मीडिया पर नियंत्रण चाहती है बिहार सरकार

बिहार में छह वर्षों से सुशासन के नाम पर सत्ता चला रही एनडीए पर इन दिनों मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर दबाव बन गया है। काटजू के बयान पर विधानसभा के दोनों सदनों में विपक्ष ने न सिर्फ जमकर हंगामा किया बल्कि बहिष्कार भी किया। सत्ता पक्ष को यह समझ नहीं आ रहा कि इस सवाल का जवाब कैसे दे? इसमें कोई दो राय नहीं कि राज्य में मीडिया अगर सत्ता पक्ष के अघोषित कर्फ्यू में भले न हो मगर बड़े घराने सत्ता का चरण वंदन करने में जी जान से लगे हैं।

लगे भी क्यों न, हर वर्ष करोड़ों का विज्ञापन जो लेना है। विज्ञापन लेने की होड़ में इन मीडिया घरानों ने आमजन के हित को त्याग दिया है। मंत्रियों व कुछ छुटभैये अधिकारियों के खिलाफ खबरें तो छाप दी जाती हैं, मगर जब बात मुख्यमंत्री और सरकार के आला हुक्‍मरानों की आती है तो खबरनवीसों के तेवर बदल जाते हैं। पिछले वर्ष फारबिसगंज में हुई पुलिस फायरिंग इसका जीवंत उदाहरण है। उस घटना ने भले ही राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हो मगर राज्य में उसकी रिर्पोटिंग किस तरह से हुई सब जानते हैं। आज भी कोई बड़ा मीडिया समूह इसकी चर्चा नहीं करता। घटना के समय सरकार ने बयान दिया था कि 6 महीने के अंदर मामले की न्यायिक जांच करा कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कारवाई होगी। मगर क्या कारवाई की गई है, सब जानते हैं।

शराब घोटाले पर एक अखबार (दैनिक जागरण) का विज्ञापन दस दिनों तक बंद कर दिया गया था। यह अलग बात है कि उक्त घोटाले की चर्चा करने वाले पत्रकार ने भी खबर जदयू के एक बड़े नेता के इशारे पर ही छापी थी। खबर छापने के पीछे मंशा कोई भी हो मगर इतना सत्य है कि उसके बाद सरकार ने अखबार का विज्ञापन रोक कर यह स्पष्ट कर दिया कि सरकार विरोधी खबरों को प्राथमिकता दी तो खैर नहीं। उसके बाद अखबार के तेवर को सब देख सकते हैं। बड़े अखबारों को सरकार का वंदन करने को मजबूर करने के लिए ही 2007-08 में विज्ञापन नीति तक को संशोधित किया गया ताकि विज्ञापन का पूरा लाभ सिर्फ बड़े मीडिया घरानों को दिया जाए।

राज्य में इस समय सैकड़ों छोटे-बड़े समाचार घराने हैं। पूर्ववर्ती सरकार द्वारा भारत सरकार की मीडिया नीति के अनुरूप सभी को विज्ञापन दिया जाता था। पूर्ववर्ती सरकार भी विज्ञापन से उपकृत करने में कुछ घरानों को प्राथमिकता जरूर देती थी, मगर अन्य की अनदेखी नहीं की जाती थी। वर्तमान सरकार ने तो नियमावली में संशोधन कर ऐसे नियम बना डाले जिससे छोटे एवं मध्यम श्रेणी के पत्र-पत्रिकाओं को विज्ञापन न मिले ताकि वे जीवित न रह पाएं। दरअसल ये छोटे पत्र-पत्रिकाएं ही सरकार विरोधी खबरों को प्राथमिकता देती हैं। इसी कारण इन पर अंकुश लगाने का ऐसा तरीका निकाला गया ताकि ‘न रहे बांस और न बजे बांसुरी।’ अब आप ही बताएं कि है न राज्य में सुशासन और मीडिया स्वतंत्र?

कल सुशील कुमार मोदी ने काटजू की मंशा पर सवाल जरूर खड़ा कर दिया मगर वे अपने सरकार द्वारा बनाई गई भेदभाव पूर्ण विज्ञापन नीति 2008 को पढ़ना भूल गए हैं। इतिहास गवाह है कि हमारे देश की आजादी से लेकर तमाम छोटे-बड़े आंदोलनों को लघु एवं मध्यम श्रेणी के पत्र-पत्रिकाओं ने ही हवा दी है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय बड़े मीडिया घरानों की भूमिका जग जाहिर है। महात्मा गांधी से लेकर बाल गंगाधर तिलक तक छोटे-छोटे अखबार निकाल कर अंग्रेजों का विरोध करते थे। मगर राज्य सरकार नहीं चाहती कि राज्य में छोटे व मंझोले अखबार फलें-फूलें। राज्य सरकार जानती है कि अगर इन छोटे व मध्यम श्रेणी के भाषाई व क्षेत्रीय अखबारों को फलने-फूलने का मौका दे दिया तो फिर सरकार विरोधी खबरों पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो जाएगा।

बड़े घरानों की पांच-सात अखबारें ही राज्य में स्थित हैं जबकि छोटे-बड़े अखबारों की संख्या सैकड़ों है। ऐसे में आप समझ सकते हैं कि पांच-सात को विज्ञापन का लोभ दिखा वश में करना आसान है न कि सैकड़ों को। काटजू साहब एवं मीडिया की स्वतंत्रता के पक्षधरों को बिहार सरकार की विज्ञापन नीति जरूर पढ़ कर उस पर टिप्पणी करनी चाहिए। विज्ञापन नीति से साफ हो जाएगा कि राज्य में मीडिया पर कैसे शासन कर रही है सरकार। (http://prdbihar.gov.in/images/stories/policy/advertisement_policy_2007_en.pdf) सरकार की इस नीति से क्या उसका तानाशाही रवैया साफ नहीं होता? क्या भेदभाव पूर्ण शासन व्यवस्था को सुशासन कहेंगे? क्या सरकार ईमानदारी से इन सवालों का जवाब देगी?

लेखक राजीव रंजन चौबे वरिष्‍ठ पत्रकार तथा पटना से प्रकाशित सांध्‍य दैनिक सांध्‍य प्रवक्‍ता खबर के संपादक हैं. आईआईएमसी पास आउट राजीव से संपर्क उनके ईमेल editor@sandhyapravakta.com के जरिए किया जा सकता है. 

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