मीडिया से कभी नेता डरते थे, अब मीडिया के कठपुतली बनने का खतरा

Vikas Mishra : मदारी जिस तरह बंदर नचाता है, उसी तरह राजनीतिक पार्टियां मीडिया को नचाने में लगी हैं। एक बड़ा रंगमंच सजा है। जनता न्यूज चैनल देखकर कहती है कि यही सबसे बड़ी ताकत है। हम इस सिस्टम के भीतर बैठे हैं, हम देख रहे हैं मीडिया की ताकत की सच्चाई को। जो मजा दे रहा है, जिसे देखकर मजा मिल रहा है, उसे दिखाया जा रहा है। अगर पत्रकार हैं तो दिल पर हाथ रखकर बोलिए- क्या शोएब इकबाल, विनोद बिन्नी, रामबीर शौकीन के गिराए केजरीवाल सरकार गिरनी थी..? ये तीन थे, पांच भी होते तो भी कुछ नहीं उखड़ना था।

तीनों आए, हीरो बन गए, दो ने आज केजरीवाल से सेटिंग कर ली। सबकी चांदी हो गई, लेकिन आम आदमी पार्टी ने जमकर मीडिया का फायदा उठाया, प्राइम टाइम में सरकार पर संकट छाया रहा। अखबार सुबह इसी से रंगे थे, किसी ने नहीं सोचा कि जब तक बीजेपी या कांग्रेस अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाती, ये सरकार गिर नहीं सकती। यही नहीं इन तीन तिलंगों के पॉलिटिकल स्टंट को आधार बनाकर आम आदमी पार्टी ने बीजेपी-कांग्रेस दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया कि ये सरकार गिराने की साजिश हो रही है। सच तो ये है कि कोई भी पार्टी इस वक्त केजरीवाल सरकार को गिराने का संकट मोल नहीं लेना चाहती। केजरीवाल के अलावा उनकी सरकार को कोई और गिरा ही नहीं सकता।

सभी राजनीतिक दल अपने-अपने ढंग से मीडिया का फायदा ले रहे हैं। मोदी कूड़ा बोलें, करकट उगलें, लेकिन उनका हर भाषण लाइव कटता है। उससे पहले किसने बोला, बाद में कौन बोला, पता नहीं। राहुल गांधी, सोनिया गांधी बोलती हैं तो भी लाइव कटता है। बाकी खबरें स्वाहा हैं। आजम खान की भैंस को जितना पुलिस ने खोजा, उससे ज्यादा मीडिया ने खोजा।

नेताओं की औकात देखिए, पहले तो नखरे दिखाते हैं, फिर खुद तय करते हैं कि क्या पूछा जाएगा और क्या नहीं। तब इंटरव्यू तय होता है। राहुल गांधी-सोनिया गांधी, नरेंद्र मोदी के इंटरव्यू के लिए हर मीडिया हाउस के अप्लीकेशन बरसों से लगे हैं, जिसके हाथ इंटरव्यू लग गया वो सबसे बड़ा खिलाड़ी। लालू यादव जैसे नेता, जिन्हें अदालत से बाकायदा सजा मिल चुकी है, वो बड़ी शान से बताते हैं कि फलां-फलां बड़े पत्रकार ने फोन किया था, मैंने इंटरव्यू नहीं दिया।

देश के सबसे प्रतिष्ठित पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थान- भारतीय जनसंचार संस्थान से मैंने पत्रकारिता का प्रशिक्षण लिया था। पहला सबक था जो जैसा है, वैसा ही वर्णन करना है, अपनी तरफ से कुछ नहीं जोड़ना है। दूसरा सबक- निरपेक्ष रहना है। तीसरा सबक- चौकन्ना रहना है कि कहीं कोई अपनी खबर प्लांट तो नहीं करना चाहता। चौथा सबक…पांचवा सबक..छठां सबक..। तमाम सबक अगर भूलेंगे नहीं तो इस रफ्तार में चलना मुमकिन नहीं। निरपेक्षता बेमानी हो चुकी है। विरोध होगा तो ऐसा कि नरक में ढकेलने के लिए नए नए मुहावरे गढ़ लिए जाएंगे। समर्थन होगा तो सिर पर ही नहीं आसमान पर चढ़ा देंगे। कैसी निरपेक्षता, कहां की निरपेक्षता।

मीडिया के दफ्तर में संपूर्ण भारत है। राष्ट्रवादी हैं, नक्सलवादी हैं, वामपंथी हैं, दामपंथी हैं। जिसके हाथ जो लग गया, अपना एजेंडा जुड़ गया। साफ दिखता है। रिमोट से चैनल बदलकर देख लें। कहीं केजरीवाल को गाली पड़ रही होगी, कहीं ताली पड़ रही होगी। कहीं मोदी ठोंके जा रहे होंगे, कहीं मोदी की बम बम हो रही होगी। हम इससे निराश नहीं है, दुखी भी नहीं हैं, मेरी सोच दकियानूस नहीं है, फिर भी लगता है कि कुछ सोचना पड़ेगा, वरना जिस मीडिया के नाम से बड़े-बड़े नेताओं की धोती गीली हो जाती थी, वो मीडिया इनकी कठपुतली न बन जाए।

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र के फेसबुक वॉल से.

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