मीडिया प्रत्यक्ष तौर पर अराजकता मानसिकता के हिरोईज्म का प्रोमोट करता है

: उत्‍तराखंड आपदा : तसवीर का दूसरा एवं ‘सही पहलू’ यह है कि यह हेलीकॉप्टर आपदा का जायजा लेने आया था और पहले उतर नहीं पा रहा था. चारों ओर मलबा फैला था. पहले यह देखना था कि हेलीकॉप्टर सुरक्षित उतारे जा सकते हैं या नहीं. रिस्क लेकर पायलट ने उतारा और एक टीम इलाके की स्थिति का जायजा लेकर तुरंत वापस गयी.

एक-दो पीड़ितों को बैठा सकते थे, पर संभव नहीं था. सैकड़ों पीड़ितों में आपस में ही मारामारी हो जाती. संभवत: इस आपाधापी में हेलीकॉप्टर वापस जा ही नहीं पाता और मलबे में ही फंस जाता. यही हेलीकॉप्टर वापस जाकर अधिकारियों को ‘ग्राउंड जीरो’ की स्थिति बताता है और फिर 22 हेलीकॉप्टर पीड़ितों के लिए भेजे जाते हैं. मीडिया के लिए हमेशा ही सत्य अपनी समग्रता में खबर नहीं बन पाता. उसे वही खबर रास आती है, जिसमें उसे लाभ दिखता है.

पीड़ित अगर भावुक होता है, तो यह स्वाभाविक है. मगर, मीडियावाले इसी भावनात्मकता के ‘विविध व एकपक्षीय’ रंग को दिखाने में लाभ देखते हैं. स्पष्ट नीति है, जितना ही प्रशासन व नेताओं को नकारा साबित करेंगे, जितना उनको गालियां देंगे, उतना ही आम आदमी खुश होता है. जब पीड़ा हो, गुस्सा स्वाभाविक तौर पर आता है और इस गुस्से का लाभ अगर न कमाया जाये, तो मीडिया को लगता है जैसे उनका कोई औचित्य ही नहीं रह जाता.

कई सवाल हैं, जिन्हें पूछने की जरूरत नहीं, अब उन पर जांच के बाद सख्त कार्रवाई की जरूरत है. एक महिला रिपोर्टर, ऋषिकेश से सटे हाइ-वे पर खड़ी होकर बेबाकी से कह रही हैं कि वे केदारनाथ के रास्ते में हैं. एक रिपोर्टर 200 किमी यात्रा मार्ग के उस हिस्से में फंसे व्यक्ति से बाइट लेता है कि प्रशासन कुछ भी मुहैया नहीं करा रही, जहां आपदा का बेहद कम असर है.

वहां लोग सिर्फ मार्ग बंद होने के कारण रुके हुए हैं. पूरा प्रशासन जब केदारनाथ व आसपास के बेहद गंभीर स्थितिवाले इलाकों में जुटा है, स्वाभाविक है सारा ध्यान वहां है. पूरे आपदा रिपोर्टिग में शुरुआती तीन-चार दिनों तक, लगभग सारे मीडियावालों ने सिर्फ यात्रा मार्ग के निचले व कम आपदावाले क्षेत्रों में फंसे लोगों से बात करके अपनी रिपोर्टिग की.

पत्रकारिता का मूल सिद्धांत ताक पर रखा गया, जो कहता है कि पहले ‘आधिकारिक’ बयान को प्राथमिकता दी जाये, फिर रिपोर्ट को पूर्णता देने के लिए प्रत्यक्षदर्शियों की बात भी ली जाये. यहां किसी ने अधिकारियों से बात नहीं की. ऐसे ‘अप्रत्यक्ष’ प्रत्यक्षदर्शियों से बातचीत को न सिर्फ अपनी रिपोर्ट का आधार बनाया, बल्कि उसकी बिना पर बड़े और निष्कर्षकारी निजी बयान भी दे दिये, जिन्हें अफवाह की श्रेणी में रखा जा सकता है. इस आपदा में ही नहीं, पहले भी मीडिया ने गंभीर मौकों पर भी ऐसा ही तमाशा और अराजक सनसनी पेश किया है.

और किसी भी सूरत में अपने दोष को न मानने की अपनी जिद नहीं छोड़ी है. आज वक्त है, जब प्रेस काउंसिल या शीर्ष न्यायपालिका इस पर आधिकारिक पहल करे और इस आपदा में मीडिया की भूमिका के सभी पहलुओं की समग्रता से जांच कराये. सुप्रीम कोर्ट जब सरकारों को इस आपदा में उनकी भूमिका पर नोटिस जारी कर सकता है, तो मीडिया को क्यों नहीं? प्रेस काउंसिल को भी आगे आने की जरूरत है. मीडिया प्रजातंत्र का चौथा खंभा है. अगर कार्यपालिका को न्यायपालिका संवैधानिक जवाबदेही न निभाने के लिए कठघरे में खड़ा कर सकती है, तो मीडिया क्या संविधान, प्रजातंत्र और देश से भी बड़ा है?

एक आम व्यक्ति, भावनाओं में बह कर फेसबुक या ट्विटर पर कोई टिप्पणी कर देता है या कोई स्केच पोस्ट कर देता है, तो उस पर देशद्रोह तक का इल्जाम लगाने में मिनट की देरी नहीं होती. मगर, इस पूरी आपदा में व अन्य संवेदनशील मामलों में भी, मीडिया, तथाकथित ‘सूत्रों’ एवं प्रत्क्षदर्शियों के हवाले से गलत और पूरे तंत्र के खिलाफ अफवाहें फैलाता है, तब उसे न सिर्फ कोई कुछ नहीं कहता, बल्कि मीडिया को ढेरों वाहवाही मिलती है. क्यों? आज भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में सरकारों, नेताओं और शासन तंत्र के खिलाफ आम लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है. दोष सिर्फ तंत्र का नहीं है. दुनिया मानती है, भारत में अब चुनाव निष्पक्ष एवं साफ-सुथरे होते हैं.

फिर भी, अगर सैकड़ों दागी या अनैतिक लोग चुने जा रहे हैं, तो क्या दोष आम जनता का नहीं है? आइआइटी के कुछ लोग चुनाव लड़ते हैं और हार जाते हैं. सड़क पर जब पुलिस बिना हेलमेट पहने दुपहिया चालकों को पकड़ती है या शराब पीकर वाहन चलानेवालों का ‘ब्रेथ ऐनेलाइजर टेस्ट’ करती है, तो हजारों लोग पुलिस को गालियां देते हैं. मीडिया प्रत्यक्ष तौर पर अराजकता मानसिकता के हिरोईज्म का प्रोमोट करता है. दिल्ली में आम लोग सड़क पर उतर जाते हैं और प्रदर्शन के नाम पर अराजकता की पराकाष्ठा करते हैं और मीडिया उनको ‘हीरो’ बनाता है.

एक 16-17 साल की लड़की सुरक्षा घेरा तोड़ कर प्रधानमंत्री आवास के सामने मनमोहन सिंह को अपशब्द कहते हुए चिल्लाती है और पुलिस के साथ उलझती है. मीडिया का कैमरा सब दिखाता है और स्टूडियो में एंकर कहता है, ‘आप देख रहे हैं व्यवस्था की नाकामी पर आम आदमी का दर्द और गुस्सा!’ अब अगर पुलिस ऐसे लोगों पर गंभीर कार्रवाई करती है, तो पूरा तंत्र मीडिया की नजर में तानाशाह हो जाता है. मगर, कोई मीडिया प्रदर्शनकारियों से अपील नहीं करता कि विरोध प्रकट करने के लिए अराजकता की जरूरत नहीं होती. कानून कोई भी तोड़े, वह अपराधी ही होता है, आंदोलनकारी नहीं.

जिस तरह टीवी पर एंकर अपने शो में नेताओं, अधिकारियों और तंत्र के प्रतिनिधियों का मजाक उड़ाते हैं और उनका अपमान करते हैं, वह बेहद खतरनाक है. एक चैनल ने एक केंद्रीय मंत्री से 15 सेकेंड में आपदा राहत पर सरकार की स्थिति स्पष्ट करने को कहा. मंत्री जी जब तक संभल पाते और कह पाते, समय समाप्त हो गया और एंकर ने दर्शकों की ओर मुखातिब होकर निष्कर्ष दे डाला, ‘आपने देखा, सरकार कितनी बेबस है, उसके पास कहने को कुछ नहीं है.

साफ है, आम आदमी के दर्द की सुध लेनेवाला कोई नहीं.’ मंत्री जी को पता भी नहीं था कि उनका बयान अब टीवी पर नहीं आ रहा और वे बोलते रहे. सुनना किसे था! सुन कर भी कौन मानता! मीडिया को स्वयं को नियंत्रित करने का अवसर दिया जा चुका है. खासकर विजुअल मीडिया को. वे लगातार और भी अराजक हुए जा रहे हैं. राजनीति और सरकारों के हाथ बंधे हैं. उन्हें मीडिया की बेहद जरूरत होती है, इसलिए वे उनसे पंगा नहीं ले सकते. एक ही रास्ता बचा है, वह है सुप्रीम कोर्ट.

न्यायपालिका अगर पहल करे, तो देश में अराजकता की मानसिकता फैलानेवाले इस तरह की मीडिया की भूमिका की समग्रता से जांच हो सकती है और जरूरी कानून बना कर मीडिया को रेगुलेट किया जा सकता है. खुद मीडिया के अंदर ही कई बेहद गंभीर और जानकार लोग हैं, जिन्हें पता है कि भारतीय मीडिया के किन पहलुओं की समीक्षा होनी चाहिए और कैसे गुणात्मक ‘रेगुलेशन-रेजीम’ बनाया जा सकता है. यह बात मान लेनी होगी कि नीयत में शायद उतनी खोट नहीं. खराबी है पूरे मीडिया वर्किग कल्चर में, रिक्रूटमेंट, ट्रेनिंग में और मैनेजमेंट सिस्टम में.

प्रभात खबर में प्रकाशित संतोष झा की रिपोर्ट.

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