मीडिया में आरक्षण की जरूरत

एक दशक से भी अधिक समय पूर्व चन्द्रभान प्रसाद व अन्य दलित थिंक टैंक भारतीय प्रेस परिषद में ज्ञापन देने गये थे और मां की थी कि मीडिया में भी आरक्षण व्यवस्था को लागू किया जाये। ज्ञापन देने वालों को शिकायत थी कि मीडिया में सवर्णों के एक छत्र राज से उसमें वस्तुपरक दृष्टिकोण का विकास नहीं हो पा रहा जो इस विधा की साख के लिये बुनियादी जरूरत है। इस मुहिम को कई प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने भी समर्थन प्रदान किया था। इसके कारण मीडिया में शूद्रों का छिटपुट प्रवेश कराया गया। दलितों व पिछड़ों की समस्याओं पर भेजे जाने वाले लेखन का प्रकाशन भी सेफ्टी वाल्व के तौर पर शुरू हुआ लेकिन संपूर्णता में इसके बावजूद मीडिया के वर्ग दृष्टिकोण में कोई बदलाव नहीं आया है।

मीडिया में वर्ण व्यवस्था के चश्मे के तहत विचारों और घटनाओं का प्रस्तुतीकरण किया जाता है और इस प्रक्रिया में लोकतंत्र के प्रति निर्मल, निश्छल निष्ठा को कोई स्थान नहीं है। वर्ण व्यवस्था की इमारत भेदभाव पर आधारित अन्याय की नींव पर खड़ी है। अन्याय सबसे बड़ी अनैतिकता है जिसकी वजह से वर्ण व्यवस्था के सभी उत्पाद नैतिक रूप से प्रदूषित और जहरीले हैं। मीडिया भी वर्ण व्यवस्था की गिरफ्त में होने से समाज वैचारिक जहर फैलाने का काम कर रही है। हैरत होती है कि जो लोग अपने अखबार में राजनीति में बढ़ते जातिगत दृष्टिकोण पर बड़े-बड़े अग्रलेख छापते हैं वहीं ऐसी खबरों को प्रोत्साहित करते हैं जिनसे अपराधी को जातिगत सहानुभूति का लाभ लेने का आधार मिले और कानून व्यवस्था लागू करने वाली एजेन्सियां दबाव में आ जायें।

नोट करने वाली बात यह है कि अपराधी से नेता बने लोगों पर जब भी कार्रवाई हुई है तो उसके सजातीय आधार पर समर्थन में ब्राह्म्ण महासभा या क्षत्रिय महासभा की खबरें सबसे ज्यादा छपी हैं जबकि यह जातियां अपने आपको संस्कारित कहती हैं। देश भर में कुछ ही जातियां हैं जिनका उम्मीदवार भारत के किसी भी क्षेत्र के किसी भी पार्टी से छूट जाये तो यह खबरें छपने लगेंगी कि उस जाति के लोग अब अमुक पार्टी को वोट नहीं देंगे। क्या अखबार ऐसी खबरें छापने के लिये बाध्य हैं।

अखबार अनजाने में अपनी करतूत से यह साबित करते हैं कि अमुक जाति के लोग पार्टी या विचारधारा के आधार पर नहीं जातिवाद के आधार पर वोट करते हैं। अगर उस जाति में यह सोच न भी हो तो इस तरह की खबरें इस सोच को पैदा करेंगी और बढ़ायेंगी फिर भी मीडिया को अपने इस काम पर आज तक अफसोस नहीं हुआ। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, उसे लोकतंत्र में विशिष्ट स्थान व सम्मान मिला है तो उसे लोकतंत्र का वफादार होना चाहिये। लोकतं की सबसे बड़ी सेवा है जनचेतना का निर्माण करना लेकिन उक्त सूचनाओं के ताबड़तोड़ प्रहार से लोगों को जातिगत चेतना से उबरने और जन होकर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के बारे में सोचने का अवसर क्या मिल सकता है।

मीडिया के कारपोरेट होने के बाद भी इसमें सुधार नहीं हो पाया है। अखबार हो या चैनल उनके पत्रकार पेशेवर सिद्घांतों के आधार पर आज तक कार्य करना नहीं सीख पाये जबकि कारपोरेट का यह बुनियादी लक्षण है। पेशेवर सिद्घांतों में सबसे प्रमुख है औचित्य। जो खबर दी जा रही है उसको लिखने या प्रसारित करने का औचित्य क्या है। रंगीले बादशाह नारायण दत्त तिवारी अगर शूद्र होते तो चरित्रहीनता के एवरेस्ट के रूप में उजागर होने के बाद भी क्या मीडिया में महामंडित बने रह सकते थे। जब मुलायम सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में विवेकाधीन कोष से सहायता देने में हुए दुरुपयोग की खबरें चर्चा में थीं तो एक प्रमुख इलेक्ट्रानिक चैनल पर तुलना में मुलायम सिंह के साथ कल्याण सिंह के समय विवेकाधीन कोष से साध्वी ऋतंभरा और हिन्दूवादी संस्थाओं को प्रदत्त अनुदान का कच्चा चिट्ठा भी खोला जा रहा था। क्या इस तुलना का कोई औचित्य था।

मुलायम सिंह ने विचारधारा के आधार पर नहीं अपने और पार्टी के फायदे के लिये अनुदान बांटा था। वह भी जो बीमार नहीं था, उसे इलाज के लिये रुपये दे दिये थे। इसके विपरीत कल्याण सिंह ने जिस विचारधारा के आधार पर उन्हें जनादेश मिला था उसके लिये काम करने वाली संस्थाओं को दान दिया था। भाजपा को जनादेश मिलता है तो संघ की संस्थाओं और वामपंथियों को जनादेश मिलता है तो उनकी सरकार इप्टा व अन्य समानधर्मी संगठनों को अनुदान देते हैं। इसमें दुरुपयोग क्या है। स्थानीय स्तर की खबरों में तो मीडिया द्वारा इस तरह की गफलत की पराकाष्ठा देखने को मिलती है।

दरअसल विद्वान से विद्वान और व्यक्तिगत स्तर पर काफी हद तक ईमानदार संपादक भी फील्ड के मीडिया कर्मियों का चयन योग्यता व समझ के मानकों को किनारे कर जाति के आधार पर किया जाता है। मीडिया में लाइजनिंग की योग्यता के आधार पर संपादक बनाने का भी फैशन चल पड़ा है जो दलाल मानसिकता की वजह से सफाई कर्मी बनने की योग्यता भी न रखने वाले अपने किसी खास की संस्तुति पर आये किसी बेरोजगार युवक को फील्ड का मीडिया कर्मी यह कहते हुए चुन लेता है कि मैंने अमुक-अमुक अपने चेलों को सडक़ से सिंहासन पर बैठाया है। तुम्हें भी मौका दे रहा हूं। अमुक जिले में जाओ माल ही माल है। 2 साल में आदमी बन जाओगे, कार से चलोगे। अच्छे संपादक भी वर्ण व्यवस्था की वर्ग चेतना की वजह से खुशामदी के प्रति अतिरिक्त सहानुभूति की भावना से ग्रस्त रहते हैं और वे जाति के आधार पर नहीं तो इस आधार पर किसी भी चेले चपाटे को फील्ड वाली जागीर सौंप देते हैं।

फील्ड में मीडिया कर्मी किसी अखबार के सबसे बड़े ब्रांड अम्बेसडर होते हैं। कारपोरेट दुनिया में ट्रेनिंग, ट्रांसफर, एचआर पालिसी के नाते जरूरी है। इस आड़ में हर जिले में गैर जिले के पत्रकार की 2 साल के लिये नियुक्ति का चलन भी शुरू कर दिया गया है। कारपोरेट के अन्य क्षेत्रों की नकल तो मीडिया में कर ली गयी लेकिन बेचारे मीडिया कर्मी को दूसरी कंपनियों की तरह बाहर रहने पर आवास भत्ता, बाहर रहने का भत्ता व अन्य सुविधाओं की कोई व्यवस्था नहीं की गयी। उस पर संपादक का माल काट कर आने का गुरुमंत्र। नतीजतन यह ब्रांड अम्बेसडर अपने ब्रांड की क्या पहचान बना रहे हैं यह गौर करने लायक है। रिक्शा वाला और नेत्रहीन विकलांग तक अपनी खबर इनसे बिना पैसा दिये नहीं छपवा सकता। जब स्थानीय पत्रकार ही मुख्य कर्ताधर्ता होता था तो उसे लोकलाज का डर था लेकिन बहिरागत तो जिसे पता है कि उसे दो वर्ष में ही इस जिले से चले जाना है तो वहां के लोग उसे अच्छा समझें या बुरा क्या लेना देना। वह तो पैसे के लिये नंगा होकर नाचेगा और यही हो रहा है। इस कारण न केवल खबरों के नाम पर सिर्फ एडवरटोरियल चल रहे हैं बल्कि ब्लैकमेलिंग भी सारी सीमायें पार कर चली है। आज किसी जिले में व्यापार या ठेकेदारी करने वाले पुलिस, गुंडों और अन्य सरकारी पदाधिकारियों की वसूली से इतने परेशान नहीं हैं जितने पत्रकारों से हैं।

जाहिर है कि बिना वर्ण व्यवस्था से छुटकारा प्राप्त किये किसी समूह या वर्ग के लिये नैतिक मूल्यों का महत्व स्वीकार करना असंभव है। इस कारण मीडिया में आरक्षण लागू करने की मांग आज एक दशक पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो चुकी है। बुर्जुआ लोकतंत्र में राजनैतिक दलों का भविष्य तय करने में मीडिया की बड़ी भूमिका है। इतनी भ्रष्ट मीडिया के रहते हुए लोकतंत्र का सत्यानाश तय है जिसके कारण अगर इसमें परिवर्तन नहीं होता तो जनचेतना के निर्माण के लिये लोगों को प्रचार व शिक्षण की वैकल्पिक मशीनरी तलाशनी पड़ेगी। बसपा के संस्थापक मान्यवर कांशीराम बहुजन चेतना को तभी संगठित कर पाये जब उन्होंने वर्ण व्यवस्थावादी मीडिया को गाली गलौज कर अपने कार्यक्रमों से भगा देने का ढर्रा बना लिया था। अगर मीडिया में वर्ग चेतनागत बदलाव नहीं होता तो शायद राजनीति का आने वाला कोई और धूमकेतु भी ज्यादती का ऐसा ही रास्ता पकडऩे को मजबूर होगा। मीडिया में आरक्षण होगा तो बहुलतावादी प्रतिनिधित्व बढ़ेगा और पत्रकार एकांगी होकर सोचने की बजाय समग्रता में स्थितियों का विश्लेषण करने में सक्षम हो सकेंगे।

केपी सिंह

bebakvichar2012@gmail.com

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