मीडिया घरानों की साख को भुना रहे कॉर्पोरेट घरानों के लिए पत्रकारिता का कोई मूल्‍य नहीं

: मीडिया का गला घोंटने की साजिश : मीडिया के लिए आने वाले दिन दिक्‍कत वाले हैं। खासतौर पर न्‍यूज चैनलों के लिए। टीवी18 में एकमुश्‍त 350 से ज्‍यादा पत्रकारों, कैमरामैन और तकनीशियनों की एक ही दिन में की गई छंटाई कोई अप्रत्‍याशित घटना नहीं थी। फर्क सिर्फ इतना है कि इन सभी को एक साथ नौकरी से निकाला गया। निश्‍चित तौर पर यह कत्‍लेआम है। कत्‍लेआम इसलिए, क्‍योंकि पिछले सितंबर में 50 से ज़्यादा पत्रकार एनडीटीवी से निकाले गए, दैनिक भास्कर से 16 पत्रकारों, आउटलुक समूह की तीन पत्रिकाओं (मैरी क्लेयर, पीपुल इंडिया और जियो) के बंद होने से 42 पत्रकार झटके में बेरोज़गार हुए।

टीवी 18 ने आधिकारिक रूप से मीडियाकर्मियों को निकालने के पीछे जो दलील दी, वह बहुत लचर है। कहा गया कि 1300 कर्मचारियों में से 30 फीसदी की कटौती इसलिए की गई है, क्‍योंकि कंपनी घाटे में है और पुर्नसंरचना यानी रिस्‍ट्रक्‍चरिंग के चलते यह सब किया गया। लेकिन थोड़ा पीछे जाएं तो मालूम चलेगा कि मीडिया कंपनियों में निवेश करने वाले तीन बड़े औद्योगिक समूहों, आदित्‍य बिड़ला, रिलायंस और ओसवाल समूह ने दावा किया था कि आने वाले दिनों में मीडिया का बाजार और बुलंद होगा। जानकारी के लिए बता दें कि आदित्‍य बिड़ला समूह ने लिविंग मीडिया इंडिया के साढ़े सत्ताईस फीसदी शेयर खरीद लिए हैं। ओसवाल समूह ने 24.24 करोड़ रुपए निवेश करके एनडीटीवी के 14.2 फीसदी शेयर खरीदे हैं। इस तरह तीन बड़े कॉर्पोरेट घरानों ने मीडिया में पैसा लगाया है और इसका नतीजा बड़ी संख्‍या में मीडियाकर्मियों की छंटनी के रूप में सामने आ रहा है। लिविंग मीडिया इंडिया भी रिस्‍ट्रक्‍चरिंग की कगार पर है और माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में वहां भी 250 से ज्‍यादा मीडियाकर्मियों की छंटनी हो सकती है।

पहला सवाल : क्‍या टीवी18 की हालत वाकई पतली है ?

जवाब : इतनी नहीं कि छंटाई की नौबत आए। मुकेश अंबानी ने जब राघव बहल के नेटवर्क-18 में करीब 1700 करोड़ रुपए निवेश किया, उस समय वह लगभग 500 करोड़ रुपए के कर्ज में डूबा था। ओसवाल ग्रुप ने एनडीटीवी के शेयर उस वक्त खरीदे, जब संस्थान करीब 10 करोड़ रुपए से ज्‍यादा के नुकसान पर था। अंबानी के पैसे से बहल ने ईटीवी को खरीद लिया। लेकिन दिलचस्‍प बात यह है कि अंबानी ने पिछले दरवाजे से एक अन्‍य कंपनी (जेएम फायनेंशियल) के जरिए ईटीवी को पहले ही खरीद लिया था। बहरहाल, अंबानी के पैसे से बहल की कंपनी कर्जमुक्‍त हो जानी चाहिए थी। लेकिन बताया यह गया कि ईटीवी को खरीदने में बहल को 2100 करोड़ रुपए लगाने पड़े, यानी घाटा काटकर 900 करोड़ रुपए का बोझ ज्‍यादा पड़ा। इससे बहल पर आर्थिक बोझ इतना ज़्यादा हो गया कि उन्‍हें आईबीएन-7 और सीएनएन-आईबीएन सहित सीएनबीसी आवाज़ को चलाने में दिक़्क़त आने लगी। इस पर मुकेश अंबानी ने 1,600 करोड़ रुपए और लगाए। इस लिहाज से भी बहल को 700 करोड़ का मुनाफा होता है। टीवी 18 ने इस साल जून में 19 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया था। विज्ञापनों से कमाई भी 6 फीसदी बढ़कर 227 करोड़ पर आ गई है। एक साल के भीतर कंपनी ने दोगुना मुनाफा कमाया है। तो फिर घाटा कहां है? वैसे अंबानी ने इस चैनल में कुल 4800 करोड़ रुपए लगाए हैं। इसका कुछ हिस्‍सा नकद और कुछ संपत्‍तियों के रूप में है।

दूसरा सवाल : 10 प्‍लस 2 का हौव्‍वा

जवाब : यह भी फिज़ूल की दलील है। छंटनी के पीछे भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के उस आदेश की दुहाई दी जा रही है कि एक अक्‍टूबर से चैनल वाले एक घंटे में सिर्फ 12 मिनट ही विज्ञापनों के लिए दे सकते हैं। इसमें से भी 10 मिनट कमर्शियल्‍स के लिए और दो मिनट प्रोमो के लिए आरक्षित होंगे। इस आदेश से पहले ही हफ्ते में चैनलों को 300 करोड़ रुपए का चूना लगने की उम्‍मीद है। रिसर्च फर्म ईडलवीस सिक्‍योरिटीज के अनुसार चैनलों की 71 फीसदी कमाई विज्ञापनों से होती है। समाचार चैनल एक घंटे में 15 मिनट से ज्‍यादा का स्‍लॉट विज्ञापनों के लिए रखते हैं, जो प्राइम टाइम में बढ़कर 30 मिनट तक हो जाता है। 10 मिनट का एक स्‍लॉट 40 हजार रुपए में बिकता है। घाटे की भरपाई के लिए टीवी चैनलों के पास दो ही रास्‍ते बचे हैं। या तो वे अपने ऑपरेशनल यानी संचालन खर्चों में कटौती करें या फिर विज्ञापनों की दरें बढ़ाएं। जी टेलीफिल्‍म्‍स ने विज्ञापनों की दरें 15 फीसदी बढ़ाई हैं। फिर भी इससे फिलहाल कोई राहत नहीं मिलने वाली। मंदी के इस दौर में शायद ही किसी कंपनी को विज्ञापन की बढ़ी हुई दरें पसंद आएं। हालांकि, ट्राई ने डेढ़ साल पहले ही तकरीबन सारे चैनलों को अक्‍टूबर से दरें बढ़ाने की सूचना दे दी थी। बावजूद इसके, चैनलों ने इससे निपटने की तैयारी करने के बजाय अपने एसोसिएशन के जरिए ट्राई के आगे आदेश को दिसंबर 2014 तक स्‍थगित करने की गुहार लगाई। जब विज्ञापनों की दरें बढ़ाकर घाटे की भरपाई की जा सकती है तो फिर आदेश का हवाला देकर पत्रकारों को एकमुश्‍त बाहर का रास्‍ता दिखाना नाइंसाफी है।

फिर असल वजह क्‍या है?

असल में पिछले महीने ही टीवी18 ने एक सेंट्रल न्‍यूज रूम बनाकर डिजिटल और ब्रॉडकास्‍ट विभागों को एकजुट कर दिया था। अब इसी कड़ी में आगे हिंदी और अंग्रेजी न्‍यूज चैनल को भी एकजुट करने की कार्रवाई की जा रही है और इसके पीछे राजदीप सरदेसाई का दिमाग बताया जाता है। छंटाई के शिकार हुए एक मीडियाकर्मी का कहना है कि इंडीपेंडेंट मीडिया ट्रस्‍ट के जरिए पैसा लगाने वाले अंबानी ने चैनल के स्‍टाफ और संचालन को अंतरराष्‍ट्रीय मानकों के मुताबिक करने की जिद की है। यानी सबको एक बड़े से कमरे में बंद कर बाकी बचे लोगों को बाहर कर दो। पत्रकारिता को कभी न सुहाने वाली ऐसी बेतुकी योजनाएं कॉर्पोरेट ही बनाता रहा है और टीवी18 की छंटनी से यह साफ हो गया है कि मीडिया घरानों की साख को भुना रहे कॉर्पोरेट घरानों के लिए पत्रकारिता का कोई मूल्‍य नहीं। वे चैनल के कंटेंट पर अपनी पकड़ बनाने के मकसद को साधने के लिए बेरहमी की हद पार कर सकते हैं, क्‍योंकि उनके ऐसे कदम पर मीडियाकर्मियों या उनके संगठनों की तरफ से प्रतिरोध नाममात्र का होता है। मीडिया इंडस्‍ट्री मे ज्‍यादातर पत्रकार इस समय अनुबंध पर नियुक्‍त किए जाते हैं। इनकी ज़ुबां खामोश रखने के लिए किसी भी तरह के एसोसिएशन या लेबर यूनियन जैसी गतिविधियों में शरीक होने की मनाही है। कॉर्पोरेट घरानों का दखल बढ़ने से मीडिया कंपनियों की एचआर नीति इस कदर सख्‍त हो रही है कि अगर कोई पत्रकार नियम विरुद्ध किसी भी निर्देश की अवमानना करने की जुर्रत करे तो उसकी शुरुआती उपेक्षा लंबी अवधि में उसे छंटनी का शिकार बना देती है।

इस तरह की बेज़ा प्रक्रियाओं को मीडिया घरानों में बैठे संपादकों या संपादकीय सलाहकारों का मौन समर्थन हासिल है, क्‍योंकि कॉर्पोरेट घराने ही उन्‍हें नामित भी करते हैं। मीडियाकर्मियों की भी अपनी मजबूरी है। उन्‍हें अपने दामन में बगावती दाग से परहेज है। एक बार यह दाग लगने के बाद दूसरे मीडिया संस्‍थान में नौकरी पाने की गुंजाइश कम ही रहती है। बाकी और कोई भी ‘दाग’ हो, लिंकेजेस के सहारे किसी न किसी तरह मैनेज हो ही जाता है। अगर कोई अदालती लड़ाई लड़ता भी है तो बात कोर्ट के बाहर समझौते पर आकर खत्‍म हो जाती है। हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं की न्‍यूज रिपोर्टिंग और पैकेजिंग एक ही छत के नीचे कराने का प्रयोग प्रिंट में सबसे पहले नवभारत टाइम्‍स ने शुरू किया था, जो जल्‍दी ही धराशायी हो गया। अब अंबानी ने इलेक्‍ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया में इसे अपनाने की ज़िद छेड़ी है। जाहिर है यह टवी चैनलों में पहले से ही कमजोर कंटेंट की क्‍वालिटी को और कमजोर करेगा। लेकिन, विडंबना यह है कि न तो कॉर्पोरेट घरानों को और न ही उनके नुमाइंदे बनकर रह गए संपादकों को अब कंटेंट से ज्‍यादा लेना-देना रह गया है। इसने विश्‍वसनीयता का सवाल भी खड़ा किया है। वास्‍तव में मीडिया घरानों में यह चिंतन अभी से शुरू हो जाना चाहिए कि दिसंबर 2014 तक जब देशभर में डिजिटाइजेशन का काम पूरा हो जाएगा और इस बात की कमान दर्शक के हाथ में होगी कि वह कौन सा चैनल देखे और कौन सा नहीं, तब कमजोर कंटेंट वाले चैनल कहां जाएंगे ?

अफसोस कि इस अहम सवालों का हल निकालने के बजाय अधिकतर बड़े मीडिया घराने अपनी ऊर्जा कॉर्पोरेट घरानों को अपनी पूंजी बेचने में खर्च कर रहे हैं। ऐसा करके वे अपनी बची-खुची विश्‍वसनीयता भी उन कंपनियों के हवाले कर रहे हैं, जो पहले ही घोटालों में लिप्‍त हैं। दरअसल यह अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता को रसूखदारों के हाथों में गिरवी रखने जैसा कदम है। इससे आने वाले वर्षों में मीडिया की विश्‍वसनीयता और गिरेगी। देश के सामने मौजूद मुद्दों की विवेचना और उन्‍हें बहस के दायरे में लाने का मकसद और पीछे चला जाएगा। और मीडिया के साथ ही मीडियाकर्मियों का कत्‍लेआम भी होता रहेगा। टीवी 18 में जो हुआ, वह सिर्फ मीडियाकर्मियों का ही नहीं, मीडिया का भी गला घोंटने की साजिश है। इसके पीछे कॉर्पोरेट घरानों के साथ कहीं न कहीं सरकार का भी हाथ है, जो जानबूझकर क्रॉस मीडिया ओनरशिप को नियंत्रित करने में ढिलाई बरत रहा है।

सौमित्र राय का विश्लेषण.


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