मुकेश कुमार की कविताएं (साभार- शुक्रवार)

शुक्रवार पत्रिका में वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार की कई कविताएं प्रकाशित हुई हैं. कई चैनलों के संपादक रह चुके मुकेश कुमार हंस मैग्जीन में नियमित रूप से लिखते हैं. उन्होंने किताबें भी लिखी हैं. मुकेश कुमार इन दिनों मुख्य धारा की पत्रकारिता से दूर रहते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएचडी करने में जुटे हुए हैं. लीजिए, मुकेश कुमार की कविताओं को पढ़िए…

हिमयुग

आज भी हिमयुग में  जमी हुई है पृथ्वी

तापहीन सूर्य असमर्थ है पिघला पाने में बर्फ

जाने कब जीवित होंगे  समय के जीवाश्म

विकास के कितने चरणों  को पार करके जीवन लेगा मानव रूप

सभ्यताएं कब पहुँचेंगी  उस मोड़ पर

जहाँ खिलते हैं  सूरज निरभ्र आकाश में

मुझसे सहा नहीं जाता ये विलंबित शीतकाल

अनगिनत अणु विस्फोटों  के ताप से प्रज्ज्वलित  मेरी देह

भस्म हो रही है

संचित हो जाएगी एक दिन हिमशिलाओं के नीचे

ज्वालामुखी बनकर

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सृष्टि

मरुभूमि की रेत की तरह

फैली हैं मेरी कामनाएं

एक किशोर तोड़ता है पेड़ पर चढ़कर कच्चे अमरूद

शीशे के सामने खड़ा एक अधेड़ रंग रहा है अपने बाल

यौवन की मिथ्या अनुभूति  लिए

 
धरती पूछती है सूर्य  से मुखातिब होकर

दोनों के होने का औचित्य

खिलखिला पड़ता है सौरमंडल

ग्रह, उपग्रह तारे सब जिज्ञासु हो उठते हैं

नथुने फड़क उठते हैं हवाओं  के

दौड़ पड़ती है वह दोगुने उत्साह के साथ

 
कहीं एक स्त्री सँभालते  हुए अपने वस्त्र

उठती है शैय्या से संपूर्ण  तुष्टि के साथ।

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पत्थर

जिन्हें पूजा
हो गए पत्थर

पूजते-पूजते पत्थर
लोग भी हो गए पत्थर

देवता भी पत्थर
भक्त भी पत्थर

सब पत्थर
बस पत्थर ही पत्थर

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मुट्ठी

तितलियों से लेकर जंगल पहाड़ों  तक
परियों से लेकर चाँद तारों  तक
सब कुछ था नन्हीं सी बंद  मुट्ठी में

फिर जाने क्या पकड़ने दौड़े
कि फिसल गई दुनिया मुट्ठी से
रह गई उम्मीदों और सपनों  की रेत
चिपचिपाते पसीने के साथ

खुली हुई हथेली पर।

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तारीफ़

बहुत घातक होती है प्रशंसा
मीठे ज़हर की तरह
फैल जाती है नसों में
मदहोशी  के साथ

डाल देती है एक खुशनुमा आवरण दृष्टि पर
ओझल हो जाता है सच

आत्ममुग्धता में लीन मन
हमेशा खोजता  रहता है प्रशंसा के बोल

तारीफ़
तालियाँ
वाहवाही

रम जाता है इन्हीं में
उलटता रहता है अपनी उपलब्धियों के एलबम

बढ़ती जाती है आत्मप्रचार की भूख
कान तरसते  रहते हैं अपने बारे में  सुनने को

आँखें ढूँढ़ती  हैं पत्र-पत्रिकाओं, चैनलों में अपनी छवियाँ
मस्तिष्क  तलाश में रहता है प्रशंसा  लूटने के अवसर

बोलता रहता है अपने बारे में वह निरंतर, नि:संकोच
प्रत्यक्ष में, परोक्ष में
हर जगह  होता है वह खुद
उसकी उपस्थिति मारती है

मुर्दाघरों  जैसी सड़ाँध
सो जाती है आत्मा

बर्दाश्त  नहीं होती मामूली सी आलोचना
हर प्रतिकूल बात में दिखती है

साज़िश, पूर्वाग्रह और ईर्ष्या
इससे ख़तरनाक़ नहीं है कोई भी मौत
आप मर जाते हैं और आपको पता भी नहीं होता
ढोते रहते हैं एक मुर्दा व्यक्तित्व
मरे हुए  बच्चे को सीने से चिपटाए
बंदरिया की तरह।


मुकेश कुमार से संपर्क mukeshkabir@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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