मुअनजोदड़ो के अतीत में मैं कई जिंदगियां एक साथ जीकर आया हूं : ओम थानवी

Yashwant Singh : शुक्रिया Om Thanvi जी, 'मुअनजोदड़ो' जैसा ट्रैवलाग लिखने के लिए. आज शाम जब पढ़ना शुरू किया तो ऐसा तल्लीन हुआ, डूबा कि पूरा खत्म करके ही हटा. दुबारा इसलिए पढ़ने का मन कर रहा है कि इतिहास, सभ्यता, मनुष्यता, शोध से संबंधित ढेर सारे तथ्यों को दिमाग में बसा लेना चाहता हूं. बचपन से लेकर बीए तक में सिंधु घाटी सभ्यता और इससे संबंधित हड़प्पा, मोहनजोदड़ो उर्फ मुअनजोदड़ो, लोथल आदि के बारे में पढ़ा था लेकिन तब वह रट लेने के भाव से ज्यादा हुई पढ़ाई थी, समझने-बूझने-सोचने के अर्थ में कम. आज 'मुअनजोदड़ो' पढ़कर बार-बार यह लगता रहा कि हम लोग कितने संकीर्ण और तात्कालिक सोच के साथ जीते हैं, हजारों बरस पहले भी मनुष्य थे और हमसे जाने कितने सुसंस्कृत कि तब समाज को संचालित करने के लिए किसी फौज फाटे या पुलिस थाने की जरूरत नहीं होती थी.

ओम थानवी ने मोहनजोदड़ो जाकर और फिर वहां से लौटकर इस विषय से संबंधित कुल 35 किताबों का अध्ययन करके (जिनके नाम किताब के आखिर में दिए गए हैं) इस आदिम, ऐतिहासिक और संवेदनशील विषय पर उदात्त, तथ्यों पर आधारित, सहज सरल भाषा में समझ में आने वाली व दिल-दिमाग को झकझोरने वाली किताब लिखी. अगर आपको अपने पुरखों, अपने इतिहास, अपने जन, अपने अतीत को जानने में जरा भी उत्सुकता है तो इसे जरूर पढ़ना चाहिए… किताब का एक छोटा-सा अंश यहां देना चाहूंगा.. '' दिलचस्प बात है कि व्यक्ति को भीतर की तरफ मोड़ने वाले योग का पाठ समृद्ध और नागर मुअनजोदड़ो से आया होगा. छोड़ने का मतलब तभी है जब छोड़ने के लिए आपके पास कुछ हो. यह त्याग है. आंख होने के अहंकार का विलय कर आंखें मूदना और भीतर की आंख से खुद को और दुनिया को देखना. शब्दों के पार मौन में अर्थ ढूंढना. दो पांव से दुनिया नापने की महत्वाकांक्षा के बरक्स पालथी मार कर बैठना और काल की दूरी नापना. हाथ पर हाथ धर कर बैठना हमेशा निरर्थक नहीं होता. समृद्धि और भव्यता के बीच मुअनजोदड़ों की मुहरों का यह गहरा संदेश है. मुअनजोदड़ों की दोनों विख्यात छवियों नरेश और नर्तकी की आंखें खुली नहीं हैं. बंद या अध-मुंदी आंखों में अपनी गरिमा का वास है. यह अकारण नहीं कि मुअनजोदड़ो की यह भंगिमा कई सदियों बाद फिर हमारे देश में ही बुद्ध और महावीर की ध्यान मुद्रा में दिखलाई दी.''

इस किताब का अंत ओम थानवी जी दो पंक्तियों से करते हैं, जो उनके प्रिय कवि अज्ञेय की हैं..

रोज़ सबेरे मैं थोड़ा-सा अतीत में जी लेता हूं-
क्योंकि रोज़ शाम को मैं थोड़ा-सा भविष्य में मर जाता हूं।।

''मुअनजोदड़ो के अतीत में मैं कई जिंदगियां एक साथ जीकर आया हूं'' कहने वाले ओम थानवी के इस ट्रैवलाग को पढ़ते समय बार-बार महसूस होता है कि पाठक खुद उनके साथ इस स्थान में टहल रहा है, सोच रहा है, खुद से भीतर-भीतर बहस कर रहा है…

200 रुपये की यह किताब वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित की है. अगर कोई मुझसे लेकर पढ़ना चाहे तो फ्री में मिल जाएगी.

    Kamal Kishore Khatri bhijwa dijiye, yashwant ji
 
    Manendra Yadav Mujhe bhi chahiye
 
    Hans Raj Kabir Yaswant jee book mujhe bhi chahiye..
   
    Dhirendra Pandey वाह क्या बात की है –अगर कोई मुझसे लेकर पढ़ना चाहे तो फ्री में मिल जाएगी | जस्बा प्रशंसनीय है
    
    Yashwant Singh बहुत खूब Dilnawaz Pasha भाई.
     
    Dhirendra Pandey खरीदनी ही पड़ेगी अब तो
     
    Ahmad Raza lagan thi wo jo safar kat gaya
     
    Harishankar Singh practical journey of history
     
    Anurag Jagdhari यदि यह ट्रैवलाग इंटरनेट पर उपलब्ध है तो कृपया इसका लिंक देवें …
     
    Sanjay Agrawal bahut sunder . . . .
     
    Harishankar Shahi भाई हमें भेज दीजिए… मुफ्त वाली व्यवस्था का धन्यवाद.
     
    Rakesh Soni Nisandeh hamare bich me Yashawant ji jaisa apritam gadaykar hai aur vo nirantar kuch aisa likh rahe hai jo hamesha yaad kiya jayega,ye baat alag hai ki ve apni puri pratibha ka upyog nahi kar rahe hai..
        
    Sheetal P Singh Jamaa rahe ho mazma. Maja aaya.
     
    Shravan Kumar Shukla हाँ जल्द ही.. बाक़ी निपटा लूं फिर.. तबतक सुरक्षित रखिएगा.. बुकिंग अभी से!
     
    Shravan Kumar Shukla Dilnawaz Pasha जी. क्या बात है. जल्द ही आपसे भी बेहतर अनुभव सुनाऊंगा ! शुक्रिया.. कभी-कभी लगता ही नहीं कि जो जिंदगी हम जी रहे हैं वह किसी अन्य मायने में क्या है
     
    Choudhary Neeraj कैसे मिलेगी फ्री में…..? मुझे भी चाहिए… अब तो मेरा भी मन कर रहा है., पुस्तक पढ़ने का क्योंकि आपने समीक्षा ही जबरदस्त की है
 
    Jitendra Dixit धन्यवाद यशवंत जी। आपने किताब के बारे में जिज्ञासा पैदा कर दी। अब तो जरूर पढूंगा।
 
    सुनीता भास्कर खूब.
 
    राय संजय kal delhi pahunch raha hun ….pahila kam kitab ko kharidunga …fir padhunga …thanx yashwant ji …..
 
    Dhananjay Kumar i too am raring to read it. His narrative is superb
     
   Shalabh Bhadoria Yashavnt ji,ek achchhi kitab padhne ko prerit karne k liye dhanywad.kisi lagi yah bhi bataunga.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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