मिहिर एस शर्मा ने लिखा – गूगल सर्च इंजन का बढि़या इस्‍तेमाल करते हैं पी साईनाथ

अंग्रेजी अखबार द हिंदू के वरिष्‍ठ पत्रकार तथा ग्रामीण मामलों के संपादक पी साईनाथ अपने लेखों के माध्‍यम से हमेशा चर्चा में रहते हैं. ग्रामीण समस्‍याओं पर लिखे गए उनके लेखों की अक्‍सर सराहना होती है. इसके लिए उन्‍हें मैगसेसे पुरस्‍कार भी मिल चुका है. वे खुलकर किसी पर निशाना साधते हैं. पर इस बार उन पर बिजनेस स्‍टैंडर्ड के ओपिनियन पेज के संपादक तथा हावर्ड शिक्षित पत्रकार मिहिर एस शर्मा ने निशाना साधा है. 

मिहिर ने अपने लेख में पी साईनाथ का उपहास उड़ाते हुए लिखा है कि पीसीआई अध्‍यक्ष जस्टिस काटजू के चहेते पी साईनाथ गूगल सर्च इंजन का बढि़या इस्‍तेमाल करते हैं. मिहिर ने अपनी भड़ास इसलिए निकाली है कि पी साईनाथ ने योजना आयोग के उपाध्‍यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया के गरीबी रेखा के लिए निर्धारित की गई राशि को लेकर खबरें लिखी थीं, जिसमें अहलूवालिया पर सवाल उठाए गए थे. आप भी नीचे देख सकते हैं मिहिर एस शर्मा के लेख.


"The government will get away with it, because of our perennial confusion between public and personal austerity, and our jaw-dropping incompetence with simple mathematics. Consider, for example, the recent attack on Planning Commission Deputy Chairman Montek Singh Ahluwalia by one Palagummi Sainath, famously the favourite journalist of Press Council Chairman Markandey Katju.

"For a widely-read column in The Hindu, Sainath Googled previous newspaper reports that Ahluwalia had spent Rs 2 lakh a day on some of his foreign trips, and that he had spent 274 days outside the country in his seven-year tenure. (He did not mention that Mr Ahluwalia was the point-man in India’s interaction with the G-20 in the aftermath of the financial crisis. Odd, I’m sure that’s Googleable.)

"Let’s assume that that’s excessive; and that Mr Ahluwalia and his delegation should have spent half that. That comes to an excess spending of Rs 40 lakh a year. This year’s fiscal deficit is more than a million times that sum. The folly of such 'analysis' is matched only by the cynicism of the UPA, which thinks that responding to laughable smears with its unpersuasive attempts at 'austerity' will answer genuine complaints about its profligacy with public funds."

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