मुजफ्फरनगर के हत्यारों की तरफ से मुंह मोड़े बैठी है यूपी सरकार

लखनऊ : उत्तर प्रदेश शांत हो गया है। दंगों के दर्द को पीछे छोड़कर जनता अपने काम धंधे में लग गई है। वह लोग भी अपने गमों को भुलाने की कोशिश में हैं जिनके परिवार को जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा था। उन्हें इस बात की चिंता जरूर सता रही है कि दंगों का राजनीतिकरण होने के कारण कहीं असली गुनाहगार जिन्होंने खुल कर हत्याओं, हिंसक वारदातों और लूटपाट की घटनाओं को अंजाम दिया था, बच न जायें। क्योंकि अभी तक कथित रूप से दंगा भड़काने वाले कुछ नेताओं और छुटपुट लोगों के अलावा दंगे में शामिल रहने वालों के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई है। कई बेगुनाह और तमाशबीन ही नहीं रिक्शा चलाने और मजदूरी करने वालों को भी गुड वर्क दिखाने के चक्कर में पुलिस ने सलाखों के पीछे डाल दिया गया है। वहीं असली गुनाहगार खुलेआम अपने आकाओं के संरक्षण में घूम रहे हैं।

मुजफ्फरनगर पुलिस को 64 लोगों को मौत की नींद सुलाने वाले तमाम हत्यारों में से करीब 70-80 आरोपियों के बारे में सब पता है, लेकिन वह इस ओर से आंखें मूंदे बैठी है। स्थानीय पुलिस ने शासन को भेजी रिपोर्ट में भी जिक्र किया था कि उसने कुछ हत्यारों की शिनाख्त कर ली है। यह भी चौंकाने वाला तत्व है कि हत्या के अरोप में करीब 101 मुकदमे दर्ज हुए और तफ्तीश में 100 लोगों के नाम सामने आये, लेकिन गिरफ्तारी 213 लोगों की दिखा दी गई। इसी तरह से हत्या में 78 अपराधियों का नाम सामने आया और सिर्फ 40 को पकड़ा गया।

खैर, इन सब किन्तु-परंतुओं के बीच अच्छी खबर यह भी आ रही है कि दहशत कम होते ही शरणार्थी शिवरों में जीवनयापन करने वाले परिवार वापस अपने गांव-देहात की तरफ कूच करने लगे हैं। शिविरों में ही सही लड़कियों के हाथ पीले किये जा रहे हैं।  भाजपा का पश्चिमी उत्तर प्रदेश बंद भी शांतिपूर्वक निपट गया। अगर कुछ शांत नहीं हुआ है तो राजनीतिक नेताओं की धमा-चौकड़ी। दंगों को लेकर नेताओं के बीच आरोपों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। सभी अपने-अपने हिसाब से दंगा भुनाना चाहते हैं।

दंगों के बाद की राजनीति पर नजर डाली जाये तो समाजवादी नेता भाजपा और कांग्रेस पर दंगा भड़काने का आरोप लगा रहे हैं तो भाजपा का आरोप है कि दंगा समाजवादी सरकार की साजिश का परिणाम था। कांग्रेस ने भी इसमें अखिलेश सरकार के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करके राजनैतिक रोटियां सेंकने की कोशिश की। भाजपाई अपने नेताओं को बेदाग बताते हुए आरोप लगाते हैं कि उनके नेताओं और जनप्रतिनिधियों को साजिशन पकड़ा जा रहा है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेता और मंत्री तो हिंसा ग्रस्त इलाके का दौरा कर रहे हैं लेकिन भाजपा नेताओं को दंगा प्रभावित इलाकों में जाने से रोका जा रहा है ताकि समाजवादियों और कांग्रेसियों का खेल उजागर न हो जाये। भाजपा,  सपा के कद्दावर नेता और मंत्री आजम खॉ पर कई गंभीर आरोप लगा रही है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी उनके निशाने पर हैं। पूरी पठकथा 2014 को ध्यान में रखकर लिखी जा रही है।

भाजपा को इस बात का बेहद मलाल है कि कांग्रेस और उसकी केन्द्रीय सरकार और समाजवादी पार्टी और उसकी राज्य सरकार दंगों के नाम पर एक वर्ग विशेष को खुश करने में लगी है, जबकि दंगों से कोई भी अछूता नहीं रहा था। बसपा सुप्रीमों मायावती अपना अलग राग अलाप रही हैं। वह भाजपा और समाजवादी दोनों को निशाने पर लिये है। दंगों ने बसपा में प्राण वायु फूंक दी हैं, बसपाइयों के जबर्दस्त विरोध के चलते अखिलेश सरकार सदन से लेकर सड़क तक पर बैकफुट पर आ गई, लेकिन बसपा को उस समय करारा झटका लगा जब यह खबर सार्वजनिक हुई की उसकी (बसपा)पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक मुस्लिम महिला सांसद समाजवादी सरकार के मुखिया अखिलेश यादव से करीबी बना कर बसपा के मंसूबों पर पानी फेरने में लगी है। खबर लीक होते ही बसपा आलाकमान का पारा चढ़ गया। चर्चा तो यहां तक है कि इसी महिला सांसद की बातों पर विश्वास करके ही समाजवादी सरकार ने भाजपा ही नहीं बसपा विधायक को भी दबोचा था।

सबके अपने-अपने तर्क हैं। राजनैतिक पंडित कहते हैं कि सपा नहीं चाहती है कि दंगाग्रस्त इलाके में उनके अलावा किसी और जाति का नेता मुसलमानों का मसीहा बनने की कोशिश करे। इसी लिये बसपा के कुछ मुस्लिम जनप्रतिनिधियों पर भी लगाम लगाई जा रही है। वैसे भी जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी कैबिनेट मंत्री आजम खॉ के बहाने समाजवादी सरकार को कटघरे में खड़ा करने की पूरी कोशिश कर रहे है। कभी मुलायम के काफी करीब रहे जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी द्वारा आजम को यूपी का मोदी तक बताया जा रहा है। रही सही कसर जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने मुजफ्फरनगर दंगों की तुलना गुजरात दंगों से करके पूरी कर रखी है। जमीयत के महासचिव मौलाना महमूद मदनी शायद ही कोई दिन गुजरता होगा जब यूपी सरकार पर हमला नहीं बोलते हों, वह सीमए अखिलेश को विफल सीएम की उपमा दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट भी मुजफ्फनगर दंगों और उसके बाद जांच के नाम पर भेदभाव पूर्ण व्यवहार का आरोप झेल रही समाजवादी सरकार के खिलाफ दायर तमाम आईपीएल पर गौर कर रही है।

हालात की गंभीरता को इस अहसास से समझा जा सकता है कि राजनीति के सबसे चतुर खिलाड़ियों मंे गिने जाने वाले सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव तक चारो खाने चित दिखाई दे रहें हैं, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा करने के दौरान कुछ मुस्लिमों संगठनों और मुसलमानों की नाराजगी और सीएम को काला झंडा दिखाये जाने की घटना ने सपा को सकते में डाल दिया है। मुलायम की लाचारी का आलम यह है कि वह दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा करने तक का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं, एक बार प्रोग्राम बना भी था तो विरोध की आशंका के चलते अंतिम समय मंे रद्द कर दिया गया। शिवपाल यादव के दौरे का भी वैसा ही हश्र हुआ जैसा सीएम के दौरे का हुआ था। शिवपाल ने यह कोशिश जरूर की कि सभी वर्ग के लोगों से मुलाकात करके उनके जख्मों पर मरहम लगाया जाये, उनके साथ विभिन्न वर्गो के नेताओं का जमावड़ा भी साथ-साथ चल रहा था, लेकिन सारी कवायत बेकार गई।  हालत यह है कि सपा का कोई बड़ा नेता दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा करने का साहस नहीं जुटा पा रहा है। मुलायम के साथ परेशानी यह है कि आजम खॉ को लेकर दौरा करंेगे तो गैर मुस्लिम नाराज हो जायेगें और उनके बिना दौरा करंेगे तो मुसलमानों के बीच यह मैसेेज जायेगा कि आजम साहब दंगों से नाराज चल रहे हैं। इन सब बातों के बीच बताते चलें कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यह इलाका मुलायम सिंह यादव के राजनैतिक गुरू पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह का राजनैतिक क्षेत्र रहा है।

हालांकि चौधरी चरण सिंह ने कभी ऐसा कोई बयान नहीं दिया था जिससे लगे कि मुलायम को वह अपना चेला नही मानते थे। अनेक मौंको पर दोनों अलग-अलग खड़े दिखाई पड़ जाते थे। चरण सिंह ने जाटों और मुसलमानों को एक ही घाट पर रहना सिखाया था और इसी के बल पर वर्षो तक यहां एक छत्र राज किया था। चरण सिंह की विरासत संभालने वाले उनके पुत्र अजित सिंह भी इसी फार्मूले के बल पर  रोटिंया सेंकते रहें हैं। मुलायम अपनी पार्टी के जाट नेताओं की नाराजगी से भी परिचित हैं। कई ने पाला बदल दिया है तो कुछ और के बदलने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट वोट बैंक मुसलमानों से भी बढ़ा है, इसी लिये मुलायम दोनों(जाट और मुसलमानों) को नाराज नहीं करना चाहते हैं। मामला थोड़ा ठंडा होने की बाद ही मुलायम का वेस्ट यूपी दौरा संभव लग रहा है। तब तक उनकी सरकार दोनों की कौमों को मरहम लगाने का काम करती रहेगी।

बहरहाल, बात बसपा की कैराना की महिला सांसद तबस्सुम हसन की कि जाये जो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के लिये दंगों के बाद रहनुमाई कर रही हैं, वह एक तीर से दो निशाने लगा रही हैं। अपने संसदीय क्षेत्र में भाजपा की कमर तोड़ना और मुसलमानों के बीच अपनी पैठ बनाना उनका परम धर्म बन गया है। यहीं से भाजपा के बड़े जाट नेता हुकुम सिंह आते हैं। हाल फिलहाल तक हुकुम सिंह और तबस्सुम के बीच अच्छी बनती थी, विधायक का चुनाव हुकुम सिंह लड़ते तो तबस्सुम उनकी मदद करती और सांसदी में हुकुम सिंह की मदद उन्हें मिलती, लेकिन बदले हालात ने रिश्तों पर ग्रहण लगा दिया। तबस्सुम की मुलाकात विधान सभा सत्र के दौरान मुख्यमंत्री से हुई थी। सीएम जब दंगा प्रभावित क्षेत्र का दौरा करने गये थे तब भी तबस्सुम ने उन पर काफी मेहरबानी की थी। दौरे के दौरान भी उन्होंने बसपा सांसद से मुलाकात की थी।  तबस्सुम कहती भी हैं कि उन्होंने मुख्यमंत्री का सच्चाई बतायी थी। सांसद तबस्सुम का सारा ध्यान 2014 पर लगा है, वह यहां अपना वोट बैंक किसी भी तरह से बढ़ाना चाहती हैं, इसी लिये सभी तरह के हथकंडे अपना रही हैं। बसपा सुप्रीमों नाराज भी हो जायेंगी तो उनकी सेहत पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। एक रास्ता बंद होगा तो दूसरा खुल जायेगा। बसपा आलाकमान को इस बात का पता चलते ही महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य ने सफाई देते हुए कहा कि उनके पास सांसद तबस्सुम के मुख्यमंत्री से मिलने के बारे में कोई जानकारी नहीं है। पार्टी के अन्य नेताओं को भी कुछ नहीं पता है। मीडिया से इस बात का पता चला है, पूरे मामले की जांच की जायेगी।

लेखक अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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