मुख्य सचिव अनूप मिश्रा के विरुद्ध कार्यवाही क्यों नहीं की गयी?

हम कई बार देखते हैं कि निर्वाचन आयोग भी आधा-अधूरा काम ही करने में विश्वास करता है अथवा शायद पक्षपातपूर्ण रवैया भी अपनाता है. मैं ऐसा इसी लिए कह सकती हूँ कि जहाँ कई बार तो चुनाव आयोग बिना किसी शिकायत के अथवा बगैर कोई कारण बताए किसी भी आईएएस अथवा आईपीएस अधिकारी को चुनाव के दौरान उसके पद से हटाने के आदेश दे देता है, जिससे उसकी प्रतिष्ठा में भारी कमी होती है. इसके विपरीत कई बार स्वयं निर्वाचन आयोग की दृष्टि में अधिकारी गलत कर रहे होते हैं पर वह उसे काफी हलके में लेता है अथवा शायद नज़रंदाज़ सा कर रहा होता है.

मैं यहाँ दो ऐसे ही दृष्टांत रख रही हूँ जिसमें निर्वाचन आयोग का कार्य आधा-अधूरा कहा जाएगा. पहला मामला है उत्तर प्रदेश सचिवालय के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का जिनके बारे में निर्वाचन आयोग को यह जानकारी मिली है कि वे चुनाव के सम्बन्ध में अपनी शक्ति के परे जा कर फोन से मौखिक रूप से ऐसे अनुचित निर्देश जारी कर रहे हैं, जो आयोग के आदेशों के विपरीत हैं. आयोग ने इस सम्बन्ध में बकायदा पत्र जारी कर के चुनाव से जुड़े सभी अधिकारियों को निर्देशित किया है कि अब किसी प्रकार के कोई मौखिक आदेश ना तो प्रेषित किये जाएँ और ना ही स्वीकार किये जाएँ. यानि सारे आदेश लिखित में होने चाहिए.

यह तो ठीक है पर प्रश्न यह है कि यदि आयोग को इस बारे में निश्चित सूचना है तो उसने ऐसे सभी अधिकारियों को छोड़ क्यों दिया? आखिर इन अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही क्यों नहीं की गयी? इनके खिलाफ आगे जांच करा कर इसे अंतिम परिणति तक क्यों नहीं पहुंचाया गया? दूसरा मामला उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव अनूप मिश्रा का है. प्राप्त जानकारी के अनुसार उन्हें बहुजन समाज पार्टी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा का निर्वाचन आयोग के लिए प्रेषित एक पत्र मिला जिसमे मायावती की मूर्तियों के विषय में आयोग को कुछ बातें कही गयी थीं. अनूप मिश्र को यह पत्र आयोग को आगे बढ़ाना था. आयोग को जो पत्र मुख्य सचिव ने भेजा उससे उसे यह महसूस हुआ कि वह उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव अनूप मिश्रा ने मूर्तियों से सम्बंधित पत्र भेजते समय एक सिविल सर्वेंट के रूप में नहीं, एक पार्टी कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया है. आयोग का यह मानना है कि अनूप मिश्र ने पत्र जस का तस नहीं भेज कर पार्टी के एक पैरोकार के रूप में उसके लिए अपनी तरफ से कई दलीलें दीं. आयोग ने यहाँ तक कह दिया कि अनूप मिश्र का यह आचरण निंदनीय है. अब सवाल यह उठता है कि यदि चुनाव आयोग को यह सब महसूस हो रहा था तो जहाँ दूसरे अधिकारियों को चुनाव प्रक्रिया से हटाया जा रहा है वहीँ अनूप मिश्रा को क्यों बक्श दिया गया? यह भी सवाल है कि उनके विरुद्ध नियमानुसार कार्यवाही क्यों नहीं की गयी?

हमने गवर्नेंस के क्षेत्र में पारदर्शिता के लिए कार्यरत लखनऊ स्थित सिविल सोसायटी नेशनल आरटीआई फोरम की ओर से आज मुख्य निर्वाचन आयुक्त वाई एस कुरैशी को एक पत्र प्रेषित कर उनसे यह अनुरोध किया है कि वह उत्तर प्रदेश सचिवालय के उन सभी वरिष्ठ अधिकारियों के नाम सार्वजनिक करे जिनके विषय में उन्हें जानकारी मिली है कि वे चुनाव के सम्बन्ध में अपनी शक्ति के परे जा कर अनुचित निर्देश जारी कर रहे हैं. हमारा यह मानना है कि मात्र मौखिक आदेश नहीं मानने के निर्देश देना काफी नहीं है. जब ऐसे सभी लोग जिनके बारे में चुनाव आयोग को पक्की सूचना है कि वे चुनाव में गलत मौखिक आदेश दे रहे हैं तो उनके खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए. बल्कि आयोग का यह दायित्व बनता दिखता है कि वह इस सम्बन्ध में कार्मिक और प्रशिक्षण मंत्रालय, भारत सरकार एवं उत्तर प्रदेश सरकार को भी अग्रिम कार्यवाही करने के लिए सूचित करे.

इसी प्रकार से दूसरे प्रकरण में हमने नेशनल आरटीआई फोरम की ओर से एक अन्य पत्र में वाई एस कुरैशी से अनुरोध किया है कि जब आयोग को यह महसूस हुआ कि वह उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव अनूप मिश्रा ने मूर्तियों से सम्बंधित पत्र भेजते समय एक सिविल सर्वेंट के रूप में नहीं, एक पार्टी कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया है तो उनके विरुद्ध नियमानुसार कार्यवाही क्यों नहीं की गयी?
हमारा यह मानना है कि यदि आयोग ऐसा नहीं करता है तो उसकी निष्पक्षता और कर्तव्यशीलता पर स्वतः ही प्रश्नचिन्ह लगेंगे. ऐसा इसीलिए कि एक तरफ तो वह अधिकारियों के विषय में बगैर कोई तथ्य सार्वजनिक किये कार्यवाही कर रहा है और जिनके विरुद्ध स्पष्ट सूचना है उसे आधे पर ही छोड़ दे रहा है.

डॉ नूतन ठाकुर

कन्वेनर

नेशनल आरटीआई फोरम, लखनऊ

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