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मुजफ्फरनगर दंगे सपा नेतृत्व के लिए दो-धारी तलवार

मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक दंगों को लेकर सियासी जेर-ए-बहस तेज हो गई है। प्रमुख राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे पर सपा को शिकंजे में कसने के लिए कवायद तेज कर दी है। इस मामले में जिस कदर प्रशासन की लापरवाही और नाइंसाफी के खिलाफ गुस्सा भड़का है, उससे सपा का शीर्ष नेतृत्व बेचैन हो उठा है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव आज (शुक्रवार) मुजफ्फरनगर और शामली के दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा कर रहे हैं। अब राजनीतिक मोर्चे की कमान सीधे तौर पर उन्होंने संभाल ली है। क्योंकि, सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं को लेकर अल्पसंख्यकों की जमातें भी सरकार की कार्यशैली से काफी नाराज हो उठी हैं।

मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक दंगों को लेकर सियासी जेर-ए-बहस तेज हो गई है। प्रमुख राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे पर सपा को शिकंजे में कसने के लिए कवायद तेज कर दी है। इस मामले में जिस कदर प्रशासन की लापरवाही और नाइंसाफी के खिलाफ गुस्सा भड़का है, उससे सपा का शीर्ष नेतृत्व बेचैन हो उठा है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव आज (शुक्रवार) मुजफ्फरनगर और शामली के दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा कर रहे हैं। अब राजनीतिक मोर्चे की कमान सीधे तौर पर उन्होंने संभाल ली है। क्योंकि, सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं को लेकर अल्पसंख्यकों की जमातें भी सरकार की कार्यशैली से काफी नाराज हो उठी हैं।

इनके लोगों ने सरकार और पार्टी पर तरह-तरह के आरोप भी लगाने शुरू कर दिए हैं। दूसरी तरफ, बहुसंख्यकों की कसक यह है कि प्रशासन दंगों के मामले में खुले तौर पर पक्षपात करने लगा है। इससे आपसी सद्भाव जुटा पाना और मुश्किल हो रहा है। नाराज जमातें सपा नेतृत्व की नीयत पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं। मौके का फायदा उठाकर संघ परिवार ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।

सपा नेतृत्व की सबसे बड़ी मुश्किल कद्दावार नेता आजम खान को लेकर खड़ी हो गई है। आजम पार्टी के महत्वपूर्ण मुस्लिम चेहरा हैं। वे अखिलेश सरकार में वरिष्ठ मंत्री हैं। उनकी हनकदार कार्यशैली अक्सर चर्चा में रहती है। अक्खड़ मिजाज के आजम खान अपनी जिद पर आते हैं, तो वे किसी की नहीं सुनते। उनकी पहचान अक्खड़ मिजाजी वाली राजनीति की रही है। वे सत्ता में रहें या विपक्ष की भूमिका में। लेकिन, चर्चा में जरूर रहते हैं। सियासी हल्कों में उनकी यह छवि जरूर है कि तमाम विवादित टिप्पणियों से बवाल खड़ा करने वाले आजम कुछ भी करते हों, लेकिन हैं खांटी ईमानदार। पार्टी में भी उनकी विरोधी लॉबी उनके खिलाफ कोई व्यक्तिगत स्कैंडल नहीं तलाश पातीं। शायद, इसी वजह से आजम खान अंदर-बाहर कहीं भी दबाव में नहीं आते। इधर, मुजफ्फरनगर के दंगों को लेकर वे विपक्ष के खास निशाने पर आ गए हैं। उन पर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने स्थानीय पुलिस पर दबाव डालकर एक समुदाय के आरोपियों की पुलिस थानों से रिहाई करा दी। इसी वजह से स्थिति ज्यादा गंभीर बनी।

एक टीवी न्यूज चैनल ने भी अपने ‘स्टिंग आॅपरेशन’ के जरिए दावा किया कि लखनऊ के आदेश पर ही तमाम लोगों की गिरफ्तारियां नहीं होने दी गईं। यहां तक कि 27 अगस्त को जब सांप्रदायिक हिंसा की शुरुआत हुई थी, तो पुलिस ने प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही पर 7 लोगों को हिरासत में लिया था। लेकिन, मंत्री जी ने दबाव डालकर इन्हें मुक्त करने के निर्देश दे दिए थे। ‘स्टिंग आॅपरेशन’ में आजम खान के नाम का उल्लेख भी किया गया है। मीडिया की इस कवरेज के बाद आजम कई तरह के विवादों के केंद्र में आ गए हैं। भाजपा के नेताओं ने मांग की है कि आजम खान को सरकार से बर्खास्त किया जाए और उनके खिलाफ दंगों की साजिश का मुकदमा भी चलाया जाए। भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद कहते हैं कि जब पुलिस वाले ‘आपबीती’ खुलकर बता रहे हैं, तो सपा के इस नेता पर तुरंत कार्रवाई जरूरी है।

हालांकि, आजम खान ने इस ‘स्टिंग आपरेशन’ के जरिए लगे आरोपों को लेकर काफी नाराजगी जताई है। उन्होंने स्टिंग करने वाले टीवी चैनल को चुनौती दी है कि वह लगाए गए आरोपों के पुख्ता सबूत दे। वरना, सार्वजनिक रूप से माफी मांगे। आजम कहते हैं कि उनकी राजनीति साफ-सुथरी रही है। वे किसी भी जांच के लिए तैयार हैं। उनके फोन कॉल डिटेल देख लिए जाएं। उन्होंने मुजफ्फरनगर के किसी थाने में फोन ही नहीं किया। न ही पुलिस के आलाधिकारियों से उनकी बातचीत हुई। इसके बावजूद उन पर जो आरोप लगे हैं, इससे वे दुखी जरूर हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गुरुवार को ‘क्लीनचिट’ देते हुए कह दिया है कि भाजपा के लोग राजनीतिक कारणों से आजम खान पर तमाम अनर्गल आरोप लगा रहे हैं। इनकी बातों पर कोई विश्वास नहीं कर सकता।

जबकि, पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव नरेश अग्रवाल को तो ‘स्टिंग आपरेशन’ करने वाले टीवी चैनल की नीयत ही ठीक नहीं लग रही। उन्होंने कहा है कि इस स्टिंग में कोई दम नहीं है। उन्हें तो यह काम एक राजनीतिक साजिश का हिस्सा लगता है। सपा नेतृत्व भले मीडिया की ऐसी चर्चाओं को खारिज कर रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दंगों को लेकर चौतरफा गुस्से से सरकार खासी उलझ गई है। उसकी सबसे बड़ी चिंता मुसलमानों के अंदर बढ़ती नाराजगी को लेकर समझी जा रही है। हालांकि, सरकार ने अपनी तरफ से तमाम कोशिश की है कि अल्पसंख्यक जमातों में यह भरोसा पैदा हो कि इस संकट की घड़ी में सरकार पूरी मुस्तैदी से उनके साथ खड़ी है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के दौरे के पहले ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव दंगाग्रस्त इलाकों का जायजा लेने गए थे। उन्होंने दंगा पीड़ितों के घावों पर मरहम लगाने की जमकर कोशिश की। उनका खास जोर अल्पसंख्यक पीड़ितों को लेकर रहा।

यूं तो इन दंगों की जमीनी सच्चाई भी यही है कि इनसे बड़े पैमाने पर अल्पसंख्यक वर्ग ही प्रभावित हुआ है। खास तौर पर शामली और मुजफ्फरनगर जिलों के सैकड़ों गांवों में अभी भी दहशत और अविश्वास का माहौल बना हुआ है। इसी के चलते इन गांवों में रहने वाले अल्पसंख्यक अपनी जान बचाने के लिए भाग खड़े हुए हैं। करीब 75 हजार लोगों ने इधर-उधर जाकर शरण ली है। सरकारी शिविरों में ही करीब 40 हजार लोगों ने शरण ली है। प्रशासन की तमाम कोशिशों के बावजूद ये लोग अपने-अपने घरों को वापस लौटने को तैयार नहीं हो रहे। क्योंकि, इन दंगों ने आपसी अविश्वास का माहौल बना दिया है। उन्हें भरोसा नहीं हो रहा कि पुलिस की चौकसी हटने के बाद वे कैसे अपने घरों में सुरक्षित रह पाएंगे?

इस बीच तरह-तरह की राजनीतिक चर्चाओं ने जोर मारा है। रालोद के प्रमुख एवं केंद्रीय मंत्री अजित सिंह ने खुलकर कहना शुरू कर दिया है कि इन दंगों के पीछे कहीं न कहीं सपा और भाजपा की मिलीभगत लगती है। क्योंकि, ये दोनों पार्टियां वोटों के ध्रुवीकरण के लिए लंबे समय से इस ताक में रही हैं कि सांप्रदायिक हिंसा करवा कर ‘वोटों की खेती’ कर ली जाए। उल्लेखनीय है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दंगा प्रभावित इलाका अजित सिंह की राजनीतिक का गढ़ रहा है। राजनीतिक आकलन यही है कि इन दंगों का जो राजनीतिक फलित होगा, उससे सबसे ज्यादा घाटा रालोद को ही रहेगा। क्योंकि, इस पार्टी को जाट बिरादरी और अल्पसंख्यकों का खास समर्थन मिलता आया है। इस राजनीतिक समीकरण के चलते चौधरी अजित सिंह की पकड़ यहां मजबूत रही है। लेकिन, इस बार सांप्रदायिक तनाव में जाटों और मुसलमानों के आपसी रिश्ते दरके हैं। इससे रालोद को झटका लगने वाला है। इस मुश्किल घड़ी में रालोद नेतृत्व ने सपा नेतृत्व के खिलाफ सीधा हमला बोल दिया है।

भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने मांग की है कि सपा सरकार को बर्खास्त किया जाए। क्योंकि, अखिलेश सरकार एकदम लुंज-पुंज साबित हो रही है। मौका देखकर कांग्रेस ने भी आक्रामक तेवर अपना लिए हैं। केंद्रीय राज्यमंत्री जितिन प्रसाद ने कह दिया है कि जब तक आजम खान की भूमिका की जांच हो, तब तक उन्हें सरकार से इस्तीफा दे देना चाहिए। कांग्रेस के कई और दिग्गज नेताओं ने अखिलेश सरकार के खिलाफ तीखी निशानेबाजी शुरू की है। केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा लगातार हमलावर रुख बनाए हुए हैं। उन्होंने तो मुलायम सिंह की राजनीतिक नीयत को लेकर तीखे कटाक्ष किए हैं। यह अलग बात है कि बेनी प्रसाद की बातों पर सपा के दिग्गज नेता रामगोपाल यादव यही कह देते हैं कि वर्मा का तो मानसिक संतुलन ठीक नहीं है। ऐसे में, उनकी बातों को संज्ञान में लेना सिर्फ समय की बर्बादी हो सकती है।

प्रदेश सरकार ने दंगा पीड़ितों को मरहम लगाने के लिए तमाम आर्थिक मदद का ऐलान किया है। शिविरों में रह रहे पीड़ितों की देखरेख के लिए बेहतर इंतजाम कर दिए गए हैं। आज मुलायम सिंह मुजफ्फरनगर में ताजा हालात का जायजा लेने वाले हैं। संभव है कि वे कुछ नए ऐलान भी करें। लेकिन, कई मुद्दों पर सपा सरकार घिरने लगी है। सरकार ने शुरुआती दौर में ही 40 नेताओं के खिलाफ दंगा भड़काने के मुकदमे दर्ज कराने के निर्देश दिए थे। 16 नेताओं के खिलाफ दो दिन पहले गिरफ्तारी के वारंट भी जारी हुए थे। 9 और नेताओं के खिलाफ वारंट जारी हुए हैं। लेकिन, इनमें से किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई। इसको लेकर तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं।

इन आलोचनाओं को देखते हुए रामगोपाल यादव ने कह दिया है कि स्थिति में कुछ सुधार होने के बाद आरोपी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। ऐसे में, सरकार की नीयत पर शक नहीं किया जाना चाहिए। इस बीच चर्चा चली है कि सरकार पुलिस के कई आला अफसरों पर गाज गिराने वाली है। सरकार के फैसले के पहले ही एडीजी (लॉ एंड आर्डर) अरुण कुमार छुट्टी पर चले गए हैं। उन्होंने ताजा हालात में प्रदेश में सेवा नहीं करने का आवेदन भेजा है। यानी, वे डेपुटेशन पर केंद्र में जाने को तैयार हैं। अरुण कुमार की गिनती एक कर्मठ अफसर के रूप में होती रही है। माना जा रहा है कि राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ने से वे नाखुश हैं। इस तरह से मुजफ्फरनगर के दंगे तमाम कारणों से सपा नेतृत्व के लिए दो धारी तलवार बन गए हैं। हालात की गंभीरता देखकर अब सपा सुप्रीमों ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। उनकी पहली वरीयता यही है कि हर कीमत पर अल्पसंख्यकों का एकमुश्त भरोसा जरूर हासिल कर लिया जाए।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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