मीडिया के मालिक, मीडिया के कर्मी और मीडिया के पाठक-श्रोता-दर्शक जरूर पढ़ें इसे

अपने समय के पेचीदा सवालों से दो-चार होने का काम संपादक का होता है. बहुत गिने चुने ऐसे संपादक रह गए हैं जो बेहद ईमानदारी से अपना काम करते हैं, सोचते हैं और लिखते-पढ़ते-पढ़ाते हैं. हम लोग गर्व कर सकते हैं कि हम लोग जिस वक्त में जी रहे हैं उस समय में हिंदी में हरिवंश जैसे शख्स संपादक के रूप में हम लोगों के पास हैं. हरिवंश दिल्ली, मुंबई में नहीं बल्कि रांची में रहते हैं. हिंदी अखबार प्रभात खबर में वे प्रधान संपादक हैं. इस अखबार का मुख्यालय रांची में है. यहीं पर हरिवंश पाए जाते हैं.

जीवन में शुचिता, पारदर्शिता, सादगी, विनम्रता, दार्शनिकता, जनसरोकार को समेटे हरिवंश देसज के साथ-साथ ग्लोबल भी हैं. दुनिया भर में क्या चल रहा है, क्या लिखा जा रहा है, क्या कुछ नया हो रहा है, यह सब जानने को वो हमेशा उत्सुक रहते हैं और खुद जब जान समझ जाते हैं तो पूरी ईमानदारी से अपने पाठकों को भी यह सब बता देते हैं. इसी कारण वे खूब पढ़ते, लिखते और घूमते हैं. मीडिया का असल मतलब आम आदमी के जीवन को बेहतर बनाने के रास्ते में आने वाले रोड़ों-परेशानियों-भ्रष्टाचारियों-कुनीतियों का पर्दाफाश करना होता है और यह सब करते हुए आम आदमी की चेतना के स्तर को लगातार शिक्षित प्रशिक्षित करके उन्नत बनाना होता है ताकि वह आम आदमी लोकतंत्र का मतलब, अपने होने का मकसद समझ सीख सके. मीडिया का मतलब आम आदमी को उसके हक, उसके साथ हो रहे अन्याय आदि के बारे में समझाना, चेताना होता है ताकि वह इस संसार में अपने जीवन, अपने संसाधन, अपने दर्शन को ज्यादा गहराई से जान समझ सके. लेकिन ऐसा मीडिया नहीं कर रहा क्योंकि दुर्भाग्य से मीडिया अब सिर के बल खड़ा हो चुका है.

मुनाफा कमाने, ब्लैक मनी को ह्वाइट करने और ज्यादा से ज्यादा टर्नओवर बढ़ाने जैसे कारपोरेट बिजनेस मंत्र ही अखबारों चैनलों के ड्राइविंग फोर्स बन चुके हैं. इन्हीं के इर्द गिर्द संपादकीय तानाबाना बुना जाता है ताकि संपादकीय इस आर्थिक मकसद को साल्व कराने, बिजनेस टारगेट को पूरा करने में संपूर्ण सहयोगी साबित हो सके. इसी कारण अखबार और चैनल अब खबरें दिखाने के नहीं बल्कि छुपाने के लिए कुख्यात होने लगे हैं. अखबार व चैनल जनता को शिक्षित करने के लिए नहीं बल्कि कनफ्यूज करने में सहयोगी बनने के लिए बदनाम होने लगे हैं. अखबार व चैनल आम आदमी की दिक्कतों-परेशानियों-भ्रष्टाचारियों-कुनीतियों को बेनकाब करने में नहीं बल्कि सत्ता-सिस्टम से गलबहियां करके आम आदमी की दिक्कतों-दुखों को कांटीन्यू करके इसे और गहराने का काम करने लगे हैं. जब मीडिया सिर के बल खड़ी हो चुकी हो तो सच बोल और लिख पाना बड़ा मुश्किल होता है क्योंकि सोच बोलने और लिखने से कारपोरेट मीडिया के आर्थिक हितों पर चोट पहुंचती है, सिस्टम के साथ गलबहियां किए मीडिया के गोरखधंधे के खुलासे का खतरा हो जाता है.

इसलिए संस्थानी पत्रकार और संस्थानी संपादक अब बोलते लिखते नहीं. अगर जो आपके बोलते लिखते दिख जाते हैं तो आप उन्हें सुन पढ़ कर समझ सकते हैं कि वो लोरी सुनाने जैसी बातें ही बोलते लिखते हैं, कनफ्यूजन बढ़ाने वाली जलेबियां ही छानते हैं. उनसे आपकी आंखें नहीं खुल सकती, उनसे आपकी चेतना जागृत होती, उनसे आपकी दिमाग नहीं झनझना सकता. लेकिन ऐसे ही समय में हरिवंश जैसे लोग हैं जो उन सवालों पर भी लिखते बोलते हैं जिस पर सब दम साधकर चुप्पी साधे रहते हैं. नई दुनिया जैसे एक बड़े अखबार के बिकने के मसले पर मुझे नहीं लगता किसी बड़े संपादक ने अभी तक कुछ लिखा कहा है. हरिवंश ने इस पर लिखा है और ऐसा लिखा है कि पढ़ने के बाद कई घंटे आप सोचते रह जाते हैं.

जिन सदवचनों को हम लोग सुनते जीते आए हैं, वे वर्तमान और भविष्य की दुनिया में गरीबों का दर्शन माने जाने लगा है. अमीरों का जो दर्शन है उसमें नैतिकता, सदाचार, सरोकार, सच्चाई, मानवीयता, भावना, ईमानदारी जैसे ढेर सारे नेकशब्द अनमोलवचन सुभाषितानी सुशोभित नहीं होता. इस कारण गरीबों का दर्शन मजबूरी का दर्शन लगने लगता है. चूंकि आप गरीब हैं इसलिए ढेर सारी नैतिकताएं अपने इर्दगिर्द पिरोए हैं, इसका उलटा भी कर कह सकते हैं- चूंकि आप नैतिकताएं अपने इर्द गिर्द पिरोए हैं इसलिए गरीब हैं. और, इस गरीब व इसके दर्शन का मंजिल क्या है? अमीर के दर्शन में जाकर खत्म हो जाना. इसी कारण किसी भी तरीके से अमीर बनना पहला लक्ष्य हो गया है. और, किसी भी तरीके से अमीर बनना लक्ष्य है तो जाहिर है, किसी भी तरीके में नैतिकताएं, सरोकार, विद्वता, भावना, मानवीयता जैसी बातें नहीं आतीं. आती भी हैं तो ये सिर्फ इस्तेमाल करने के लिए, ताकि इनके भी नाम पर अमीर बना जा सके.

ध्यान से देखिए सोचिए. हम लोगों की आंखों के सामने ही जाने कितने दल, नेता, एनजीओ, कंपनियां, ट्रस्ट, लोग, देश आदि नैतिकता की बातें करते करते भावना की बातें करते करते समानता की बातें करते करते खुद अनैतिक, क्रूर और अत्यधिक अमीर बन गए. मतलब, ये सारे शब्द व दर्शन जो बताते सुनाते दिखाते हैं, जरूरी नहीं कि वे उसे जीते भी हों या उनकी भावना पवित्र हो. ज्यादातर इसका इस्तेमाल स्व व संस्थान के हित के लिए करते हैं. यूं ही नहीं है कि बड़ी बड़ी कारपोरेट कंपनियां अपने सामाजिक सरोकार को दिखाने के लिए लड़की बचाने, पानी बचाने, पर्यावरण बचाने, शेर बचाने, भालू बचाने, प्रतिभा पढाने, पढ़ाई कराने आदि का नारा देती रहती हैं. दूसरी तरफ ये कंपनियां अपने मूल धंधे में भयंकर लूट के एजेंडे पर चलते हुए भारी भरकम मुनाफा कमाती हैं. और यह लूट किसी और से नहीं बल्कि जनता की जेब की, जनता के जंगल की, जनता के हवा पानी की होती है. और इस लूट को लोकतंत्र के सारे तंत्र सपोर्ट करते हुए दिखते हैं, छुपे खुले तटस्थ रूप में, जहां जिस तरह से संभव हो सके.

कई बार लगता है कि अरबों साल बाद पृथ्वी आज जहां पहुंची है और मानव आज जहां पहुंचा है, वहां के सैद्धांतिक हालात अरब साल पहले से भिन्न नहीं है. हां, अरब साल पहले चीजें बड़ी साफ साफ हुआ करती थीं, कनफ्यूजन नहीं था. हत्यारे साफ साफ पहचाने जाते थे. शेर आएगा तो आदमी को मार कर खाएगा, यह तय था. सो, आदमी एलर्ट था. वो बचाव के लिए तैयारी किए था. जो ताकतवर मनुष्य था, जो ढेर सारे मनुष्यों का नेता था, वह राज करता था, क्योंकि उसके पास जनबल ज्यादा था. वह इस जनबल के आधार पर संसाधन और जनता को लूट मार खा बेच सकता था. आजकल क्या है. शेर तो पिंजड़े में कैद हैं या उनके लिए छोटा सा सुरक्षित इलाका क्रिएट कर दिया गया है घूमने टहलने के लिए, लेकिन हत्यारे अब मनुष्य की शक्ल ले चुके हैं. ये हत्यारे किसी को मारते हुए नहीं देखते. ये सेकेंडों में अरबों खरबों लोगों के जीवन व संसाधन को कत्ल कर देते हैं. आज के हालात ज्यादा कनफ्यूज्ड हैं. जनबल के आधार पर लूटने और राज करने का तंत्र आज भी जारी है. जो जनबल के आधार पर ताकतवर है वह कुछ भी करता रहता है, उसका कुछ नहीं होता. हां, न्याय का पूरा नाटक, मानवीयता का पूरा ड्रामा, सिद्धांत का पूरा दर्शन यह लूट तंत्र फैलाए हुए है ताकि चीजें इतनी उलझी हुई रहे कि कामन मैन को, गरीब को, मिडिल क्लास को समझ में ही न आए. इन सबकी आस्था तंत्र में बनी रहे. बेहतर भविष्य की उम्मीद पाले हुए वर्तमान के कष्टों को हंस हंस कर झेल सकें.

बात कर रहा था हरिवंश के लिखे का. एक अखबार बिक रहा है. वो अखबार जो बेहतरीन अखबारों में माना जाता रहा है. क्यों बिक रहा है, और ऐसे ढेर सारे बेहतरीन अखबारों की नियति बिकना क्यों है, इस सवाल पर हरिवंश ने बहुत गहराई से लिखा है. तथ्यों व उदाहरणों के साथ अपनी बात समझाई है. पूरा लेख पढ़ने के बाद आखिर में जो सवाल हरिवंश छोड़ते हैं, उसे पढ़ते हुए आप भाग्यवादी भी हो सकते हैं, यथास्थितिवादी भी हो सकते हैं, अपनी नैतिकता छोड़ते हुए अनैतिक भी हो सकते हैं.. जाकी रहे भावना जैसी. लेकिन मैंने किसी और रूप में उनके सवाल को लिया है. वे आखिर में लिखते हैं- ''जो जन्मा है, देर-सबेर जाएगा, एक टेक्नालाजी, दूसरे को रिप्लेस (बदलती) करती है……  …..यह समय की मार है. देश, काल और परिस्थितियों का परिणाम. इसके लिए कौन दोषी है या कसूरवार, यह तय करना आसान नहीं.''

हरिवंश की लिखी सारी बातें पढ़ने के बाद उनका आखिर पढ़ते हुए मैंने जब पढ़ना बंद किया तो सोचने लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि दोषी मानने और कसूरवार तय करने की बात भी गरीबों के दर्शन का हिस्सा हो. अमीर तो कुछ भी गलत, दोष, खराब नहीं मानता. उसका बस एक लक्ष्य होता है, किसी भी तरह के नेक, अनेक, खराब, गलत, दोष, पाप, पुण्य कर जाओ, बशर्ते उससे मुनाफा होता हो. जहां मुनाफा है, माल है, कमाई है, पैसा है, संसाधन है वहां जीवन की सुरक्षा है, जीवन के भरपूर उपभोग की गारंटी है, लंबी उम्र और बेहतर इलाज की व्यवस्था है, दुनिया दर्शन करने का मौका है. और, जहां मुनाफा, माल, कमाई, पैसा, संसाधन नहीं है वहां दरिद्रता है, रोग है, आंसू है, देहात है, एकांत है, उपेक्षा है, उत्पीड़न है, मौत है, डायरेक्ट बुढ़ापा है.

देश के करोड़ों लोग दिन रात खटते रहते हैं, ताकि दो जून की रोटी मिल सके और उनके बच्चे ठीकठाक पढ़ सकें. इन करोड़ों लोगों के पास कोई सपना नहीं है, कोई और सोच नहीं है, कोई दर्शन नहीं है. वे मशीन में तब्दील लोग हैं. इस व्यवस्था ने ऐसा किया है ताकि किसी के पास सोचने की फुर्सत ही न रहे. सोचेगा तो वह बोलेगा, लिखेगा. तो ऐसा करो कि बोलने लिखने के माध्यमों को भी कब्जा लो ताकि जो सोचने वाले बोलने लिखने को उत्सुक हों, उनकी आवाज सब तक पहुंच ही न सके और बोलने लिखने के माध्यमों पर उन्हें बिठाओ जो शब्दों की जलेबियां छानने में माहिर जिससे कोई फाइनल नतीजा न निकल सके, जिससे आम लोग 'ये भी सच वो भी सच', 'वो कम सच, वो ज्यादा सच' की बात करते हुए 'फिलासिफकल एंटरटेनमेंट' की रुटीन की खुराक पा सकें और सो जाएं. वो चेतना के स्तर पर वहीं के वहीं बने रहें.

यही कारण है कि किसी बौद्धिक सेमिनार में कोई संपादक कहता मिल जाता है कि भारत बहुत बदल गया है, देखने का नजरिया बदलो. कोई कहता है कि भारत चौराहे पर है. कोई कहता है कि मुश्किलें बहुत हैं. कोई कहता है कि तंत्र खूब सक्रिय है और देखिए फलां फलां मामले में क्या खूब सक्रियता रही और न्याय मिला. मतलब, सुनने वाला और ज्यादा कनफ्यूज होकर लौटेगा. उसे उम्मीद भी नजर आएगी, उसे निराशा भी होगी. वह तय न कर सकेगा कि गलत क्या है सही क्या है. उसकी समझ बनेगी कि 'कुछ सही, ज्यादा गलत' है या 'ज्यादा सही, कुछ गलत' है. जाहिर है, दुविधा में जी रहे हम लोग माया मिली न राम वाली हालत में है.

दृष्टि साफ न हो, विजन क्लीयर न हो, सोच स्पष्ट न हो तो आप पूरी जिंदगी गुलामी करते हुए मर जाएंगे और आपको एहसास तक न होगा कि आप कितने अच्छे खासे गुलाम हैं और आप जैसे ही लोग पूरी दुनिया के मालिक बने बैठे हैं, यहां से वहां उड़ रहे हैं और चुटकियों में अरबों खरबों की डील कर ले जा रहे हैं. हमको आपको बेच दे रहे हैं, हमारा आपका जो संसाधन धरती और साधन पर हक है, उसको अधीन किए जा रहे हैं. मैं यह नहीं कह रहा कि आप भी लुटेरा बन जाओ. लेकिन इतना तो खुद को डेवलप करो कि आपको अपनी और अपनी जनता की हालत के अपराधियों की शिनाख्त करने में मुश्किल न हो. शब्दों की, सक्रियता की, तंत्र की जलेबियां छानने के इस दौर में तेल के नीचे क्या है, जानने के लिए जलेबियां वाले मीठे लच्छेदार व्यंजन भाषण बोल अनमोल को उठाकर किनारे करना पड़ेगा, लेकिन यह करना आसान नहीं है क्योंकि लुटेरों ने ऐसे जाल बुन दिए हैं कि हम सब अपने अपने हिस्से के सुख दुख के लिए मरे जा रहे हैं, और इसी कारण नियतिवादी बन बैठे हैं. हम हीरोज की तलाश करने के आदी हो चुके हैं. हम दूसरों से क्रांति की उम्मीद करने के आदती बन चुके हैं.

हरिवंश जी को सलाम, एक शानदार लेख के लिए. आप भी पढ़ें. उनका मूल लेख, बिना एडिट किए हुए और एक साथ पूरा. उनका सारा मैटर जेपीजी फार्मेट में है, जिसे आप अपने डेस्कटाप पर सेव कर सकते हैं, आर्टिकल के उपर माउस ले जाकर माउस के राइट साइड को दबाएं और फिर सेव एज के आप्शन को क्लिक कर दें. ऐसा आपको चार बार करना होगा क्योंकि जेपीजी की चार फाइलें हैं, हर शीर्षक पर एक बार. और हां, इस लेख के लिंक को फेसबुक पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें, लाइक करें, कमेंट करें, डिस्ट्रीव्यूट करें ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग सच्चाई को जान बूझ समझ सकें. चाहूंगा कि यह सब पढ़कर किसी को कुछ लिखने का मन करे तो जरूर लिखें और भेजें ताकि बातचीत बढ़े, अन्य विचार सामने आएं. आप सबका आभार.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

संपर्क- yashwant@bhadas4media.com


 

 
 

 

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