-डे-मील के लिए सरकार ने प्रति छात्र के हिसाब से काफी कम बजट रखा है। पिछले 10 सालों में चार बार प्रति छात्र बजट में बढ़ोत्तरी की गई है। इसके बाद भी करीब 3.50 रुपए प्रति छात्र के हिसाब से मिड-डे-मील का बजट बन पाया है। 25 से लेकर 50 छात्रों के बीच एक रसोइए और एक सहायक रखने का प्रावधान किया गया है। राज्य सरकारों के तमाम दबाव के बावजूद केंद्र सरकार ने ऐसे कामगारों का वेतन महज 1000 रुपए प्रति महीने निर्धारित किया है। शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के लिए यह मानदेय बराबर है। मिड-डे-मील की व्यवस्था के लिए ज्यादा जिम्मेदारी स्कूल के अध्यापकों पर डाल दी गई है। ऐसे में, तमाम स्कूलों के अध्यापक बच्चों को पढ़ाई-लिखाई कराने के बजाए मिड-डे-मील बनवाने की व्यवस्थाओं में ही जुट जाते हैं। जाहिर है इसके चलते सरकारी स्कूलों में पहले से ही लचर पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था का और कचूमर निकलने लगा है।

इस संदर्भ में मध्यप्रदेश के कुछ स्कूलों का अनुभव बताना यहां मौंजू रहेगा। इन पंक्तियों के लेखक ने कुछ महीनों पहले मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले शहडोल के कुछ ग्रामीण स्कूलों में मिड-डे-मील व्यवस्था का जायजा लिया था। शहडोल शहर से महज चार-पांच किलोमीटर दूरी पर दो गांवों के जूनियर स्कूलों में जब मिड-डे-मील व्यवस्था का हालचाल लिया गया, तो यहां के एक प्रधानाचार्य ने अनौपचारिक बातचीत में खुलकर स्वीकार किया कि इस योजना के चलते अध्यापकों का काफी समय इसी की व्यवस्था में जाया हो जाता है। इसकी एक खास वजह यह है कि मिड-डे-मील की व्यवस्था में तय मापदंडों की खानापूर्ति नहीं की गई, तो अध्यापकों की नौकरी जाने का खतरा भी बना रहता है। जबकि, स्कूलों से गैर-हाजिरी और पढ़ाई-लिखाई न कराने पर इस तरह का खतरा सरकारी अध्यापकों पर कभी नहीं रहता। पिछले 10 सालों से मिड-डे-मील की जिम्मेदारी संभाल रहे एक अध्यापक ने अपनी दर्दनाक दास्तां बताई। कहा कि ग्राम प्रधान से लेकर गांव के गणमान्य लोगों को पटाए रखना बहुत जरूरी होता है। इसके चलते गांव के चार-छह लोग मिड-डे-मील को रोजाना भकोस भी जाते हैं। यदि ऐसा ना किया जाए, तो ये लोग ऊपर शिकायत कर देते हैं। इनकी शिकायतों पर अध्यापकों की नौकरी के ऊपर खतरा आ जाता है। ऐसे में, उन लोगों को बच्चों की पढ़ाई-लिखाई से अधिक चिंता, मिड-डे-मील के तामझाम की रहती है।

जब एक स्कूल के प्राचार्य से पूछा कि वे प्रति छात्र सिर्फ 3.50 रुपए के बजट में बच्चों को भोजन कैसे करा देते हैं? तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि इस देश में हर काम जुगाड़ गाड़ी चलाकर होता है। दरअसल, स्कूल के सभी बच्चे सरकारी भोजन करना पसंद नहीं करते। जबकि, रजिस्ट्ररों में नामांकन सभी का होता है। इसी जुगाड़ से हम लोग बजट का संतुलन बना लेते हैं। एक अध्यापक ने बताया कि मिड-डे-मील की योजना के तहत अभी भी अरहर की दाल का सरकारी भाव 30 से 35 रुपए प्रति किलो का है। जबकि, बाजार से उन्हें यह दाल 70-80 रुपए प्रति किलों में खरीदनी पड़ती है। जब इस तरह की परेशानियों का जिक्र  अधिकारियों से किया जाता है, तो वे कहते हैं कि इन सामानों का भाव दिल्ली से तय होता है, लिहाजा वे कुछ नहीं कर सकते। कइयों ने बताया कि शहरी इलाकों में एक हजार के मानदेय पर अब रसोइए भी नहीं मिलते। ऐसे में, कई जगह पाया गया कि स्कूली बच्चे पढ़ाई करने की जगह दाल और चावल में कंकड़ बीनते दिखाई पड़े। कुछ तो चूल्हे में ईंधन झोंकते हुए दिखाई पड़े।

छपरा में हुए त्रासद हादसे के बाद देश के कई हिस्सों से इस आशय की खबरें आ रही हैं कि मिड-डे-मील की वजह से छात्र लगातार बीमार हो रहे हैं। पिछले दिनों नेयवेली (तमिलनाडु) के एक सरकारी स्कूल में मिड-डे-मील खाने के बाद 102 छात्राओं की हालत बिगड़ गई थी। गनीमत यही रही कि समय से सही इलाज मिल जाने के चलते किसी छात्रा की जान नहीं गई। पिछले दिनों ही महाराष्ट्र के पुणे जिले के एक स्कूल में दोपहर का भोजन करने के बाद 21 बच्चे गंभीर रूप से बीमार हुए थे। राजस्थान में पिछले तीन सालों में ऐसे छह मामले सामने आए हैं, जिनकी वजह से तमाम बच्चों की जान खतरे में पड़ी है। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने इन हादसों की जांच रिपोर्ट राजस्थान सरकार से मंगवा ली थी। जांच में ये तथ्य सामने आए हैं कि खुले में बनने वाले भोजन में छिपकली और चूहे गिर जाने की वजह से भोजन विषाक्त हुआ था। इनमें से एक स्कूल में तो बन रही खिचड़ी में सांप ही गिर गया था। गनीमत यही रही कि सांप जहरीला नहीं था। लेकिन, भोजन करने वाले बच्चों की तबियत कई दिनों तक खराब रही थी। नवंबर, 2009 में दिल्ली के एक स्कूल में 120 बच्चे गंभीर रूप से बीमार पड़े थे। जांच के बाद यह जानकारी आई कि जो चावल बनाया गया था, उसका एक हिस्सा सड़ा और उसमें कीड़े भी थे। आरोपी अध्यापकों ने यही सफाई दी थी कि उन्हें जो राशन सरकार मुहैया कराती है, वे उसी का ही तो उपयोग कर सकते हैं। जुलाई, 2011 में हरियाणा के कुरुक्षेत्र में मिड-डे-मील खाकर 43 बच्चे गंभीर रूप से बीमार हुए थे। इनमें से कई को दो दिन तक वेंटिलेटर पर भी रखना पड़ा था। पिछले साल अगस्त में हरियाणा के ही यमुनानगर में कई बच्चों की तबियत बिगड़ गई थी। क्योंकि, सब्जी में दो छिपकलियां पाई गई थीं। झारखंड और मध्यप्रदेश में भी मिड-डे-मील के कुप्रबंधन के चलते कई हादसे हो चुके हैं। मध्यप्रदेश में पिछले चार सालों में सात ऐसी घटनाएं रिपोर्ट हुई हैं, जहां पर छिपकली गिरने की वजह से बच्चे बीमार हुए हैं।

केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी से जब यह पूछा गया कि आखिर देशभर में मिड-डे-मील में छिपकलियों आदि का इतना प्रकोप कैसे हो रहा है? जवाब यही मिला कि अधिसंख्य प्राइमरी स्कूलों में ठीक से किचन का प्रावधान नहीं है। कई जगह खुले में पेड़ों के नीचे र्इंटों का चूल्हा बनाकर भोजन पकाया जाता है। ऐसे में, जरा सी लापरवाही में ये गड़बड़ियां हो जाती हैं। एक सच्चाई यह भी है कि प्रति छात्र काफी कम बजट का प्रावधान होने की वजह से भी भोजन की गुणवत्ता बनाए रखना मुश्किल है। यह भी सच्चाई है कि भ्रष्टाचार की बढ़ती प्रवृति के चलते भोजन की गुणवत्ता के साथ बड़े पैमाने पर खिलवाड़ होता है। ऐसे में, जरूरी है कि मिड-डे-मील की सुचारू व्यवस्था के लिए निगरानी रखने का एक नियोजित तंत्र बने। ऐसे में ही सुधार हो सकता है। वरना, अरबों रुपए के बजट से चलने वाली इस नायाब महायोजना का पूरी तौर पर बंटाधार होना तय है। यह अच्छी बात है कि केंद्र सरकार ने बिहार के हादसे के बाद पक्का संकल्प जताया है कि हर हाल में मिड-डे-मील योजना का प्रबंधन दुरस्त किया जाएगा। इसके लिए जो कुछ भी करना जरूरी होगा, वह किया जाएगा। अब देखना है कि केंद्र की यह राजनीतिक इच्छाशक्ति कसौटी पर कितनी खरी उतरती है?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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