मीडिया ने महिलाओं के सम्‍मान में अहम योगदान दिया है

गुवाहाटी में एक लड़की के साथ जो हुआ वह बहुत बुरा हुआ। आज सारी दुनिया को मालूम है कि किस तरह से अपने पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को अपमानित किया जाता है।  टेलीविज़न और अखबारों में खबर के आ जाने के बाद ऐसा माहौल बना कि गुवाहाटी की घटना के बारे में सबको मालूम हो गया। लेकिन यह भी सच्चाई है कि इस तरह की घटनाएं देश के हर कोने में होती रहती हैं। ज्‍यादातर मामलों में किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। चर्चा तब होती है जब यह घटनाएं मीडिया में चर्चा का विषय बन जाती हैं।

गुवाहाटी की घटना के साथ बिलकुल यही हुआ। देश के लगभग सभी महत्वपूर्ण टेलीविज़न समाचार चैनलों ने इस खबर को न केवल चलाया बल्कि कुछ प्रभावशाली चैनलों ने तो इस विषय पर घंटों की चर्चा का कार्यक्रम भी प्रसारित किया। नतीजा सामने है। अब सबको मालूम है कि किस तरह से एक समाज के रूप में हम असंवेदनशील हैं। घटना की जांच करने गयी महिला आयोग की एक प्रतिनिधि और कभी दिल्ली विश्वविद्यालय की नेता रही महिला ने तो वहां जाकर अपनी छवि मांजने की कोशिश की। इस चक्कर में पीड़ित लड़की का नाम भी उन्होंने  सार्वजनिक कर दिया। ऐसा नहीं करना चाहिए था। महिलाओं के प्रति एक समाज के रूप में हमारा दृष्टिकोण आज पब्लिक डोमेन में है और इसके लिए सबसे ज्‍यादा सम्मान का पात्र मीडिया ही है।

आज मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी पूरी तरह से निभा भी रहा है। उसकी वजह से ही देश में महिलाओं के साथ होने वाले व्यवहार को जनता के सामने लाया जा रहा है और सरकार में भी किसी स्तर पर ज़िम्मेदारी का भाव जग रहा है। लेकिन एक बात स्वीकार करने में मीडिया कर्मी के रूप में हमें संकोच नहीं होना चाहिए। अक्सर देखा जा रहा है कि जब एक बात किसी मीडिया कंपनी या किसी मेहनती पत्रकार की कोशिश से खबरों की दुनिया में आ जाती है तो बहुत सारे पत्रकार उसी खबर को आधार बनाकर खबरें लिखना शुरू कर देते हैं। पत्रकारिता का पहला सिद्धांत है कि जब भी कोई खबर किसी भी रिपोर्टर की जानकारी में आती है तो वह उस व्यक्ति का पक्ष ज़रूर लेगा जिसके बारे में खबर है। कई बार ऐसा होता है कि जिस व्यक्ति के बारे में खबर है उस तक पंहुचना ही बहुत मुश्किल होता है। उस हालत में उस व्यक्ति से सम्बंधित जो लोग या जो भी संगठन हों उनसे जानकारी ली जा सकती है। लेकिन इस काम में एक दिक्कत है। अगर वह व्यक्ति प्रभावशाली हुआ और खबर उसके खिलाफ जा रही हो तो वह खबर को रोकने की कोशिश करवा सकता है।

ज़ाहिर है कि उस से बात करने पर खबर दब सकती है। इस हालत में रिपोर्टर के पास इतने सबूत होने चाहिए कि वह ज़रुरत पड़ने पर अपनी खबर की सत्यता को साबित कर सके। उसके पास कोई दस्तावेज़ होना चाहिए, कोई टेप या कोई वीडियो भी बतौर सबूत हो तो काफी है। लेकिन अगर किसी के बयान के आधार पर कोई खबर लिखी जा रही है तो उसके बयान की लिखित प्रति, उसका टेप किया बयान या कुछ अन्य लोगों की मौजूदगी में दिया गया उसका बयान होना ज़रूरी है। अगर ऐसा न किया गया तो पत्रकारिता के पेशे का अपमान होता है और आने वाले समय में पत्रकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठ खड़े होते हैं। पत्रकार को किसी भी हालत में सुनी सुनायी बातों को आधार बनाकर खबर नहीं लिखना चाहिए। दुर्भाग्य की बात यह है कि गुवाहाटी की घटना के बारे में इस तरह की पत्रकारिता हो गयी है।

अभी एक दिन पहले एक बड़े अखबार में खबर छपी कि राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा ने लड़कियों को सलाह दी है कि वे अगर छेड़खानी जैसे अपराधों से बचना चाहती हैं तो उन्हें ठीक से कपड़े पहनना चाहिए। बात बहुत ही अजीब थी। मैंने तय किया कि इन देवी जी के इस बयान के आधार पर ही इस बार अपने इस कालम में महिलाओं की दुर्दशा की चर्चा की जायेगी। बड़े अखबार की खबर के हवाले से जब उनसे बात करने की कोशिश की गयी तो वे गुवाहाटी में थीं लेकिन थोड़ी कोशिश के बाद उनसे संपर्क हो गया। जब उनसे बताया कि आप के ठीक से कपडे़ पहनने वाले बयान के बारे में बात करना है तो उन्होंने जो कहा वह बिलकुल उल्टी बात थी। उन्होंने कहा कि कभी भी उन्होंने वह बयान नहीं दिया है जो एक अंग्रेज़ी अखबार में छपा है। उन्होंने सूचित किया कि वे दिल्ली के अपने दफ्तर को हिदायत दे चुकी हैं कि वे बयान जारी करके यह कहें कि राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने सम्बंधित अखबार या उसके रिपोर्टर से कोई बात नहीं की है और बयान पूरी तरह से फर्जी है।

उनके इस बयान के बाद भारत सरकार की एक बड़ी अधिकारी को कटघरे में लेने की अपनी इच्छा पर पानी पड़ गया लेकिन यह सुकून ज़रूर हुआ कि एक गलत खबर को आधार बनाकर अपनी बात कहने से बच गए। लेकिन आज सुबह के अखबारों को देखने से अपने पत्रकारिता पेशे में लगे हुए लोगों की कार्यप्रणाली से निराशा जरूर हुई। राष्ट्रीय महिला आयोग के दफ्तर ने शायद बयान जारी किया होगा क्योंकि उस बड़े अखबार में आज उस खबर का फालो अप नहीं है। लेकिन आज एक अन्य बड़े अखबार में उस खबर का फालोअप छपा है। जिसमें महिला आयोग की अध्यक्ष की लानत मलानत की गयी है। दिल्ली में रहने वाली कुछ महिला नेताओं से बातचीत की गयी है और उनके बयान में महिला आयोग की कारस्तानी की निंदा की गयी है। जिन महिला नेताओं के बयान छपे हैं उनमें से कोई भी महिला आयोग की अध्यक्ष या उस से भी बड़े पद पर विराजने लायक हैं। इसलिए उनकी बात समझ में आती है। उन्हें चाहिए कि वे राष्ट्रीय महिला आयोग की मौजूदा अध्यक्ष को बिल्‍कुल बेकार की अधिकारी साबित करती रहें जिससे जब अगली बार उस पद पर नियुक्ति की बात आये तो अन्य लोगों के साथ इनका नाम भी आये। लेकिन क्या हमको भी यह शोभा देता है कि एक गलत खबर का फालो अप चलायें। पत्रकारिता की नैतिकता के पहले अध्याय में ही लिखा है कि खबर ऐसी हो जिसकी सत्यता की पूरी तरह से जांच की जा सके और जब सम्बंधित व्यक्ति या उसका दफ्तर ऐलानियाँ बयान दे रहा है कि वह बयान उनका नहीं है तो उस बयान के आधार पर खबरों का पूरा  ताम झाम बनाना अनैतिक है। बहरहाल नतीजा यह हुआ कि यह कालम जो राष्ट्रीय माहिला आयोग की अध्यक्ष के खिलाफ एक सख्त टिप्पणी के रूप में सोचा गया था, औंधे मुंह गिर पड़ा। अब उनके खिलाफ कभी फिर टिप्पणी लिखी जायेगी लेकिन आज तो अपने पेशे की ज़िम्मेदारी पर ही कुछ बात करना ठीक रहेगा।

गुवाहाटी की खबर के हवाले से मीडिया की भूमिका पर बात करना बहुत ही ज़रूरी है। धीरे धीरे खबर आ रही है कि उस घटना के लिए जो अपराधी छेड़खानी कर रहे थे, उनको सेट करने का काम एक टीवी पत्रकार ने ही किया था। उस टीवी चैनल के मुख्य संपादक के खिलाफ कार्रवाई भी हो चुकी है। ज़ाहिर है कि फर्जी तरीके से खबर बनाने के लिए उस टीवी चैनल ने इस तरह का आयोजन किया। इस प्रवृत्ति की निंदा की जानी चाहिए लेकिन उस टीवी चैनल की मिलीभगत साबित हो जाने के बाद गुवाहाटी की घटना की गंभीरता कम नहीं हो जाती। बल्कि यह ज़रूरी हो जाता है कि छेड़खानी कर रहे अपराधियों के साथ साथ उन पत्रकारों के खिलाफ भी आपराधिक कार्रवाई की जाए जिन्होंने इस तरह का आयोजन करके एक लड़की की अस्मिता की धज्जियां उड़ाईं। इस बात की पूरी संभावना है कि सत्ताधारी पार्टी गुवाहाटी के उस गैरजिम्मेदार पत्रकार के हवाले से सभी खबरों की सत्यता को सवालों के घेरे में लेने की कोशिश करेंगे। लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। महिलाओं सहित अपने सभी नागरिकों के सम्मान की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है और सरकार को उसे करते ही रहना चाहिए। देखा यह गया है कि सरकार में बैठे लोग खबर की सच्चाई पर सवाल उठाने का मामूली सा मौक़ा हाथ आते ही खबर के विषय को भूल जाते हैं। सत्ताधारी पार्टी के नेता बयानों की झड़ी लगा देते हैं और मुद्दा कहीं दफ़न हो जाता है। मीडिया को कोशिश करना चाहिए कि गुवाहाटी की घटना के साथ महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के बारे में जो राष्ट्रीय बहस चल पड़ी है, उसे उसके अंजाम तक पहुंचाएं।

गुवाहाटी की घटना के साथ ही उत्तर प्रदेश के बागपत की बातें भी हो रही हैं। वहां के पुरुषों ने एक पंचायत करके अपने घरों की महिलाओं को सलाह दिया है कि वे दिन ढले घरों से बाहर न निकलें, सेल फोन का इस्तेमाल न करें और प्रेम विवाह न करें। यानी उस पंचायत ने अब तक हुए विकास को उल्टी दिशा में दौडाने की कोशिश है। जहां की यह घटना है वह देश की राजधानी से लगा हुआ इलाका है। दिल्ली के इतने करीब हो कर भी महिलाओं के प्रति इतना आदिम रवैया बहुत ही अजीब है। उस से भी अजीब है कि कई पार्टियों के राजनीतिक नेता महिलाओं के खिलाफ इस तरह का रुख रखने वालों के साथ खड़े पाए जा रहे हैं। ज़ाहिर है एक समाज के रूप में हम कहीं फेल हो रहे हैं। बागपत वाले मामले में मीडिया का रुख शानदार है और हर वह नेता तो मध्यकालीन सामंती सोच के प्रभाव में आकर बयान दे रहा है उसकी पोल लगातार खुल रही है। आज से करीब 35 साल पहले भी इसी बागपत में माया त्यागी नाम की एक महिला के साथ पुरुष प्रधान मर्दवादी सोच वालों ने अत्याचार किया था। उस वक्त भी मीडिया के चलते ही वह मामला पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना था। इतने वर्षों बाद भी आज बागपत और दिल्ली के आसपास के अन्य इलाकों में महिलाओं के प्रति जो रवैया है वह क्यों नहीं बदल रहा है, यह चिंता की बात है और इसकी भी पड़ताल की जानी चाहिए। लगता है कि राजनीतिक पार्टियों के नेता तो इस बात पर तब तक ध्यान नहीं देंगे जब तक कि उनकी असफलताओं को मीडिया के ज़रिये सार्वजनिक न किया जाए। पिछले कई वर्षों में यही हुआ है। जब 14 फरवरी के आसपास लड़कियों की अस्मिता पर बंगलोर में हमला हुआ था, उस वक्त भी मीडिया के हस्तक्षेप से ही अपराधी पकड़े गए थे। इसलिए साफ़ लगने लगा है कि इस देश में महिलाओं के सम्मान की रक्षा के काम में सबसे अहम भूमिका मीडिया की ही रहेगी।   

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा स्‍तम्‍भकार हैं. वे एनडीटीवी, जागरण, जनसंदेश टाइम्‍स समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों दैनिक देश बंधु को वरिष्‍ठ पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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