मीडिया में उंचे पदों पर बैठे लोग ही पत्रकारिता की साख में गिरावट के लिए जिम्मेदार

इन दिनों फेसबुक में सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन7 से करीब तीन सौ से अधिक मीडियाकर्मियों की छंटनी का मुद्दा छाया हुआ है । इस मसले पर नरम – गरम बहसें चल रहीं हैं । दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे पर वो लोग खूब लिख – पढ़ रहे हैं , जो तटस्थ हैं । जिनको इस छटनी से प्रत्यक्ष में न कोई लेना – देना है और न उन्हें नुकसान नहीं हो रहा है । पर जो लोग नौकरियों से बेदखल किए जा रहे हैं या जिन्हें निकट भविष्य में लालाजी के मुनीमों द्वारा देर – सबेर बेदखल किया जाना तकरीबन तय हैं , वे लोग कतई चुप्पी साधे बैठे हैं ।

शायद इस उम्मीद में कि लालाजी और इनके मुनीमों को उन पर तरस आ जाय या लालाजी अथवा उनके चमचे उनमें रही – बची बौद्धिक क्षमताओं को पूरी तरह निचोड़ लेने के लिए भविष्य में फिर कभी उन्हें नौकरी में रख लें ।शायद इसीलिए इतनी बड़ी छटनी को लेकर प्रत्यक्ष रूप से पीड़ित पक्ष प्रतिरोध का रास्ता अख्तियार करना तो दूर सामान्य नाराजगी व्यक्त कर पाने से भी लाचार है । यह बाजारोन्मुखी पत्रकारिता का नया चेहरा है । जहाँ – " जबरा मारे भी और रोने भी न दे ।"

एक वो दौर था जब पत्रकारों का सिद्धांत वाक्य होता था – "कलम का काम है बेजुबानों को जुबां देना, कलम से जुल्म के तलवे तो सहलाए नहीं जाते"। बाजारवाद ने बेजुबानों को जुबां देने वालों की ही जुबां सिल दी है। अब वह जमाना गया जब जन संचार माध्यम समाज और देश हित में जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे । जन संचार माध्यम एक बेहतर समाज का राष्ट्रीय एजेंडा तैयार करने के लिए लोक शिक्षक का अहम रोल अदा करते थे । अपनी असंदिग्ध जन पक्षधरता के चलते जन संचार माध्यमों ने दुनियां के कितने दमनकारी और जन विरोधी तानाशाहों के तख्त पलटे और अनगिनत जन विरोधी सरकारों को बदला । भारत के जन संचार माध्यमों और पत्रकारों ने न केवल दमनकारी ब्रितानी हुकूमत से जमकर लोहा लिया बल्कि भारत की स्वतन्त्रता की खातिर अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया । जन संचार माध्यमों और पत्रकारों द्वारा न्याय संगत राज व्यवस्था और बेहतर समाज के निर्माण में अतीत में दिए गए अति महत्वपूर्ण योगदान और समाज हित में किए गए त्याग के उदाहरणों से विश्व और भारत का इतिहास भरा हुआ है । लेकिन नई सूचना तकनीक के वजूद में आने के बाद जब जन संचार माध्यम " मीडिया " हो गए । पत्रकारिता " मिशन " से ग्लेमर बन गई , तब से जन संचार माध्यमों के सरोकार बदल गए । नतीजन "साख " में भी बट्टा लग गया ।

असल में पत्रकारों की मौजूदा दशा एवं पत्रकारिता की साख और सरोकारों में आ रही इस गिरावट के लिए वही लोग सीधे तौर पर जिम्मेदार है जो आज समाचार संस्थानों में उच्च पदों पर बैठे हैं । ये लोग पत्रकारिता को लेकर बात भले ही जितनी ऊँची हांक लें पर वे खुद मालिकों की चाकरी कर रहे हैं । उनकी तिजोरी भर रहे हैं । बदले में मोटी तनख्वाह पा रहे हैं । देश में पूंजीवाद , बाजारवाद और उपभोक्तावाद को बढ़ाने में अपना अमूल्य योगदान दे रहे हैं । दुःख की बात यह है कि खुली अर्थ व्यवस्था के मौजूदा दौर ने पत्रकार यूनियन ही नहीं सभी ट्रेड यूनियनों को हासिये में धकेल दिया है । इनमें पत्रकारों की ट्रेड यूनियनों की हालत सबसे ज्यादा ख़राब है । इसकी दो वजहें हैं । पहला – पत्रकार यूनियनों का दलाल नेतृत्व । दूसरी वजह खुद पत्रकार साथी स्वयं हैं । हमारा मानना है कि सभी समाचार समूहों में काम कर रहे पत्रकार और गैर पत्रकार विशुद्ध रूप से "श्रमजीवी " हैं । पर इनमें से ज्यादातर पत्रकारों को अपने को "श्रमजीवी " कहने और कहलाने में शर्म महसूस होती है । माना कि अधिकांश समाचार समूह श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकारों की एकजुटता के पक्षधर नहीं हैं । समाचार समूहों को श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकारों का एका और उनकी यूनियनें कतई रास नहीं आती हैं ।

किसी यूनियन का सदस्य नहीं होना अब ज्यादातर समाचार – पत्रों में नियुक्ति पाने की पहली शर्त होती है । भले ही ज्यादातर समाचार – पत्रों की नीति यूनियन विरोधी हो । इसका मतलब यह कतई नहीं है कि अभिव्यक्ति और समाजोन्मुख जनपक्षीय पत्रकारिता की प्रबल पक्षधर पत्रकार अपने खुद के और व्यापक समाज के हित में यूनियनों से न जुड़ें। आज हालत यह है कि असल श्रमजीवी पत्रकार व्यक्तिगत और पेशेगत वजहों के चलते यूनियनों से जुड़ने को तैयार नहीं हैं। असल और पेशेवर पत्रकार यूनियन से नहीं जुड़ते तो उनकी जगह दूसरी प्रजाति के पत्रकारों से भर जाती है । जिनका लक्ष्य, समूची पत्रकार विरादरी या पत्रकारीय पेशे के व्यापक हितों के बजाय निजी स्वार्थ सिद्धि ज्यादा होता है । नतीजन एक मेहनतकश और ईमानदार पत्रकार के मानस में यूनियनों के प्रति घृणा घर कर जाती है । इसका एक ही ईलाज है कि पत्रकारीय पेशे के प्रति ईमानदार और दृष्टिवान पत्रकार आगे आयें ।

पत्रकार यूनियनों में कुंडली मारे दलालों को बहार का रास्ता दिखाएँ । आज असल पत्रकार के बौद्धिक श्रम, उर्जा और पत्रकारीय आभा को दूसरे लोग सरे बाजार बेचने में संलग्न हैं । असल पत्रकार दूर खड़ा अपनी बौद्धिक सम्पत्ति की खुली लूट का मूक दर्शक बना हुआ है । गलती किसकी है? पत्रकारों की मौजूदा और भविष्य में होने वाली छटनियों से बचने का एकमात्र ईलाज है पेशेवर पत्रकारों के बीच व्यापक एकता और मजबूत एवं लड़ाकू पत्रकार ट्रेड यूनियन ।

लेखक प्रयाग पांडेय नैनीताल में जनसत्ता अखबार के पत्रकार हैं.

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