मीडिया में क्यों खौलता है ज्वालामुखी!

मृत्युलोक के मीडिया में आजकल ज्वालामुखी धधकने लगे हैं। अदने और पैंदने लावा समूचे मृत्युलोक को राख का ढेर बनने को मैराथन बैठकों में माथापच्ची कर रहे हैं। इस जमात में वे कथित और तथाकथित लोग-लुगाई भी शामिल हैं, जिनके पास जुगाड़े हुये परिचय पत्र हैं। वह सब चलचित्रों एवं प्रिंट मीडिया के लिये क्या योगदान देते हैं, यह बहुत कम लोगों को जानकारी होती है। हजारों अफसर, सरकारी, गैर सरकारी कर्मचारी और जनता बस उनके वाहन पर प्रेस लिखा देख कर ही चकरघिन्नी की तरह नाचने लगती है। उन्हें चाहिये भी यही। ऐसे लोग-लुगाई प्रेस लिखे वाहनों में अपना गोरखधंधा शान के साथ करते रहते हैं।

आय अठन्नी खर्चा रुपया की तर्ज पर उनकी तान सुरैया के राग को पीछे छोड़ देती है। जिन्हें एक दो पहिया वाहन के खर्च के लिये तनख्वाह नहीं मिलती, वह और उनकी औलादें भी चार पहिया पर प्रेस लिख धड़ल्ले से दौडाती हैं। वह न सिर्फ अपनी हैसियत कम समझते और नहीं अपने आकाओं को बुद्धि का प्रयोग करने देते हैं। नतीजा यह कि निंदक नियरे राखिये आंगन कुटी छवाय जैसी कबीर की वाणी से परहेज करने वालों की नफरी पत्रकारिता दिवस पर होने वाली रैली का रिकार्ड तोड़ रही है। दर्द है कि उनकी कलई खुलने का दौर बकायदा लिखित में क्यों चलने लगा है।

पता नहीं वह समूची जमात को अपने जैसा बनाने पर आमादा हैं। यह गंभीर चिंतन चल ही रहा था कि पत्रकार जमात के आदि पुरूष आ धमके। नारायण-नारायण का उनका नांद अंतर तक भिगो गया। हमारे प्रमाण के बदले आशीर्वाद परोस बोले, वत्स अपने वंश में वरणशंकरों की फौज देखकर इस लोक में भ्रमण करने का मन नहीं करता। परंतु जब गीता का कर्म करने का सिद्धांत याद आता है तो फिर सक्रिय हो जाता हूं। और हां कुछ ऐसे लोग जो सही मायने में आईने को साफ-सुथरा बनाने में लगे हैं, उनका प्रेम भी खींच लाता है। प्रयास क्यों विफल हो रहे हैं स्वामी आपके इस प्रश्न पर नारद बोले, सच तो यह है वत्स प्रत्येग युग में राखस संस्कृति का बोलवाला रहा है। सच को झुठलाना उन सबकी फितरत बन गई है। मानव खाल में भेडियों की करतूतें तब भी होती थीं और आज भी बंद नहीं हैं। ताजा टीस पर उन्होंने प्यार से समझाया, कहा वत्स तुम अपना कर्म करते रहो। यह अखंड सत्य है कि अंत में जीत तुम्हारी अवश्य होगी। स्वामी आप तो राक्षसों को भी संदेश देते रहे हैं। आज के इन आईना द्रोहियों को भी समझाओ ना! नारद गंभीर हो गये। लम्बी स्वांस ली और फिर बोले। कलियुग को घोर प्रभाव है, इसीलिये आज वह भी नहीं समझ रहे जो सच की राह पर चलकर बुलंदियों को छू पाये हैं।

क्या तुम्हें नहीं पता—-कन्हैया के इसी आंगन में इस कदर भ्रष्टाचार किया गया है कि जैसा खाओ अन्न वैसा बने मन, जैसा पियो पानी तैसी बने वाणी का भरपूर प्रभाव है। पत्रकार अपनी ही जमात के लिये कम गद्दारों के लिये अधिक काम करते हैं। घुसपैठियों और अन्यायियों-आतातायियों को महत्व देकर उन्हें कुबेर बनाने में दिनरात एक करते रहते हैं। कौंन नहीं जानता कि इसी आंगन में शनि की साढे़ साती में आये व्यक्ति अल्प अवधि में धन धान्य से परिपूर्ण हो गया। होंगे किसी के लिये शनि खराब चीफ ने साढे़ साती में दो आलीशान दो मंजिला आशियाना, दो फ्लैट ले लिये। टूटे स्कूटर आगरा का हो गया, चार पहिया पर सवार हो गया। जब हो हल्ला मचा चार पहिया चोरी का है, तो किसी माफिया की तरह दूसरी गाड़ी कब्जा ली। पगार से अधिक बीमा की किस्त अदा करता रहा। हौसला इस कदर बुलंद रहा कि दूसरों के माल को भी चार पहिया में डाल रिश्तेदारों और आकाओं के लिये ले जाने में उसे कभी तकलीफ नहीं हुई। इस माल में चपरासी तक का हिस्सा भी वह ले जाता रहा।
हायतोब्बा खूब मची, लेकिन उसके आका ने बाल भी बांका नहीं होने दिया। जब आका फुल पावर में आया तो उसने भक्ति का प्रसाद दे अपना दरबारी बना दिया। टेस्ट में फेल भले हुए उसका पद और पगार भी बढ़ा दी। वत्स आका का अतीत यह रहा कि उसके पूर्वज एक जमाने में ब्रज के चंद घरों के गांव में शरणार्थी रहे थे। जैसे राधा के पग से छूने पर कंस आगरा पहुंच छह महीने मूर्छित रहा, उसी तरह वह भी उसी के पास जा पहुंचे। जब यह जबानी में मीडिया दरबारी बना तो एक पत्रकार कहता, क्यों वे, सुबह इस शर्ट को भैया पहने था अब तू लटका लाया। आज वही शख्स ढाई साल की कमाई में एक करोड़ की बुलंद इमारत में शयन करता है। बैंक बैलेंस जान लोगे और अवैध हथियार का जखीरा देखोगे तो दंग रह जाओगे।

बीते साल इसी आका ने एक और कारिंदा भेजा। सीट की बोली तय की। जब एक महीने में सफलता नहीं मिली तो पहले वाले से कहा उत्तराधिकारी को अपने सूत्र बता। नतीजतन महीना नियमित मिलने लगा। आका साइबर क्राइम भी धड़ल्ले से करता है। सहयोगियों के मोबाइल नंबरों की पड़ताल करता है। उसने बकायदा स्पेशलिस्ट लगा रखा है। इसके जरिये आन लाइन टेस्ट भी मनमाफिक प्रेषित कर चुका है। इस तरकीब से संस्थानकर्मियों में एक दूसरे से बात करने में भी नौकरी जाती दिखती है। आखिर डर क्यों न हो, आका कई की नौकरी भी मालिकों को काली कमाई में भड़भूजा जितना हिस्सा जो देता है। दूसरे का जोश भी आज इतना बढ़ गया है कि आका की सरपरस्ती में आतंकी बन गया है। हर बीट पर कब्जा है। मेहनत करते हैं दूसरे और खबर को खुद नाम से छाप सरनाम बना है। इसके कारनामे पहले भी कम नहीं रहे, ताज नगर में आलीशान इमारत छोटी सी पगार में बना चुका है।

अब भले पगार तीन संख्या में है, लेकिन उसका खर्च अब भी उससे ज्यादा है। बच्चों की फीस ही इतनी देता है कि आयकर वालों का खून सफेद हो जायेगा। इस तिकडी के संरक्षण में फलता फूलता रहा एक माफिया कि उसकी कमाई का आंकलन करने में द्वारिकाधीश और बांके बिहारी भी असफल से रहे। हालांकि आज वह संस्थान में नहीं, किंतु उसके ये संरक्षक और अंदर बैठे शार्गिद अब भी सहायक बने हैं। नारद ने वीणा सहलाते हुये कहा, वत्स! भारत के संविधान जैसे पैबंद वाले वस्त्र पहनने वालों की शान आज राज को लजाती है। एक चार जरकटा वाले पत्रकार की भी सुनलो, उसका गांव में रहना दूभर था। साइकिल से काम चलाता। एक लम्बा सा स्कूटर पल्ले पड़ा तो उसे पुलिस वाले रोकते-रहते। आज हाल ये जन्मभूमि के पाश इलाके में आलीशान भवन है। काली कमाई के लिये यह अंगना कितना मुफीद है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है, कि जब उसको प्रमोशन देकर अधिक पगार पर दूर भेजा जाने लगा तो उसने जाना मंजूर नहीं किया।

बेटी की शादी की तो करीब तीस लाख ऐसे फूंके जैसे नकली नोट हों। वत्स तरस तो उन पर आता है जो उन तस्करों जैसी करतूतों को अंजाम देने वालों का साथ देते हैं। छुटभैये कहलाते हैं और महाभ्रष्टों को सलाम ठोंकते हैं। एक बात और बताते चलें मीडिया तंत्र आजकल बच्चों को भी माफ नहीं कर रहा। एक स्कीम के तहत कामगारों को बेरोजगार और उनकी जगह बच्चों को पत्रकार बनाने का लालच दे खूब लूट रहा है। पहले से ही जनता को नंगा करने में लगे स्कूल संचालकों के सहारे जबरिया अपना अखबार बिकवा रहा है। सच यह कि जनता की आवाज बनने का दावा करने वाला मीडिया कभी यह नहीं छापता और दिखाता कि अवकाश के दिनों की फीस तथा वाहनों का किराया स्कूल वाले क्यों वसूलते हैं। समय बहुत हो गया वत्स, लेकिन एक बात और बता देता हूं दूसरे को जलाने वाला हो या अपने अंदर ज्वालामुखी धधकाने वाला कुख्यात होते हैं, सुविख्यात कतई नहीं।

औपमन्यव

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