मीडिया में ‘मत्स्य न्याय’ : अंबानी, भास्कर और जागरण समूह की खतरनाक प्रवृत्ति

नेटवर्क18 और टीवी18 समूह के पास जो सात चैनल हैं उनमें समाचार और वाणिज्य समाचारों के चैनल शामिल हैं। कंपनी के पास इनाडु टीवी (इटीवी) का भी नियंत्रण है.  इस तरह से रिलायंस की पकड़ दस राज्यों में दिखलाए जानेवाले 12 क्षेत्रीय भाषाई चैनलों पर भी हो गई है. यद्यपि अब तक समाचार चैनलों को चलाने वालों में अखबार निकालने वाली कंपनियों के अलावा मुख्यतः छोटी पूंजी के कंट्रेक्टर, बिल्डर आदि शामिल रहे हैं. पर यह पहली बार है जब किसी गैर-मीडिया कंपनी ने इतने बड़े पैमाने पर निवेश कर किसी मीडिया कंपनी पर नियंत्रण हासिल किया हो.

वैसे अंबानी भाइयों मुकेश और अनिल का थोड़ा-बहुत पैसा इनाडु, नई दुनिया और टीवी टुडे आदि कई मीडिया समूहों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से लगा हुआ था. देश में इस समय 831 टीवी चैनल हैं उनमें से 366 समाचारों के हैं पर सच यह है कि अधिसंख्य मीडिया कंपनियां घाटे में हैं. जो शीर्ष कंपनियां लाभ में भी हैं उनके लाभ का प्रतिशत भी बहुत कम है. स्वयं नेटवर्क 18 कई प्रमुख चैनलों का मालिक होने के बावजूद जबर्दस्त घाटे में चल रहा है. यह घाटा कुल 2,100 करोड़ तक पहुंच चुका है. इसके बावजूद चैनल चलाने का आकर्षण घटा नहीं है.

सरकार के पास इस समय भी नये चैनलों की मंजूरी के लिए 600 से ज्यादा आवेदन विचाराधीन हैं. यह तो हम जानते ही हैं कि मुकेश अंबानी जैसा चतुर व्यापारी यों ही इस नुकसान के धंधे में इतनी बड़ी राशि नहीं लगाएगा. साफ है कि ये चैनल मात्र पैसे के लाभ के लिए नहीं चलाए जाते. ये चैनल और अखबार भी (उदाहरण के लिए दिल्ली से एक कांग्रेसी नेता द्वारा निकाला जानेवाला दैनिक) मुख्यतः अपने राजनीतिक या व्यवसायिक हितों के लिए चलाए जाते हैं.

आरआईएल पर पहले से ही अप्रत्यक्ष रूप से इनाडु में पैसा लगाने के आरोप हैं, जिसका लाभ उसे कावेरी-गोदावरी बेसिन में गैस के भंडारों को कब्जाने में मिला. दैनिक भास्कर समूह ने अखबारों की कमाई को खदानों और बिजली पैदा करने आदि की विभिन्न कंपनियों में लगाया हुआ है. ध्यान रहे कि उसके संस्करण मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ व झारखंड आदि में हैं जहां सबसे ज्यादा निवेश खदानों और बिजली उत्पादन जैसे कामों में हो रहा है. यह मानने का कोई कारण नहीं है कि अखबार की उपस्थिति उस के उद्योगों को मदद नहीं करती होगी?

द हिन्दू के वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ के अनुसार- ‘मीडिया को सबसे बड़ा खतरा न्यू कन्वर्जेंस से है, जिसके तहत बड़े व्यापारिक घराने मीडिया समूह को खरीद रहे हैं और मीडिया समूह बिजनेस हाउसेस में बदल रहे हैं.’ साईनाथ का यह भी कहना है कि बड़े राजनैतिक दल नए-नए अखबार और चैनल की शुरुआत कर रहे हैं. यानी अब मीडिया, कारपोरेट और राजनीतिक दलों के हित एक हो रहे हैं. इसकी वजह से मीडिया प्राफिट का कैदी बन गया है. अब प्राफिट ही उसका सबसे बड़ा उद्देश्य है. इसी के चलते मीडिया पर बिल्डरों, व्यापारियों और बड़ी कंपनियों का दबदबा बढ़ता जा रहा है.  अखबारों के बोर्ड आफ डायरेक्टर की सूची में रियल एस्टेट और बिल्डरों के नाम देखे जा सकते हैं. दैनिक जागरण के बोर्ड आफ डायरेक्टर में दक्षिण एशिया के मेकडोनाल्ड प्रमुख का नाम शामिल है.

नई दुनिया अखबार को किसी भी तरह छोटा अखबार समूह नहीं माना जा सकता. वह हिंदी का बड़ा अखबार तो है ही. देश के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले दस अखबारों में से भी है. तकरीबन पांच लाख की प्रसार संख्या वाला यह अखबार इंदौर के अलावा मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चार अन्य शहरों से भी प्रकाशित होता है. एक जमाने में यह मध्यप्रदेश का सबसे ज्यादा बिकनेवाला अखबार था और संभवतः आज भी इसका इंदौर संस्करण राज्य में किसी एक जगह से निकलनेवाला सबसे बड़ा अखबार है. इस 65 वर्ष पुराने अखबार की संपादकीय निष्ठा व आदर्श पत्रकारिता के लिए विशेष प्रतिष्ठा रही है. इसने हिंदी पत्रकारिता को कई महत्त्वपूर्ण संपादक और पत्रकार दिए. तब प्रश्न है कि इतना बड़ा अखबार आखिर बिक कैसे गया? निश्चय ही इस अखबार के बिकने से इस का नाम बचा रहेगा पर क्या दैनिक जागरण समूह जो अपनी संपादकीय मूल्यवत्ता के लिए नहीं बल्कि व्यवसायिक दक्षता के लिए जाना जाता है, नई दुनिया की निष्पक्षता और संपादकीय स्तरीयता को बचा पाएगा?

दैनिक जागरण द्वारा नई दुनिया समूह को खरीदने के पीछे मध्यप्रदेश में अपना विस्तार करना है जहां वह पारिवारिक विवाद के कारण संस्करण नहीं निकाल सकता. दैनिक जागरण समूह लगातार अपना विस्तार करने में लगा हुआ है और इसने एक-आध वर्ष पहले ही मुंबई के मिड डे समूह को खरीदा था. दैनिक जागरण समूह को इस खरीद के लिए इक्विटी कंपनी ब्लैकस्टोन ग्रुप से 225 करोड़ रुपये मिले थे. यह पैसा एक मायने में सीधा विदेशी निवेश है. नई दुनिया का प्रत्यक्ष सौदा सिर्फ 150 करोड़ रुपये का बतलाया गया है.

पर दैनिक जागरण ऐसा अकेला समूह नहीं है जिसने दूसरे अखबारी संस्थानों का अधिग्रहण किया हो. दैनिक भास्कर और टाइम्स आफ इंडिया के प्रकाशक बैनेटकोलमैन समूह ने भी अन्य भाषाओं के अखबारों का अधिग्रहण किया है. दरअसल मीडिया में ‘मत्स्य न्याय’ का नया चलन है, जहां बड़ी मछली छोटी मछली को निगल लेती है. महान विचारक मार्क्स ने कहा था, ‘मुनाफा जितना बढ़ता जाता है, मुनाफा उतना ही दुस्साहसी होता जाता है और मुनाफा जब अत्यधिक बढ़ जाता है तो एक समय ऐसा आता है कि मुनाफा अपने मालिक की हत्या करने से भी नही हिचकता.’

नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) से जुड़े पटना के वरिष्ठ पत्रकार और राकेश प्रवीर की रिपोर्ट.

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