मीडिया का नियंत्रण सरकारी हाथों में दिया जाना चाहिए?

भारत की सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय प्रेस संस्थान द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में आत्मनियमन के लिए किए जा रहे प्रयासों के लिए मीडिया संस्थाओं की प्रशंसा करते हुए कहा कि आत्मनियमन प्रजातंत्र में सर्वश्रेष्ठ तरीका है और इस प्रयास की पूर्ण सार्थकता के लिए मीडिया को अभी और समय दिया जाना चाहिए। हाल के दौर में संस्थाओं व संवैधानिक व्यवस्थाओं पर कीचड़ उछालना एक अच्छा शगल बन गया है। बगैर यह समझे हुए कि इस तरह कीचड़ उछालने से संस्थाओं के प्रति सही दृष्टिकोण नहीं बन पाता और प्रजातंत्र की गुणवत्ता कम होने लगती है।

भारत में पढ़े-लिखों का एक वर्ग है जो मीडिया से लेकर मदरसे तक और संसद से लेकर साम्यवाद तक हर चीज़ खराब नज़र आती है। मसलन सिविल सोसायटी के लोगों को संसद में बलात्कारी नज़र आते हैं, संसद को न्यायपालिका नहीं सुहाती, कार्यपालिका न्यायपालिका को लक्ष्मण-रेखा दिखाती है, न्यायपालिका रावण का वध करने के लक्ष्मण-रेखा लांघने को न्यायोचित ठहराती है, प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष को मीडिया का एक बड़ा भाग बे-पढ़ा-लिखा और दंगा उकसाने वाला नज़र आता है और मीडिया हर संस्था को नकारात्मक भाव से देखना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझती है।

नतीज़ा यह होता है कि जनभावना लगभग सभी संस्थाओं के प्रति एक उदासीन रवैया अपना लेता है। क्षति होती है प्रजातांत्रिक व्यवस्था की। ऐसे माहौल में सूचना एवं प्रसारण मंत्री का मीडिया के प्रति एक सकारात्मक भाव रखना अपने आप में एक क्रांतिकारी सोच कहा जा सकता है, वह भी तब जबकि संसद में बैठा एक बड़ा वर्ग चाहे वह किसी भी पार्टी का हो, मीडिया पर नकेल डालने की लगातार वकालत करता रहा है और सरकार पर दबाव डालता रहा है।  

12 जून 1776 के वर्जीनिया डिक्लेयरेशन के 12वीं बिंदु में कहा गया है- “प्रेस की आज़ादी स्वाधीनता के सबसे महत्वपूर्ण खंभों में से एक है और यह तभी बाधित हो सकती है जब सरकारें निरंकुश हो जाएं”। शायद यह बात भारत की वर्तमान सरकार और उसकी सूचना एवं प्रसारण मंत्री तो समझती हैं लेकिन राजनीतिक वर्ग व सत्ता-सुख भोग रहे तमाम अन्य तत्व अभी भी नहीं समझ पा रहे हैं। यही वजह है कि तमाम परिचर्चाओं में राजनीतिक वर्ग व कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और इक्का-दुक्का वरिष्ठ पत्रकार इस बात की पुरजोर वकालत करते पाए जाते हैं कि मीडिया को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाना ज़रूरी है।

यानि सरकार स्वतंत्र मीडिया के पक्ष में खड़ी है जबकि समाज का संभ्रांत चरित्र वाला एक छोटा सा वर्ग अभी भी मीडिया पर सरकारी नियंत्रण की वकालत कर रहा है। मुद्दा यह नहीं है कि मीडिया की निंदा की जानी चाहिए या नहीं, मुद्दा यह है कि क्या प्रजातंत्र में विश्वास रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस बात की कल्पना भी कर सकता है कि मीडिया नियंत्रण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सरकारी हाथों में दिया जाना चाहिए? 

अमेरिकी व्यंग साहित्यकार मार्क ट्वेन ने कहा था- “हमारे देश में तीन बेहद नायाब चीज़ें हैं- पहली अभिव्यक्ति की आज़ादी, दूसरी विवेक की आज़ादी और तीसरी दोनों को इस्तेमाल न करने की बुद्धिमत्ता”। अगर भारत के बारे में उन्हें कहना होता तब शायद वह ये कहते- भारत में तीन नायाब स्वतंत्रताएं हैं- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विवेक की स्वतंत्रता और यह बुद्धिमत्ता की पहली आज़ादी का इस्तेमाल करना है लेकिन दूसरी आज़ादी का कभी नहीं।

लेकिन गौर से देखें तब हम पाएंगे कि अभिव्यक्ति की आज़ादी के तहत हमने निंदा करने का अनुभव और हौसला पिछले 64 साल की प्रजातांत्रिक व्यवस्था में हासिल कर लिया है लेकिन विवेक की आज़ादी का इस्तेमाल इस निंदा पुराण में शायद ही कभी हो पाता है।

पिछले 250 सालों में या यूं कहें कि अमेरिकी संविधान बनने के बाद से ही राजनीति शास्त्र के सभी विद्वानों ने निर्विवाद रूप से माना है कि किसी भी प्रजातंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी के बिना प्रजातंत्र की कल्पना ही नहीं हो सकती। थॉमस जेफरसन ने तो यहां तक कह दिया कि हमें अगर एक ऐसी सरकार जो बगैर प्रेस के हो और एक ऐसा प्रेस जो बगैर सरकार के हो तब हम दूसरे विकल्प को चुनेंगे। फिर क्या वजह है कि भारत में हर तीसरे दिन कोई काटजू, कोई संसद में बैठा खद्दरधारी या फिर नीली बत्ती लगाए कोई अफसर यह ऐलान करता है कि मीडिया को नियंत्रित करना ज़रूरी है। 

आलोचना की प्रक्रिया किसी भी प्रजातंत्र में पूरी तरह वैध मानी जाती है क्योंकि आलोचना का उद्देश्य उन संस्थाओं को बेहतर करना होता है, लेकिन इसकी परिणति अगर प्रजातंत्र की गुणवत्ता पर आघात करती हो तब वह आलोचना की श्रेणी में नहीं आता। शायद यही वजह है कि जहां सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी को यह बात सहज समझ में आ गयी, लेकिन मीडिया पर नकेल डालने वाले इस वर्ग को, जिसमें चंद पत्रकार भी हैं, इसे समझने में देर लग रही है। भारत सरकार, खास करके प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी व उनके मंत्रालय के अधिकारियों के अलावा कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी भी मीडिया-नियंत्रण के खिलाफ रहे हैं।

साथ ही हाल के दौर में ही सरकार यह मानने लगी है कि मीडिया के साथ एक शत्रु-भाव रखकर शासन चलाना कोई बेहतर विकल्प नहीं है। न केवल राष्ट्रीय चैनलों व अखबारों बल्कि क्षेत्रीय अखबारों व चैनलों को भी प्राथमिकता देने की नयी योजना मंत्रालय ने बनायी है। शायद सरकार के यह समझ में आ गया है कि अन्ना आंदोलन में मुखर रही मीडिया को किसी के साजिश के अंग के रूप में लेना सरकार की भूल थी और सरकार के तमाम जनोपयोगी कार्यक्रम इसलिए भी राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार की चौखट पर दम तोड़ रहे हैं क्योंकि मीडिया के ज़रिए इन कार्यक्रमों के प्रति सामूहिक जनचेतना जगाने में सरकार को गुरेज रहा है।

प्रधानमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी ने सरकार के प्रति नकारात्मक जनभावना को एक उदाहरण के जरिए व्यक्त किया। “अगर सचिन चौका मारते हैं तब पूरी दर्शक दीर्घा तालियों से गूंज जाती है लेकिन बाउंड्री पर खड़े प्रवीन कुमार अगर एक चौका रोक लेते हैं तब कोई खास प्रतिक्रिया नहीं होती, जबकि भारतीय टीम को लाभ बराबर का होता है” – अधिकारी ने कहा। दरअसल उन्हें शायद यह नहीं मालूम था कि द्वंद्वात्मक प्रजातंत्र में मीडिया की प्राथमिकता सरकार का सकारात्मक पहलू दिखाना नहीं बल्कि नकारात्मक पहलू दिखाना होता है। और यह प्राथमिकता तभी बदलती है जब सरकार भी मीडिया के प्रति विरोधी भाव छोड़कर अपने कार्यक्रमों को एक आंदोलन का स्वरूप दे और मीडिया को इसमें एक पार्टनर की तरह समझे। 1960 का उत्तरार्ध इस बात का गवाह है हरित क्रान्ति संभव न होती अगर मीडिया अपनी सकारात्मक भूमिका न निभाता। 

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख आज के नईदुनिया में भी प्रकाशित हो चुका है.

 

 
 

 

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