मिशनरी पत्रकारिता की आखिरी भेंट चढ़ गए बीवी के सारे जेवर

Vikas Mishra : 14 जनवरी बीतती जा रही है। ये मेरी जिंदगी की यादगार तारीख है। 14 जनवरी 2000 को मैंने अमर उजाला मेरठ ज्वाइन किया था। एक नई पारी शुरू की थी बहुत कुछ मिटाकर। रामेश्वर पांडेय जी तब मेरठ अमर उजाला के प्रभारी थे, पांच हजार रुपये मासिक पर उन्होंने ये कहते हुए रखा था कि चार महीने में मणिसाना कमेटी की रिपोर्ट लागू हो जाएगी तो तुम्हें अंदाजा नहीं होगा कि तुम्हारा वेतन क्या होगा। खैर मुझे उसकी चिंता नहीं थी। इससे पहले करीब चार साल लखनऊ में बीते थे। अर्श से फर्श का सफर तय किया था।

1996 जनवरी में जब विचार मीमांसा पत्रिका का यूपी ब्यूरो चीफ बनकर लखनऊ गया था तो अलग ही जलवा था। 25 साल उम्र थी, शादी हुई नहीं थी, अपने बैच के सभी साथियों से ज्यादा तनख्वाह थी, अच्छी खासी टीम थी। लेकिन पत्रिका बंद हो गई। बाद में तनख्वाह भी बंद हो गई। संघर्ष शुरू हो गया, बेरोजगार मैं एक भी दिन के लिए नहीं था, लेकिन तनख्वाह बहुत मारी गई। काम बहुत किया। पांच पांच सौ रुपये में डाक्यूमेंट्री लिखी। नेताजी का चुनाव प्रचार भी लिखा। 13 एपीसोड की सांस्कृतिक पत्रिका गोरखपुर दूरदर्शन से प्रसारित हुई, जिसकी ऐंकरिंग भी मैंने की थी। लेकिन प्रोड्यूसर के पास तनख्वाह देने के पैसे तो दूर, लखनऊ से गोरखपुर तक टेप भेजने के लिए बस के किराए के भी लाले थे।

शादी हुई तो बीवी को पहली रात गिफ्ट करने के लिए फुटपाथ से 125 रुपये का लाल रंग का गाउन खरीदा। खर्च कम होने का सवाल नहीं था, कुछ कमाई… तो कुछ दिलदार यारों की उधारी। आखिरी नौकरी थी राष्ट्रीय स्वरूप लखनऊ के ब्यूरो चीफ पद की। ठीक ठाक मामला था, लेकिन बात कुछ मान के खिलाफ हो गई। मैंने अमर उजाला में बात की, मामला बन गया। लखनऊ छोड़ने से पहले कुछ कर्ज सिर पर चढ़ा था। मैंने अपनी मोटरसाइकिल बेचने की ठानी, जिसे कभी विचार मीमांसा के संपादक और मालिक वीएस वाजपेयी ने मुझे मुलायम सिंह की स्टोरी करने पर गिफ्ट किया था। पत्नी अड़ गई पहली बार। जिद पकड़ ली कि आप मेरे गहने बेचिए।

खैर मिशनरी पत्रकारिता की आखिरी भेंट चढ़ गए बीवी के सारे जेवर। जैसा मैंने कहा कि मेरठ मैं सबकुछ मिटाकर पहुंचा था। कुछ याद नहीं करना चाहता था। तनख्वाह पांच हजार, जिसमें से 12 सौ रुपये हर महीने बड़े वाले भतीजे के पास जाता था। बाकी में पूरी मौज से रहते थे हम। अरसे बाद तो हर महीने तनख्वाह मिलनी शुरू हुई थी। खैर अमर उजाला से जागरण पहुंचा। जिस ब्यूरो चीफ पद से बहुत प्यार था, वो सवा साल में सूद समेत वापस मिल गया। दैनिक जागरण के डायरेक्टर से दोस्ती स्तर के रिश्ते हुए और वहां एक क्रांति भी हुई। पचास से ज्यादा लोग दैनिक जागरण में सीधे मेरे रिकमंड करने पर रखे गए।

बहुत सम्मान मिला यहां तक कि बिना किसी टेस्ट, बिना औपचारिक इंटरव्यू के दैनिक जागरण से सीधे ग्रुप के चैनल – चैनल 7 आ गया। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के करियर का नया अध्याय शुरू हुआ 2 फरवरी 2005 से। लेकिन लखनऊ के संघर्ष के लिए मैं ईश्वर का धन्यवाद करना चाहूंगा क्योंकि अगर वहां संघर्ष नहीं मिलता तो मैं शायद इतना बैलेंस कभी नहीं होता। इतनी समझ नहीं बन पाती, संघर्षों ने इम्तिहान तो कड़ा लिया, लेकिन सबक बहुत अच्छे दिए। और हां, चाहे जितनी तकलीफ में रहा, किसी के आगे रोया नहीं, गिड़गिड़ाना नहीं पड़ा। कभी उदास नहीं हुआ, कभी निराश नहीं हुआ, हर हाल में ठहाके लगाए और लगवाए भी। ये भी तय था कि घर से कोई मदद नहीं लेनी है। मन में भरोसा था कि हम क्लिक करेंगे और कामयाब होंगे।

मेरे तमाम साथी, मेरी पत्नी, मेरे आसपास के जानने वालों को मुझसे शिकायत रहती है कि मैं उधार मांगकर लोगों को उधार दे देता हूं, तमाम पैसे डूब जाते हैं। खाता हमेशा खाली रहता है। मैं क्या किसी से कहूं, अगर संकट में मेरे चाहने वालों ने मुझसे मुंह मोड़ लिया होता तो क्या मैं अपने पैरों पर खड़ा रह पाता। कल मैं तकलीफ में था, तो दोस्तों ने मदद की, आज मैं अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा हूं तो फिर कैसे किसी की मदद से पीछे हट जाऊं। ऊपर वाले को भी जवाब देना है भाई।

(पिछले 17 साल की इस यात्रा में लखनऊ का संघर्ष याद करते हुए तीन महत्वपूर्ण पात्रों को बहुत याद कर रहा हूं- ज्ञान प्रकाश Gyan Swami उर्फ ज्ञान स्वामी, संजय दीक्षित Sanjay Dikshitit और आलोक गुप्ता Alok Gupta। जब इस चौकड़ी की कहानी आएगी तो आप भी भीग जाएंगे। फिर कभी…)

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *