मुजफ्फरनगर दंगे से जुड़ी पिटीशन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में वकील नौशाद खान के साथ दुर्व्यवहार

Himanshu Kumar : क्या आपको मालूम है अभी एक सप्ताह पहले, भारत के सर्वोच्च न्यायलय में एक मुसलमान वकील को मुज़फ्फर नगर दंगों पर नागरिक जांच दल की रिपोर्ट पेश करने की कोशिश करने पर हिंदू वकीलों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश की मौजूदगी में कालर पकड़ कर सर्वोच्च न्यायालय से घसीट कर बाहर कर दिया? मुझे पदचाप सुनाई दे रही है रामराज्य की.

Abhishek Srivastava : Himanshu जी की बताई यह घटना सच है। मामला मुजफ्फरनगर दंगे से जुड़ी एक पिटीशन का है, वकील हैं नौशाद खान और घटना की तारीख है 26 सितंबर। नौशाद से मेरी लंबी बात हुई है और उन्‍होंने खुद अपने साथ हुए दुर्व्‍यवहार की पुष्टि की है, हालांकि इसकी कोई शिकायत या एफआईआर दर्ज न कराने के संबंध में उन्‍होंने मुझसे यह कहा, ''I don't feel desirable because it would have embarassed the honourable Chief Justice".

नौशाद के कानूनी रूप से परिपक्‍व जवाब के बरक्‍स हिमांशु भाई ने जिस हलके तरीके से और गैर-जिम्‍मेदार भाषा में इस घटना को यहां रखा है, वह स्‍वाभाविक तौर पर संदेह पैदा करता है। इस घटना का विवरण Ranjit Verma द्वारा मांगे जाने पर उन्‍होंने वर्माजी को अनफ्रेंड कर दिया, यह एक और बड़ी गलती उन्‍होंने की है। सूचना के लिए बता देना चाहूंगा कि रंजीत वर्मा खुद अधिवक्‍ता रह चुके हैं, हिंदी कवियों में शायद इकलौते हैं जो राजनीतिक मसलों पर सबसे ज्‍यादा सक्रिय रहते हैं और कॉलिन गोंजालविस के उसी एनजीओ HRLN की पत्रिका ''कॉम्‍बेट लॉ'' के संपादक रह चुके हैं जहां हिमांशु भाई भी जुड़े हैं।

मेरी निजी राय है कि हिमांशु जी को आगे से ऐसे संवेदनशील मसलों पर टिप्‍पणी करते वक्‍त संयम बरतना चाहिए, डीटेल्‍स लेने के बाद ही कहीं भी कुछ लिखना चाहिए और इस पोस्‍ट के संबंध में तत्‍काल अपनी गलती को स्‍वीकार करना चाहिए। यह उनकी छवि को बेहतर बनाएगा और संदेहों को दूर करेगा।

मानवाधिकारवादी हिमांशु कुमार और पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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