मीडिया का मौन साधक सुभाष कदम

Amarendra Kishore : जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय से भूगोल में स्नाकोत्तर से अचानक मीडिया की ओर मुखातिब सुभाष कदम के बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था कि आने वाले सालों में वह ऐसा कुछ कर गुजरेगा, जिसे लोग सालों-साल क्या हर वक़्त और हर हफ्ते महसूस करेंगे। कितनी अटपटी सी बात है की किसी को सीमा सुरक्षा बल में उपाधीक्षक पद का बुलावा आये, वहां वह कुछ दिनों तक प्रशिक्षण भी ले मगर कुछ रास नहीं आये तो फिर मीडिया में लौट आये –सुभाष ने ऐसा ही किया। क्योंकि उसके दिमाग में कुछ और ही चल रहा था और उसका दिल मीडिया केलिए ही धड़क रहा था।

यह सच है कि सुभाष के साथ और उसके साथ की अनगिनत यादों में बसीं हैं अपनी जवानी की कई बातें। अकथ बातें। इससे बढ़कर सबसे बड़ी बात है कि उसकी सहजता मुझे तसल्ली देती है, ताक़त देती है, आत्मबल देती है। अपनी नियति से जूझने का संबल है उसके एक-एक शब्द, उसके सहज-सरस बोल। यह किसी को पता नहीं मगर यही सच है कि अपने रोज-ब-रोज के संघर्ष के इस अंधेरे खोखल में वह मेरा साथी रहा है। उसका यही सनातन-सात्विक भाव मेरे साथ आज भी बरक़रार है । नसीहतें देने से चूकता नहीं मगर बढ़िया भविष्य की ओर इशारा भी करता है। इन सब के बावजूद वह संगी होकर भी मेरे लिए वह हर पल रहस्य है, अबूझ पहेली है। अपनी बातें कहता नहीं और मेरी बातें मेरे दिल में रहने देता नहीं। नाराज भी हो जाये तो नाराजगी उसके चेहरे से उमगती नहीं। बशीर बद्र की एक पंक्ति उधार लेता हूँ– 'अजीब शख्श है नाराज होके हंसता है, मैं चाहता हूँ खफा हो तो वो खफा दिखे।' एक से एक मजेदार किस्से, घटनाएं– जिन्हें हमने सुभाष के साथ महसूस किया। आज इतने सालों बाद ये तमाम यादें फिल्म-स्ट्रिप्स की तरह सामने से गुजरतीं हैं, कुछ आगे निकल जातीं हैं और कुछ ठिठक जातीं हैं।

परदे पर आकर उधम मचाना मीडिया में आम बात है, यहाँ हर किसी को मौक़ा चाहिए। परदे पर दिखने केलिए तमाम जुगाड़ और जुगत का इस्तेमाल किया जाता है। मगर कुछ ऐसे भी समझदार लोग हैं जो अपनी प्रतिभा से टीवी के हर पल और फ्रेम में प्राण फूंक देते हैं। सुभाष मीडिया को उन्ही साधकों में एक है जो कार्यक्रम को दिशा देता है और चैनल की दशा तय करता है। अपनी आत्मा की आवाज सुननेवाला इंसान है– प्रचार में विश्वास नहीं और जिसे समय पर भरोसा नहीं। इसलिए टीम वर्क में भरोसा रखकर वह काम करने में विशवास रखता है। संस्थान का यह मेरा संगी अपनी इन्ही वजहों से अपनी ज़िंदगी सफल भी हुआ और आज मीडिया की दुनिया से थोडा दूर होकर नयी पारी की तैयारी भी कर रहा है।

उन दिनों आजतक में श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह (एसपी) को नए खून की तलाश थी, जो कुछ ख़ास हो, जिसमें 'स्पार्क' हो। उसके साथ २ मिनट की मुलाकात के बाद एसपी को वह 'स्पार्क' मिल ही गया। उनकी बेजोड़ टीम में सुभाष शामिल हो गए बतौर रिपोर्टर– कुछ ख़ास करने के मंसूबों के साथ। बाद के दिनों में जब आजतक चैनल बना तो सुभाष एक स्पेशल टीम के अगुआ बनाये गए। उसके बाद उन्हें पहला एसाइन्मेन्ट मिला मौसम आजतक बनाने का। कार्यक्रम बढ़िया बना– 'बादलों का डेरा' और 'बादलों का बसेरा' 'जैसे रूपक गढ़े गए और इस चैनल को पहला विज्ञापन मिला 'मौसम आजतक' के लिए। यहाँ अपनी शैक्षणिक पृष्ठभूमि का जमकर लाभ सुभाष ने उठाया। तब चैनल के वरिष्ठ श्री उदयशंकर ने रिपोर्टर्स मीटिंग में जमकर सुभाष की तारीफ की। इसके साथ ही उसे अफगानिस्तान और इराक पर अमेरिकी हमले के कवरेज पर कार्यक्रम बनाने की जिम्मेवारी भी दी गयी। तब इस आजतक का टीआरपी ६० से ६२% तक जा पहुंचा।

इसके बाद आजतक 'विशेष' बनाने की जिम्मेवारी सुभाष के कंधे पर सौंपी गयी। तीन सालों तक 'विशेष' बनाते हुए उसने कई कमाल और करतब दिखाए। हफ्ते में ५ दिन 'विशेष' बनाना अपने आप में चुनौती भरा काम था। दरअसल दिन भर में जो खबर सबसे ख़ास होती थी या ऐसा लगता था कि कहीं कोई कोई चूक रह गयी है तो उसकी भरपाई 'विशेष' बनाकर किया जाने लगा। अकेले इस कार्यक्रम का टीआरपी ६ से ७ फीसदी जा पहुंचा। सबसे ख़ास बात तो यह थी कि 'आजतक विशेष' को सम्बंधित रिपोर्टर ही पेश करता था। इससे रिपोर्टर्स का चेहरा जाना पहचाना होता गया। यानि शम्स ताहिर खान, दीपक शर्मा, प्रतीक त्रिवेदी, कादम्बनी शर्मा और आतिर खान जैसे कई रिपोर्टर्स आजतक विशेष की ही देन हैं। उधर इस कार्यक्रम से टीवी की दुनिया में खलबली मच गयी। मीडिया का यह मौन साधक महाभारत के बर्बरीक की तरह अपने निशाने को जानता था और अपने लक्ष्य को भेदने का जूनून उसके सिर पर सवार था। उसकी नजर और निशाने के बीच में अद्भुत तालमेल है। उधर अन्य चैनल्स अपना घोडा खोल चुके थे, तो 'आजतक विशेष' से टक्कर लेने की तैयारी हो चुकी थी। आखिरकार स्टार न्यूज़ में शाजी जमा 'ख़ास बात' लेकर आयीं– नहीं जमा। एनडीटीवी में देबांग 'खबरों की खबर' से दर्शकों का दिल जीत नहीं पाए। यहाँ तक कि आईबीएन ७ में आशुतोष 'डंके की चोट' का डंका पीट नहीं पाए और न ही रजत शर्मा का 'ब्रेकिंग न्यूज़' विशेष को टक्कर दे पाया। कार्यक्रम 'आजतक विशेष' जितना कसा होता था उतना ही विषय सापेक्ष भी, इसलिए श्रेष्ठ होता था (आज भी है)। इसलिए चैनल नंबर वन रहा। इसमें सुभाष का योगदान अप्रतिम रहा। बाद में कुछ सैद्धांतिक विरोध हुआ, कुछ वैक्तिक वजहों से भी सुभाष को आजतक से अलविदा होना पड़ा।

कुछ नया करना और उस काम को चर्चाओं में स्थापित करना सुभाष को बखूबी आता है। संस्थान के ज़माने में ही हम मित्रों ने महसूस किया भी, एक बार नहीं, कई बार। परदे के पीछे का खेल कोई उससे सीखे। वह नम्रता से, सहजता से अपनी बात कहता है। चूँकि सहजता उसका स्वभाव है, प्रतिबद्धता जीवनबोध और भाईचारा उसका संस्कार है। वह शांत है सरोवर जैसा। उसमें उत्साह है दरिया जैसा और कुछ कर गुजरने का जूनून लैला की आशिकी की तरह है। स्टारन्यूज़ में आया तो 'स्टार स्पेशल' की शुरुआत हुई। तब चैनल मुंबई में था मगर दिल्ली स्थित दफ्तर में सीमित संसधानो के बूते उसने इस कार्यक्रम को न सिर्फ ख़ास बनाया बल्कि टीआरपी की दौड़ में चैनल की भी तरक्की हुई। यह सबसे ख़ास बात है हमारे बैच के लोगों में पहला एग्जीक्यूटिव एडिटर होने का गौरव सुभाष कदम को स्टार न्यूज़ के जरिये मिला। इसके बाद सुभाष न्यूज़२४ पहुंचे आउटपुट हेड बनकर। यहाँ वह 'न्यूज़ शतक' लेकर आया– १५ मिनट में १०० खबरें। जिससे आगे बढ़कर विनोद कापडी २०० खबरें लेकर आये। लेकिन 'न्यूज़ शतक' का जोर बना रहा। यह सुभाष का अंतर्मुखी स्वभाव ही है जिसने उसे प्रचार और बडबोलेपन से उसे दूर रखा। उसे कोई समझ नहीं पाया और न ही उसकी योजनाओं को कोई भांप पाया। इसके अलावा सरकार का सबसे दर्शनीय चैनल राज्यसभा टीवी को सजाने सवारने का काम बतौर कंसलटेंट सुभाष ने ही ही किया।

जनसंचार संस्थान के दिनों की कई बातें याद आतीं हैं, सब कुछ यहाँ कहने लायक नहीं। एक बात तो बिलकुल नहीं। उम्मीद है कि विकास मिश्र और पवन जिंदल इस बात को राज ही रहने देंगे। मगर सुभाष की कई 'विशेषताओं' में एक की ही चर्चा कर दूं। कभी कभार जब कोई अध्यापक महोदय पढ़ा रहे होते थे तो पीछे बैठा सुभाष शांत होकर उनका कार्टून बना रहा होता था। सुभाष ने किनके कार्टून नहीं बनाये– सबके सब उसकी इस 'प्रतिभा' के शिकार हुए। और, पाठ्यक्रम निदेशक डॉक्टर रामजीलाल जांगिडजी की कक्षा में अनुपस्थिति में उन्ही की आवाज में पीछे से अचानक कहना– "भाई शांत तो हो जाओ।" सभी चौंक पड़ते थे क्योंकि जांगिड सर सामने के दरवाजे से ही कक्षा में आते थे।

आज सुभाष नौकरी और रोजगार से दूर होकर भविष्य की योजनायें तय कर रहे हैं। इन तमाम बातों से बढ़कर एक और ख़ास बात है कि सुभाष अपने व्यक्तिगत ज़िंदगी में नाबाद हैं– मतलब ४० पार के सुभाष अविवाहित हैं। कारण नहीं बताते की शादी क्यों नहीं की। कुवारेपन की यह भीष्म प्रतिज्ञा किस वजह से है, पता नहीं।

भगवान उन्हें कुछ नया और ख़ास करने का अवसर दे और कुंवारेपन का उनका अभेद्य दुर्ग धराशायी हो– यही मेरी कामना है।

अमरेंद्र किशोर के फेसबुक वॉल से.


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सुभाष कदम के बारे में अमरेंद्र किशोर के लिखे पोस्ट पर आईं कुछ टिप्पणियां यूं है…

Manoj Khandelwal my best wishes are with IIMCian subhash kadam . he is a man of true journalism..no compromise journalism some time make you uneasy to work with those tv channnel who want to follow copy and paste type programs…. creative and innovative journalist like him sometime feel fed up with these situations. hope he will bounce back with new idea…who knows something best is waiting for him….my best wishes are with him…come on….
 
Pawan Jindal Well done again Amarendra Kishore ,Subhash is one and only in our batch n was one of my closest friends in the institute n still very near to my heart.He is multi-faceted personality. He seems a typical Delhi boy n then he can talk very intelligently as a perfect JNUite, he seems indifferent n next moment very caring. You dont trust him n then very soon you realise how wrong you were.He can speak his mind n honest to his work.He is shy, very emotional n very responsible guy.As we were very close at IIMC I have many memories of that time. He was sincere and had an emotional touch with almost everybody but same time he was very mischievous and a prankster n we had a lot of fun.We closed a batchmate in the Hemant Joshi Sir room n blame was on Amarendra kishore-haha. He used to intensely like a girl in English Journalism who was very beautiful n talented but managed to talk with her only on Convocation day at IIC with help of Anita , our batchmate.You can find all ' Nav-Rasa' in his personality.He is very talented n knows his craft but cant be that 'flexible' at work -place so somehow he is a misfit, a rebel who stick with his gun n does not care much for all the 'Madhadhish'. He is very confident n have the courage n can come out with flying colours.He is 'yaaron ka yaar' n this is the best thing I like about him. Best wishes for him…..
 
Suraj Kumar bahut achcha . Shayad Amrendra tum Subhas ke baare mein nahin likhte to itni jankari mujhe kabhi nahin hoti television patrakarita ke itne bade shakshiyat ke baare mein. Ye sach mein institute mein shaant hi rahta tha aur shaant rahkar hi isne itna bada kaam kar dikhaya ye bade garv ki baat hai. Log kahte hain Advertising mein creativity jyada hoti hai lekin isne isne news ko bhi creativity ke saath pesh kiya. Shayad main Institute ke baad kabhi aik -do baar is se mila lekin kabhi tabsil charcha in vishyon par nahin huee thee. Congratulations Subhash…..
 
Suresh Kumar Vashishth very good……..all the best
 
Ratnessh Srivastwa Amrendra bhai u r doing gr8 service. Lage raho. Subhash ke baare mei kya kahen. Mast hai, yeh hamsabka impression hai. main, supriya aur pappu bhaiya (not from journ) saath mei rahte the, aur tab subhash aksar raat ko rookta tha…. kisse bahut hai…. Pawan ne to bahut kuchh kah bhi diya hai. Abhi kuchh maah pahle press club mei mile the hum sub. Abhi bhi Jawan hi deekhta hai….. Hope for the best for him.
 
Vibha Rani kamaal ka write up hai aapka
 
Mihir Kumar उम्र बताना जरूरी था क्या
 
Vikas Mishra सुभाष तो वाकई अलबेले किरदार हैं। कई बातें तो मैं भी नहीं जानता था। अमरेंद्र तुमने बहुत तबीयत से लिखा है सुभाष के बारे में। बढ़िया राइट अप।
 
Aman Kumar सुभाष के बारे में क्या कहना । अमरेंद्र ने तो इतिहास- भूगोल बता ही दिया । रही कही कसर पवन ने पूरी कर दी । मरे लिए सुभाष ऐसे मित्र रहे हैं…जिनसे खुलकर बातें होती रही है । वक़्त बदला …लेकिन अंदाज़ वही रहा । मैं बता दूं कि सुभाष के अंदर एक बेहत ही संजीदा इंसान रहता है ।

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