मीडिया से अदृश्य ग्रामीण भारत के सरोकार

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत गांव में बसता है। देश की उन्नति के लिए गांव की उन्नति आवश्यक है। आजादी के दौरान महात्मा गांधी ने अपनी पत्रकारिता के जरिए भी ग्रामीण चेतना को जगाने का काम किया था, जिसके लिए उन्होंने यंग इंडिया, हरिजन, स्वराज जैसे समाचार पत्रों में भी ग्रामीण भारत की वकालत की थी। ग्रामीण भारत की अहमियत को समझते हुए ही आजाद भारत के प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान, जय किसान का नारा दिया था। फौज मे जवान और खेत में किसान की वकालत की। कृषि क्षेत्र में कई क्रान्तिकारी शुरूआतें कीं और फैसले लिए। लेकिन, यही भारत जैसे-जैसे अपनी उम्र के पड़ावों को पार करता गया वैसे–वैसे धुंधला होता गया। 
 
नब्बे के दशक में उदारीकरण की बयार से इन गांवो के नेस्तनाबूद होने की शुरूआत हुई। देश में तमाम विदेशी निवेशकों की आवक हुई। धीरे धीरे कृषि योग्य भूमि को कारखानों और ऊंची बिल्डिंगों ने निगलना शुरू कर दिया, जिसकी परंपरा आज भी बदस्तूर जारी है।
 
इसे विडम्बना नहीं तो और क्या कहा जाए कि एक और तो सरकार कृषि योग्य भूमि का जबरन अधिग्रहण कर उसे पूंजीपतियों को सौंप देती है, तो वहीं उसके समानांतर कृषि को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम चलाने का दावा करती है, जो महज छलावा है। साथ ही सरकार की तरह मीडिया, जिसकी जिम्मेदारी सरकार के कारनामों को जनता के सामने लाना है वह भी इन्हीं पूंजीपतियों की चरणवंदना में लिप्त है। कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों के मालिक सरकार के सहयोग से प्राकृतिक संपदा से युक्त राज्यों में खादानों के काम में जुट गए हैं।
 
राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन पर दिखाए जा रहे कृषि दर्शन इसकी एक बानगी भर है। निजी समाचार चैनलों ने तो खैर ग्रामीण भारत की ओर से नज़रें हीं फेर रखी हैं। वे तो सिर्फ क्राइम, क्रिकेट और सिनेमा बेचने में ही मगन रहते है। एक अपेक्षा प्रिंट मीडिया से जगती है, लेकिन वो भी सिवाय छलावे के कुछ खास नहीं कर रहे है। वो बहुराज्यीय और बहुस्थानीय संस्करणों की हमेशा बातें तो करते हैं, लेकिन उनके स्थानीय संस्करणों में भी गांवो के लिए कुछ खास नहीं होता है। उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण ले लीजिए। उत्तर प्रदेश में हिंदी के तीन प्रमुख अखबार प्रकाशित होते हैं, जिसमें दैनिक जागरण, हिदुंस्तान व अमर उजाला शामिल हैं। इन तीनों समाचार पत्रों के प्रदेश में जिलेवार ब्यूरों ऑफिस हैं। सभी के जिला संस्करण प्रकाशित होते हैं। वर्तमान में इनका सर्कुलेशन शहरों से ज्यादा गांवों में बढ़ रहा है। लेकिन, इनके पन्नों पर नजर दौड़ाई जाए तो पता चलेगा कि अधिकांश खबरें जिला कार्यालयों की होती हैं। इन अखबारों के तहसीलवार स्ट्रिंगर भी हैं, लेकिन वह केवल अपराध व राजनीतिक स्वागत समारोह की छोटी-बड़ी खबरों को रिपोर्ट करने तक ही सीमित रहते हैं। उन्हें गांव की सड़क, पानी, बिजली, सुरक्षा व स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं से संबंधित समस्याएं भी दिखाई नहीं देती हैं। वो भी क्या करें ब्यूरों ऑफिस तो जिला स्तर से उगाही के केंद्र बने हुए हैं।
 
आज उत्तर प्रदेश में गन्ना मूल्य व पिराई शुरू करने को लेकर घमासान रहा चल रहा है। एक ओर किसान गन्ने के समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, तो वहीं निजी चीनी मिल मालिक कीमत बढ़ाने को लेकर तैयार नहीं हैं, दूसरी ओर सरकार है कि वह किसानों के मामले में भी राजनीतिक पैंतरेबाजी से बाज नहीं आ रही है। यूपी की कई सहकारी मिलें बंद पड़ी हैं और वो किसानों के बकाया भुगतान कराने में सक्षम नहीं है। चीनी का कटोरा कहा जाने वाला पश्चिमी उत्तर प्रदेश त्राहि-त्राहि कर रहा है, लेकिन मीडिया में कहीं भी इस मसले पर गंभीर रिपोर्टिंग देखने को नहीं मिल रही है।
 
मीडिया में ग्रामीण भारत अगर चर्चा में आया भी है तो वो केंद्र सरकार की वोट बटोरू योजनाएं ही हैं, जिनके विज्ञापनों के सहारे मीडिया अपनी कमाई कर रहा है, फिर चाहे वो मनरेगा हो या फिर ऐसी ही कोई अन्य योजनाएं। ग्रामीण मंत्रालय तो सिने अभिनेत्री विद्या बालन को मंत्रालय का ब्रांड अंबेसडर बनाकर ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है। इसका जिम्मेदार वो मीडिया भी है जो सर्वसमाज के उजले आइने का दंभ भरता है, लेकिन सच तो यह है कि अब इस आइने पर भी धूल जम चुकी है। इसलिए इस आईने में अब इस देश के गांवों की तस्वीर भी धुंधली नज़र आती है।
 
                      आशीष कुमार पत्रकारिता एवं जनसंचार में शोध कर रहे हैं. इनसे सम्पर्क 09411400108 के जरिए किया जा सकता है.
 

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