मार्केटिंग और पीआर से जुड़ी एक कंपनी अपनी दलाली की दुकान चमकाने के लिए 'मीडिया महारथी' का तमगा कुछ संपादकों को देने जा रही है. बाजार के इस दौर में जब हर चीज बाजारू और बिकाऊ हो गई हो तो भला संपादक नामक पद व प्राणी ही कैसे न बिके. सो, इन संपादकों को बेचने की तरह तरह की प्लानिंग होने लगी है. इन संपादकों से सरोकार और पत्रकारिता की कोई बात नहीं करता बल्कि इनसे अब मार्केटिंग और रेवेन्यू की बात की जाने लगी है.
दिल्ली की एक कंपनी जो मार्केटिंग की कुछ मैग्जीन व वेबसाइटें संचालित करती है, इन दिनों भारत के पचास मीडिया महारथियों की खोज करने में जुटी है. इसके लिए जो ज्यूरी बनाई गई है उसमें कुछ वरिष्ठ पत्रकार भी हैं. लोग आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं कि मार्केटिंग व दलाली के इस गोरखधंधे में आखिर वरिष्ठ पत्रकार लोग कैसे शामिल हो रहे हैं!
क्या विडंबना है कि एक तरफ जहां पाकिस्तान में भ्रष्ट पत्रकारों के नामों की घोषणा हो रही है ताकि पत्रकारिता की काली भेड़ों को अलग-थलग किया जा सके तो यहां भारत में मीडिया महारथी की घोषणा कर भ्रष्ट व दलाल पत्रकारों को ग्लैमराइज करने का प्रयास किया जा रहा है. आज के दौर में न्यूज चैनलों और अखबार घरानों की जो हालत है, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि कुछ एक को छोड़ दें तो दरअसल कोई मीडिया महारथी होने लायक है ही नहीं. सब अपनी नौकरी चला रहे हैं, पेट पाल रहे हैं और मालिक के हिसाब से जी खा बोल रहे हैं.
मालिक के आगे जी हुजूरी करने वाले और मालिक के हिसाब से चलने वाले संपादकों को मीडिया महारथी तो कतई नहीं कहा जा सकता. लेकिन बाजार जो न करा दे. पत्रकार और संपादक उसी तरह का ग्लैमरस पद है जैसे आईएएस और पीसीएस. फर्क बस इतना है कि आईएएस – पीसीएस का पद सरकारी व स्थायी है, संपादक व पत्रकार का पद गैर-सरकारी और अस्थायी. जाने कब किस संपादक की कब नौकरी चली जाए. दलाली चमकाने में जुटी पीआर कंपनी द्वारा घोषित 50 मीडिया महारथियों की असली हकीकत भड़ास प्रकाशित करेगा. फिलहाल आप भी इंतजार करें पीआर कंपनी द्वारा पचास मीडिया महारथियों के नाम की घोषणा का. भड़ास इन पचासों के नाम सार्वजनिक होने के बाद आपको बताएगा कि ये जनाब मीडिया महारथी की बजाय राडिया रथी घोषित करने के लायक हैं.
यशवंत सिंह
एडिटर
भड़ास4मीडिया






